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अपने भीतर शक्ति कैसे विकसित करें?
अपने भीतर शक्ति कैसे विकसित करें?
10 min
भीतर फौलाद तभी आता है जब जीवन फौलाद से टकराता है। जब तक सामने कोई बड़ी समस्या नहीं होगी, तुम्हारे भीतर ताकत बस सोई रहेगी, जगेगी नहीं। समस्या आविष्कृत नहीं करनी है। समस्याएँ तो होती ही हैं, हम उनसे मुँह चुराते हैं क्योंकि पता होता है कि समस्याओं का सामना करने का दम नहीं है। दम विकसित करना हो तो जिन समस्याओं से मुँह चुराते रहे हो, उनसे जूझ जाओ। मार पड़ेगी, चोट लगेगी, दर्द होगा, लेकिन ताकत विकसित हो जाएगी।
वासना और डर - समस्या कहाँ है?
वासना और डर - समस्या कहाँ है?
6 min
तुम्हारे घर में कोई चीज़ अँधेरे में रखी थी, कोई आकर उस पर थोड़ी रोशनी डाल सकता है। उस पर थोड़ा प्रयोग करके बता सकता है कि ये चीज़ सड़ी हुई है। उसके आगे का काम तो तुम्हारी नीयत का है। उसको उठा के बाहर तुम्हें ही फेंकना पड़ेगा। नीयत, फ़ैसला, ईमानदारी, इनका कोई विकल्प नहीं होता। डूबे रहो इधर-उधर की चीज़ों में, वासना हो, डर हो। जिस दिन तुम जलोगे, उस दिन डर और वासना भी जल जाएँगे। कहानी कभी न कभी तो ख़त्म होनी है। या तो ख़ुद अभी ख़त्म कर लो, नहीं तो चिता पर ख़त्म हो जाएगी। मर्ज़ी है।
महिला-पुरुष दोनों शोषित, तो शोषक कौन?
महिला-पुरुष दोनों शोषित, तो शोषक कौन?
15 min
अज्ञान का दूसरा नाम शोषण है। जो आज अपनेआप को शोषित कह रहा है, वो भीतर- ही- भीतर तैयारी करके बैठा है कि कल शोषण करूँगा। तो जो आज का शोषित है, वो कल का शोषक बनता है। हमें ये नहीं करना है कि संतुलन ला दिया और संतुलन का मतलब हुआ कि अब दोनों बराबर का शोषण करेंगे। वो कोई संतुलन नहीं होता है। हमें ये करना है कि जो शोषण का मूल कारण ही है उसको मानव मात्र के भीतर से हटा दें।
प्रेम के बदले नफ़रत क्यों मिलती है?
प्रेम के बदले नफ़रत क्यों मिलती है?
4 min
आपको क्या करना था? प्रेम। और आपने प्रेम कर लिया, अब तकलीफ़ क्या है? आपको सिर्फ़ प्रेम ही भर नहीं करना था, कामना कुछ और भी थी। क्या कामना थी? दूसरे से उत्तर भी मिले, कुछ लाभ भी हो, कुछ मान-सम्मान हो। दूसरा भी नफ़रत इसलिए करता हो क्योंकि उसको पता है कि हम सिर्फ़ प्रेम नहीं कर रहे हैं, प्रेम में उम्मीद छुपी हुई है। प्रेम बड़ी स्वतंत्रता की बात है—'तुझे हक़ है, तू जो करना चाहे, करे।' प्यार देने की चीज़ तो हो सकती है, लेने की बिल्कुल नहीं।
असली ताकत और सुंदरता क्या है?
असली ताकत और सुंदरता क्या है?
7 min
ज्ञान है आपकी असली ताकत; आपका कौशल आपकी असली ताकत है; आपने दुनिया कितनी देखी है, ये आपकी असली ताकत है। अगर शरीर की भी सुंदरता की बात करनी है तो शरीर की सुंदरता है शरीर की ताकत, फिटनेस। शरीर ताकतवर रखो, फिट रखो।
Who Controls Your Mood?
