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रात गयी बात गयी || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2013)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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श्रोता : मैं जब बारहवीं क्लास में था तो उस समय मैंने पढाई में दिलचस्पी नहीं रखी, न ही परिवार से बहुत मतलब रखा। मतलब उस समय मैं कुछ भी नहीं सोचता था। जो मन में आता था वो करता था। और उस समय मुझे लगता था कि सब लोग मुझे कुछ कह रहे हैं, मैं उस पीरियड को कभी डिफाइन नहीं कर पाया। उस समय की वजह से मुझे नुकसान हुआ है। चाहे पढाई हो या दोस्त हो हर जगह नुकसान हुआ ही है। तो सर ,मैं उस समय को आज तक जान नहीं पाया हूँ कि वो हुआ क्या था मुझे ?

वक्ता : कहाँ बैठे हो ?

श्रोता : कुर्सी पर।

वक्ता : बगल में कौन है ?

श्रोता : मेरा दोस्त।

वक्ता : हाथ में क्या है ?

श्रोता : पेन।

वक्ता : सामने कौन है?

श्रोता : आप।

वक्ता : पास्ट कहाँ है ? वो कहाँ है जिसकी बात कर रहे हो ?

श्रोता : सर, मेरे साथ है।

वक्ता : कहाँ है ?

श्रोता : मन में।

वक्ता : निकाल दो उसे वहां से।

स्मृतियों के अलावा वो अतीत कहीं है ही नहीं। तुम यहाँ हो, इसकी फ़िक्र करो।

श्रोता : लेकिन सर, जैसे अपने बात करी लक्ष्यों की, मैं वहां हूँ।

वक्ता : पर वो है ही नहीं। सुबह उठते हो और रात में सपना देखा होता है। सपने में अगर किसी का क़त्ल कर दिया होता है तो सुबह उठ कर प्रायश्चित करते हो क्या?

रात गयी, बात गयी। वो बीत गया- अब उसका सवाल क्यों पूछना ?

ये बीमारी तुम सब के साथ है, एक की ही नहीं है। तुम अतीत के साथ अभी भी चिपके हुए हो। सपना था, बीत गया, सपने में कर दिया किसी का क़त्ल, अब क्यों प्रायश्चित कर रहे हो ?

इस बात को गहराई से घुसने दो भीतर। तुम बैठे हो सामने, पास वो बैठा है, सामने मैं हूँ, हाथ में पेन है, शर्ट कॉलेज की पहन रखी है, दिन आज का है, पास्ट है कहाँ, जो इसके बारे में सवाल पूछ रहे हो ?

तुम उसके साथ बेकार में ही जुड़े हुए हो। कोई रस है जो तुम्हें मिल रहा है उसके साथ।

श्रोता : और वो रस दुःख ही दे रहा है।

वक्ता : दुःख ही दे रहा है। ठीक इस वक़्त पर तुम मुझसे कुछ ऐसा भी पूछ सकते थे जो तुम्हारे लिए वास्तविक होता। लेकिन देखो तुमने ये क्या किया, तुमने ये पाँच मिनट, गुज़रे हुए समय की बात करते हुए निकाल दिए।

श्रोता : सर, पास्ट में हमने कुछ ऐसा किया जो हमे अब दुःख दे रहा है लेकिन अगर पास्ट के बारे में नहीं सोचेंगे तो वो गलती फिर कर सकते हैं, हमें कुछ सीख ही देता है पास्ट। उस कंडीशन से हटके कुछ और करेंगे।

वक्ता : हट के कहाँ जाओगे? तुम कह रहे हो कि हम पास्ट से हटेंगे, हट के कहाँ जाओगे? चलो देखते हैं। इलाहाबाद में रहती हो, रोटी सब्ज़ी नहीं खाओगी तो और क्या खाओगी ?

श्रोता : दाल चावल।

वक्ता : दाल चावल खाओगी, नाचोस और सालसा तो नहीं खाओगी न? क्योंकि वो तुम्हारे अतीत में है ही नहीं। तुम कह रही हो कि पास्ट को नहीं देखेंगे तो उससे हटेंगे कहाँ ?

मैं तुमसे कह रहा हूँ कि पास्ट के एक कोने से हटोगे तो दूसरे पर पहुँच जाओगे। दाल चावल छोड़ोगे तो रोटी सब्ज़ी पर पहुँच जाओगे। पर वो भी तुम्हारे अतीत का ही हिस्सा है। जैसे कोई कहे कि इस कमरे के एक कोने से हट कर दूसरे कोने पर चला गया। क्या वो इस कमरे से बाहर चला गया? जब भी तुम सोचोगे अतीत के बारे में तो अतीत के भीतर ही जाओगे। जितने भी तुम्हारे विकल्प निकलेंगे अतीत के भीतर से ही निकलेंगे। अब कहोगे- अच्छा चलो ठीक है , हम न दाल भात खायेंगे , ना रोटी सब्जी खायेंगे हम कुछ ओर ही खायेंगे आज। क्या ?

– पूरियां !

लो। अब इलाहबाद इससे आगे जाएगा तो जाएगा भी कहाँ? और बहुत आगे बढ़ गया तो क्या खायेंगे?

– नान और पनीर खायेंगे।

और कहाँ जाओगे? वहीं तो जाओगे जो तुम्हारे अतीत में पहले से बसा हुआ है – सब्जी दाल चावल पूड़ी पनीर ! कुछ भी सर्वथा नया, हो कैसे पायेगा सोच सोच कर? कुछ भी ऐसा नहीं हो पायेगा जो पूरी तरह से नया हो।

अतीत में कैद रह कर के अतीत में ही रहोगे, बस एक कोने से दूसरे कोने कूदते रहोगे। जैसे एक्वेरियम में एक मछली इधर-उधर भागती रहती है लगातार, पर ये सब करके क्या वो समुद्र में पहुँच जाती है? चल वो दिन रात रही है, सोच वो दिन रात रही है, पर क्या वो समुद्र में पहुँच जाती है? रहती वो उस छोटे से एक्वेरियम में ही है न?

देखो कि वो एक छोटा सा एक्वेरियम है अतीत का और तुम उसमें फँसे हुए हो।

अभी पूरी दुनिया तुम्हें उपलब्ध है। वर्तमान अपनी सारी संभावनाओ के साथ तुम्हारे सामने है। देखो कि तुम्हारे पास एक काबिल शरीर है, एक काबिल मन है और पूरी दुनिया खुली हुई है तुम्हारे लिए। कितना कुछ तुम नहीं कर सकते। पूरा जीवन तुम्हारे सामने उपलब्ध है, जवान हो, पर तुम उसको नहीं देख पा रहे क्योंकि कक्षा बारह की एक स्मृति है जो तुम्हारा पीछा नहीं छोडती और वो तुम्हारे लिए एक महत्वपूर्ण चीज़ बन गयी है !

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