Who Controls Your Mood?
4 min
Our mood is always dependent on others and situations. Results have not been up to your expectations. So now you require a morale booster, some motivating speaker. The moment that fellow is gone, your energy also goes away. But there is another way of living. Deep within myself, I find a point that no external situation can touch. Whatever happens, happens on the surface. That will remain stable, uninvolved, a non-participant. Then you are really free.
अचानक कोई दुविधा आ जाए तो क्या करें ?
अचानक कोई दुविधा आ जाए तो क्या करें ?
12 min
होश में आओ और फिर होश को जाने मत दो, पानी जैसे हो जाओ। किसी पथरीले पहाड़ पर पानी की एक धार छोड़ो, देखो, वो कैसे अपना रास्ता तय करती है। पहाड़ है पथरीला, ऊबड़-खाबड़ चट्टानों से भरा हुआ, कहीं गड्ढा, कहीं कुछ और तुमने धार छोड़ी है। धार कहीं रुककर के विचार नहीं करती कि कौन सा मार्ग मेरे लिए ठीक है, कौन सा नहीं। उसे पता है किधर को जाना है। वो समर्पित है उस जगह पहुँच जाने को, जिसके बाद गति की कोई आवश्यकता नहीं रहेगी। नीचे कोई तालाब होगा, एक बार धार वहाँ तक पहुँच गयी, क्या उसके बाद भी बहती है?
How to Utilize Time?
How to Utilize Time?
13 min
The real issue is not about time at all. You are spending time exactly according to your values. Don’t ask how to utilize time. Ask yourself, "Do I know what is truly valuable?" When you are clear about what is truly valuable in life, all your time will be devoted to that. Become clear. Know what is truly valuable.
छठे महाविनाश की शुरुआत हो चुकी है!
छठे महाविनाश की शुरुआत हो चुकी है!
4 min

पृथ्वी पर आज तक पाँच बार महाविनाश हो चुका है। महाविनाश माने सारे जीव जंतुओं का संपूर्ण नाश।इतिहास में 5 बार पृथ्वी का तापमान बेहिसाब बढ़ा, और ग्रह पर जीवन ही समाप्त हो गया।

और अब, छठे महाविनाश की शुरुआत हो चुकी है!और इस छठे महाविनाश का कारण भी

What is Dharma According to the Bhagavad Gita?
What is Dharma According to the Bhagavad Gita?
11 min

Overview

Fighting Duryodhana is Dharma. Fight Duryodhana in the way you can, that is swadharma. Dharma is the same for everybody, but swadharma varies according to your physical, social, temporal conditions.

But remember that swadharma can never be in contradiction of Dharma; swadharma will always be something

आज की पीढ़ी क्यों बर्बाद हो रही है?
आज की पीढ़ी क्यों बर्बाद हो रही है?
12 min
आदमी बेहतर तब बनता है जब उसे अपनी कमियों का एहसास होता है, और यह एहसास दुख, असफलता, और निराशा से आता है। आज मेहनत और ज्ञान से ज़्यादा कीमत पैसे और स्टाइल की है, जिससे वर्तमान पीढ़ी को अपनी असफलता और अज्ञानता का दुख भी नहीं होता। जब तक उनका ऊँचाइयों से परिचय नहीं होगा, वे नीचे ही रहेंगे। इसलिए आज सही संगति की और गुण-ज्ञान अर्जित करने की बहुत आवश्यकता है, क्योंकि असली सुंदरता और मौज उसी में है।
सेक्स अच्छा है या बुरा?
सेक्स अच्छा है या बुरा?
10 min
सेक्स अच्छा या बुरा नहीं होता। अगर आपके जीवन में हर चीज़ के लिए उलझाव है, निर्णय नहीं ले पाते, तो आप सेक्स के बारे में भी अच्छा-बुरा, सही-गलत सोचेंगे। अगर आप सही जिंदगी जी रहे हो, हक़ीक़त के साथ हो, तो सेक्स पर सोचना नहीं पड़ेगा। होगा तो होगा, नहीं होगा तो नहीं होगा। जीवन में एक प्रवाह रहेगा, और तुम्हारे मन पर सेक्स एक बोझ की तरह नहीं रहेगा।
सिर्फ़ मेरी बात नहीं है  हज़ारों जानें बच सकती हैं  मुझे जाना होगा!
सिर्फ़ मेरी बात नहीं है हज़ारों जानें बच सकती हैं मुझे जाना होगा!
6 min
15 नवंबर को गीता सत्र से कुछ घंटे पहले, देश की बड़ी पशु कार्यकर्ता, गौरी मौलेखी जी का एक संदेश आया। उन्होंने आचार्य जी से नेपाल में होने वाले ‘गढ़ीमाई महोत्सव’ के विषय पर बिहार के, मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और प्रेस से बातचीत के लिए पटना आने का अनुरोध किया। यह एक गंभीर मुद्दा था—हजारों जानवरों की जान बचाने का और एक सदियों पुरानी कुप्रथा के विरुद्ध आवाज़ उठाने का।
अकेलापन
अकेलापन
5 min
हम अकेले होते ही नहीं हैं क्योंकि हमारे दिमाग में घर, दफ़्तर, बाज़ार और अतीत की हजार आवाज़ें बोल रही होती हैं, और वो हमें चैन से जीने नहीं देतीं। अकेलापन आध्यात्म में उच्चतम अवस्था होती है। जब भी लगे कि बहुत सूनापन है, तो देख लो कि क्या है जो आकर्षित कर रहा है, और मिल नहीं रहा। जो तुम्हारे दिमाग को खाली करता हो, साफ़ करता हो, वही कीमती चीज़ है। अगर दिमाग साफ़ है, तो अकेलापन नहीं सताएगा।
आचार्य नागार्जुन – जीवन वृतांत
आचार्य नागार्जुन – जीवन वृतांत
2 min

आचार्य नागार्जुन की जीवन कथा का आंरभिक विवरण चीनी भाषा में उपलब्ध है, जिसे क़रीब 405 ई. में प्रसिद्ध बौद्ध अनुवादक कुमारजीव ने उपलब्ध कराया। यह अन्य चीनी एवं तिब्बती वृत्तांत से सहमत हैं कि नागार्जुन दक्षिण भारत में एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे। ऐतिहासिक रूप से बचपन की

महिला ही महिला की दुश्मन?
महिला ही महिला की दुश्मन?
19 min
महिला का सबसे ज़्यादा अपमान तो खुद महिला करती है। नाम है ‘शक्ति’ और जीवन है पूरा ‘अशक्त’। अगर लड़की इतनी ही बुरी चीज़ है, तो आप क्यों लड़की हो? आप खुद जिस लिंग की हो, आप उस लिंग के प्रति भी अपमान से भरी हुई हो। पाँच करोड़ महिलाएँ भारत की आबादी से गायब हैं। इनकी हत्या करी गयी है। इससे बड़ा नरसंहार कोई होगा। ये सबसे बड़ा मुद्दा होना चाहिए देश में, बहस में, मीडिया में। लेकिन इसकी कोई बात नहीं करना चाहता। क्योंकि ये नारीसंहार है, इसीलिए इसे नरसंहार भी नहीं माना जाता।
सांसारिक काम करते हुए अध्यात्म के साथ कैसे रहें?
सांसारिक काम करते हुए अध्यात्म के साथ कैसे रहें?
14 min
सांसारिक कर्म आप कर ही नहीं रहे हैं। सांसारिक कर्म हो रहे हैं अपनेआप। मूल भ्रम यही है कि सांसारिक कर्म करने वाले आप हैं। इन्द्रियाँ हैं, मस्तिष्क है, बुद्धि है, अंतःकरण है, स्मृति है, ये सब अपना काम करना बख़ूबी जानते हैं। आप न जाने किस दंभ में हैं कि ये सब काम दुनिया के आप कर रहे हैं!
आतंकवादी कैसे पैदा होते हैं?
आतंकवादी कैसे पैदा होते हैं?
30 min
हम अपनी देह के साथ डर लेकर पैदा होते हैं। चूँकि हम में डरने की वृत्ति है, इसलिए समाज भी हमें डरा लेता है। डर से मान्यता आती है, और वही मान्यता आतंकवादी भी बनाती है। चेतना का धर्म आनंद की ओर जाना है। यदि किसी के भीतर यह मान्यता बैठ गई है कि कुछ लोग दुश्मन हैं और उन्हें मारकर आनंद या जन्नत मिलेगी, तो वह मारेगा। आतंकवादी भी अपनी सामाजिक व्यवस्था और धार्मिक मान्यताओं का गुलाम है। अज्ञान ही हर हिंसा का कारण है, और अज्ञान का अर्थ ही मान्यता है।
रमज़ान में ज़कात का क्या महत्त्व है?
रमज़ान में ज़कात का क्या महत्त्व है?
20 min
ज़कात माने दान, और दान वह नहीं जिसमें तुमने कुछ ऐसा छोड़ा जो तुम्हारे पास है। दान की महत्ता इसलिए है क्योंकि दान में तुम स्वयं को ही छोड़ देते हो। अहंकार तो व्यापारी होता है—वह कुछ देता भी है तो उसमें मुनाफ़ा देखकर देता है। सबसे निम्न कोटि का दान वह है जिसमें तुम देते हो और अपेक्षा करते हो कि बदले में कुछ मिले। उससे ऊपर वह दान है जिसमें यह उम्मीद नहीं बाँध रहे कि कुछ मिलेगा। ज़कात एक विधि है, जिससे ज़िंदगी में कुछ ऐसा करो जिसमें तुम्हें मुनाफ़ा नहीं चाहिए।
सही रास्ता कैसे चुनें?
सही रास्ता कैसे चुनें?
12 min
तुम्हारी समस्या यह नहीं है कि तुम्हें सही और गलत का ज्ञान नहीं है, बल्कि यह है कि सही राह सामने होने पर भी तुम उस पर दो कदम बढ़ाने का साहस नहीं करते। तुम्हें केवल अंतिम मंज़िल की उत्सुकता होती है, और आलस तुम पर हावी रहता है। जो सही और उचित प्रतीत होता है, वहां तक होशपूर्वक चलो और उसके प्रति निष्ठा रखो। जैसे-जैसे आगे बढ़ोगे, राह स्वयं खुलती जाएगी।
‘कर्म कर और फल की चिंता मत कर’ — क्या गीता में ऐसा लिखा है?
‘कर्म कर और फल की चिंता मत कर’ — क्या गीता में ऐसा लिखा है?
16 min
गीता में पहली बात तो कहीं लिखा नहीं है कि "कर्म कर और फल की चिंता मत कर" — ऐसा कोई श्लोक नहीं है। श्रीकृष्ण बस ये कहते हैं: सही कर्म कर, बस। अगर आपने सही काम उठा लिया, तो फल की चिंता आएगी ही नहीं। आपने सही काम उठाया है या नहीं — ये आप इसी बात से जाँच सकते हो कि आपको भविष्य कितना याद आ रहा है। अगर आपको बार-बार ये सोचना पड़ रहा है कि इस काम से मुझे क्या मिलेगा, तो आपने काम गलत उठाया है।
श्रीनिवास रामानुजन: महान भारतीय गणितज्ञ
श्रीनिवास रामानुजन: महान भारतीय गणितज्ञ
3 min
रामानुजन का सपना था भारत को वैज्ञानिक रूप से सशक्त बनाना। वे मानते थे कि “गणित हर विज्ञान की आत्मा है।” श्रीनिवास रामानुजन ने अपने संघर्ष और प्रतिभा से दुनिया को चौंका दिया, लेकिन उनके जीवन का संदेश इससे भी बड़ा था — ज्ञान, समर्पण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ जीवन को समझना।
‘अप्प दीपो भव’ – आख़िरी शब्द हैं
‘अप्प दीपो भव’ – आख़िरी शब्द हैं
7 min
‘अप्प दीपो भव’ — ‘अपने प्रकाश स्वयं बनो’ — यह एक बहुमूल्य वक्तव्य है, लेकिन आख़िरी है। उससे पहले बड़ी साधना करनी पड़ती है। ‘कोई गुरु आवश्यक नहीं है’, यह जानने के लिए भी कोई गुरु चाहिए। जब पूरी साधना, पूरी दीक्षा हो जाए और शिष्य की विदाई का समय आए तभी गुरु को कहना चाहिए — ‘अप्प दीपो भव’। और तभी शिष्य के कान में ये शब्द पड़ने चाहिए। भूलना नहीं, ये ‘आख़िरी’ शब्द हैं।
महँगी चीज़ें, सस्ता जीवन? सोशल मीडिया की लग्ज़री लाइफ़!
महँगी चीज़ें, सस्ता जीवन? सोशल मीडिया की लग्ज़री लाइफ़!
17 min
अपने आप को लग्ज़री देने से पहले मैं क्या पूछूँगा? क्या मेरा काम इस लायक है? बस। और जितना मेरे काम का स्तर बढ़ता जाएगा, उतना मैं अपने आप से कहता जाऊँगा, “हाँ, काम अब माँग रहा है एक नया मोबाइल फ़ोन। काम अब माँग रहा है लैपटॉप। काम माँग रहा है कि मैं ऐसी जगह पर न रहूँ जहाँ बहुत भीड़-भड़ाका हो, क्योंकि भीड़-भड़ाके में काम नहीं हो पाता।” तो मैं उस हिसाब से फिर काम की ख़ातिर, काम के सेवक की तरह, काम के साधन की तरह, काम के निमित्त की तरह, मैं अपने आप को फिर सुविधाएँ देती चलूँगी। उससे पहले नहीं।
असली प्रेम फ़िल्मों में नहीं, अध्यात्म में मिलता है
असली प्रेम फ़िल्मों में नहीं, अध्यात्म में मिलता है
14 min
दुनिया की सबसे ज़्यादा रोमांटिक पिक्चरें भारत में बनती हैं। आप घोर नाक़ाबिल हो, सारी नाक़ाबिलियत आपकी छुप जाती है जब कोई आकर बोलता है, "तुम मेरे सब कुछ हो।" मौत जैसी होती है आशिक़ी, हॉल में बैठकर आँसू बहाने से नहीं होती, मैदान में ख़ून बहाने से होती है। आशिक़ी बहुत प्यारी चीज़ होती है, पर आशिक़ी दमदार लोगों के लिए है।
अतीत की गलतियाँ कैसे सुधारें?
अतीत की गलतियाँ कैसे सुधारें?
16 min
अतीत की कोई गलती आपको परेशान करने नहीं आती। अगर आप इस वक्त परेशान हैं, तो इस वक्त ही कोई गलती हो रही है। तकलीफ़ अतीत की किसी घटना की वजह से है या वर्तमान में उस घटना को पकड़े रहने की वजह से? आप अतीत का रोना इसलिए रोते हैं ताकि वर्तमान में अतीत का मुआवज़ा वसूल सकें। थोड़े से मुआवज़े के लिए ज़िन्दगी खो देते हो। अपनी जो भी हालत है, उसका जिम्मेदार दूसरों को ठहराना छोड़िए, अपनी जिम्मेदारी अपने ऊपर लेना सीखिए।
चार पुरुषार्थ: धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष?
चार पुरुषार्थ: धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष?
14 min
आमतौर पर हमने धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को जीवन का लक्ष्य माना है। माना गया है कि धर्म, अर्थ और काम रहेगा, तो अन्ततः मोक्ष उतरेगा — यह भ्रम है। हमने यह बड़ी-से-बड़ी गलती की है कि धर्म को अर्थ और काम को प्राप्त करने का साधन बना लिया है। हमारी इच्छाओं की पूर्ति का नाम धर्म नहीं हो सकता; वो तो कोई दुकान होगी। ऋषि अष्टावक्र कहते हैं कि यदि धर्म वो है जो अर्थ और काम की सेवा में लगा हुआ है, तो अर्थ और काम को ही नहीं, धर्म को भी त्याग दो — इनको त्यागना ही मोक्ष है।
मूल्य चुकाओ, आनन्द पाओ
मूल्य चुकाओ, आनन्द पाओ
51 min
गीता आपको यह बताने के लिए है कि आपकी सब चिन्ताओं के साथ-साथ जो आपकी चिन्ताओं को नष्ट कर सकता है, वो भी आपको उपलब्ध है। आपको चुनाव करना है और मूल्य चुकाने को तैयार रहना है। अर्जुन के एक ओर माँ प्रकृति हैं जो कह रही हैं, ‘मेरे बहाव में बहो,’ और दूसरी ओर श्रीकृष्ण हैं जो कह रहे हैं, ‘मेरी ओर बढ़ो और रास्ते में जो भी आता है, उसे सहो।’ सही काम में जो पीड़ा मिले अगर उसे प्रेम का उपहार मान कर सीने से नहीं लगा सकते, तो उसे दवाई का कड़वा घूँट ही मानकर बस सह लो। सच्चाई के मार्ग पर जो तमाम अनुभवों में अडिग रहता है, वो आनन्द का अधिकारी है।
डर क्या है?
डर क्या है?
39 min
डर चेतना की सबसे बड़ी बीमारी है। यह आदमी को संकुचित कर देता है। डर मान्यता से उठता है। जहाँ मान्यता है, वहाँ डर होगा ही। इस बात पर डरे रहो कि कहीं ज़िंदगी से सच्चाई विदा न हो जाए — लेकिन लोग डरे हुए हैं कि कहीं ज़िंदगी से बंधन न छिन जाए। विषयों को ज़िंदगी से खदेड़ने की बात नहीं है; सच्चाई के आधार पर जीने की बात है। उसके बाद न कुछ बहुत प्यारा लगता है, न कुछ बहुत डरावना लगता है।
हेमलेखा - जीवन वृतांत
हेमलेखा - जीवन वृतांत
2 min
हेमलेखा की कहानी बड़ी अनूठी है। श्री दत्तात्रेय द्वारा रचित त्रिपुरा रहस्य में उनकी कहानी पढ़ने को मिलती है। एक तपस्वी ऋषि की पुत्री, विद्वत्ता ऐसी कि ऋषिगण आनंदित हो जाते, सौंदर्य ऐसा कि राजे मोहित हो जाते।सभी को हैरान कर देता हेमलेखा का विवेक। शारीरिक सुंदरता का उसे कोई घमंड नहीं था और राजाओं द्वारा विवाह के बदले सुख-सुविधाओं का लालच दिए जाने पर उसका सिर्फ़ एक उत्तर हुआ करता, जो खुशी सिर्फ़ पलभर की है, उसे आप खुशी कैसे मान लेते हैं?
दूसरों से प्यार क्यों नहीं मिलता?
दूसरों से प्यार क्यों नहीं मिलता?
28 min
दूसरों से प्रेम पाने की इच्छा सबसे ज़्यादा उन्हीं में देखी जाती है, जो स्वयं को प्रेम नहीं कर सकते। अगर जीवन में सच्चाई और ऊँचाई नहीं है, तो आप अपने आप को प्रेम नहीं कर पाएँगे। दूसरे आपके दिल के कटोरे में कितना भी प्यार डाल दें, वो कटोरा खाली ही रह जाना है। आप ज़िन्दगी भर यही कहते रह जाओगे कि प्यार नहीं मिला। प्रेम मत माँगो, पात्रता पैदा करो। पात्रता पैदा कर लोगे, तो अपने ही इश्क़ में पड़ जाओगे। ऐसों को फिर बाहर भी बहुत आशिक़ मिल जाते हैं, लेकिन उन्हें उनकी ज़रूरत नहीं रह जाती।
वासना सताए तो क्या करें?
वासना सताए तो क्या करें?
15 min
शरीर की निर्मिति ही ऐसी है कि वासना इसे सताएगी, वासना के बीज इसी में मौजूद हैं। शरीर को आराम दे दो, रोटी दे दो और इसे सेक्स दे दो, इसके अलावा इसे कुछ नहीं चाहिए। जीवन के पल-पल को ऊँचे-से-ऊँचे काम से परिपूर्ण रखो। कोई भी ऐसा काम जिसमें स्वार्थ न हो, जिसमें करुणा हो, रचनात्मकता हो, संगीत हो — ये सब ऊँचे काम हैं। खाली मत रहो, जो खाली होगा, वही फँसेगा।
ज़िंदगी में मुश्किलें रहेंगी, कोई बात नहीं
ज़िंदगी में मुश्किलें रहेंगी, कोई बात नहीं
15 min
इंसान होने का मतलब ही है बहुत कुछ होगा जो तुम्हारे सामर्थ्य से बाहर का होगा। एक चीज़ है तुम्हारे हक़ में। क्या? घटना कुछ भी घट रही हो, उस घटना को उत्तर क्या देना है। तुम्हारा प्रतिसाद, तुम्हारी प्रतिक्रिया, ये तुम्हारे अधिकार में हो सकते हैं। बिल्कुल संभव है कि बाहर बड़ी से बड़ी कठिनाई हो, कष्ट हो; भीतर तुम्हारे एक अस्पर्शित शांति बनी ही रहे। जो ऐसा कर ले गया, वो न सिर्फ़ जी गया, वो जीवन के पार निकल गया। सिर्फ़ उसी का जीवन सार्थक हुआ।
क्या स्त्री पुरुष बिना अधूरी है?
क्या स्त्री पुरुष बिना अधूरी है?
26 min
स्त्री को ये अनुमति ही नहीं दी गई कि वह ये सोच भी पाए कि पुरुष के बिना जीवन हो सकता है। इससे बड़ा दुश्मन किसी स्त्री का नहीं हो सकता, ये जो भाव है — "I need a man in my life," ये सब छवियाँ हैं जो आपके भीतर डाली गई हैं। जीवन को किसी सार्थक उद्देश्य में डालिए। अपने आप में पर्याप्त रहिए, उसके बाद जो रिश्ता बनता है, उस रिश्ते में प्रेम की खुशबू होती है।
आलस कैसे दूर करें?
आलस कैसे दूर करें?
6 min
आलस, एक अर्थ में तो सन्देश देता है कि जीवन नीरस है। कुछ है नहीं ऐसा कि तुममें बिजली कौंध जाए। ज़िंदगी में जिन-जिन चीज़ों में शामिल हो, उन चीज़ों को पैनी दृष्टि से देखो। प्रेम है कहीं पर? या मजबूरी में ही ढोये जा रहे हो? जहाँ मजबूरी होगी, वहाँ आलस होगा। आलस अपने आप में कोई दुर्गुण नहीं है। आलस सिर्फ़ एक सूचक है। जब कुछ अच्छा मिल जाएगा, आलस अपने आप पलक झपकते विदा हो जाएगा।
लोग शराब क्यों पीते हैं?
लोग शराब क्यों पीते हैं?
7 min
शराबी वह है, जिसे पता चल गया है कि उसे कुछ चाहिए, जो मिल नहीं रहा। उसे कुछ ऐसा चाहिए, जो उसकी चेतना को ज़रा बदल दे। शराब का काम ही यही है—जो चेतना की अवस्था होती है, उसे बदल देना। इससे बहुत-सी बातें भुला दी जाती हैं, और बहुत सारे बंधन व बोझ हट जाते हैं। तो Alcoholism या किसी भी तरह का नशा वास्तव में एक आध्यात्मिक कमी को ही दर्शाता है। यदि उसे पहले ही अध्यात्म मिल गया होता, तो उसने कभी Drugs या Alcohol को हाथ नहीं लगाया होता।
आत्मा न तो शरीर में रहती है, न शरीर का आत्मा से कोई संबंध है || आचार्य प्रशांत, अष्टावक्र गीता (2023)
आत्मा न तो शरीर में रहती है, न शरीर का आत्मा से कोई संबंध है || आचार्य प्रशांत, अष्टावक्र गीता (2023)
3 min

◾ एक ही जाति होती है - वह है "बल"। बल विकसित करो अपने भीतर।

◾ आत्मा का इस पूरे देह व्यापार से कोई लेना देना ही नहीं।

◾ मिथ्याचारी वह है जो आगे के लालच में अच्छा काम करता है।

◾ आत्मा का विकृत सिद्धांत ही भारत की दुर्दशा

रामकृष्ण परमहंस की एक अनूठी बात
रामकृष्ण परमहंस की एक अनूठी बात
28 min
रामकृष्ण परमहंस ने ख़ूब प्रयोग किए। वे मानने वाले लोगों में नहीं थे। ये होता है आध्यात्मिक चित्त: वो जानने से, प्रयोग करने से नहीं डरता। रामकृष्ण कह रहे हैं, “जो तुम्हारी मान्यता है, उसी का परीक्षण करो। तुम्हारी वर्तमान स्थिति से ही तुम्हारी मुक्ति का मार्ग निकलेगा: यतो मत, ततो पथ।” जंगल से गुज़र कर ही जंगल से बाहर आते हैं न! यही वो कह रहे हैं कि जहाँ फँसे हो, उसी जगह को ठीक से देखो। मुक्त होने के लिए बंधन को ही साफ़-साफ़ देखना पड़ता है। उसको पहचान लिया, तो मुक्त हो जाओगे।
सच्चा विद्रोह: अपने ख़िलाफ़ जाना
सच्चा विद्रोह: अपने ख़िलाफ़ जाना
13 min
अपने ख़िलाफ़ जाना ही सबसे मुश्किल होता है। जो अपने ख़िलाफ़ जा सकता है, वही ‘अपने’ को पाता है। आमतौर पर हम एक संस्कारित मशीन की भाँति पुराने बहाव में बहे चले जाते हैं। लेकिन अपनी वृत्तियों और संस्कारों के बहाव को तोड़ा जा सकता है। संस्कारों का तूफ़ान आता है और तुम उसमें थोड़ी देर के लिए अडिग खड़े हो जाओ — यह तुम्हारा विद्रोह हुआ। इसी विद्रोह का नाम अध्यात्म है।
खाली समय का कैसे उपयोग करें?
खाली समय का कैसे उपयोग करें?
19 min
समय मिले तो उसे तत्काल किसी सार्थक काम में लगा दो। समय का एक पल भी अपने लिए बचा लिया, तो मरोगे। व्यक्तिगत समय के अलावा और कोई नर्क नहीं है। हमें बड़ा अच्छा लगता है बोलना, ‘थोड़ा Personal Time मिलना चाहिए न।’ तुम्हारी ज़िंदगी के सब झंझट Personal Time में ही पैदा हुए थे। ये सज़ा मिली है समय चुराने की, कि आज सौ झंझटों से घिरे हुए हो।
Deh Shiva bar mohe ihai (The Spiritual Battle Within)
Deh Shiva bar mohe ihai (The Spiritual Battle Within)
14 min
Truth enlightens, so it is attractive. Maya enthrals, so it is sometimes even more attractive. Where to go — that is the battle.
स्त्री को बंधन नहीं, शिक्षा दो
स्त्री को बंधन नहीं, शिक्षा दो
17 min
स्त्री घर की धुरी है, घर का केंद्र है। तुमने अगर उसको बंधन में रख दिया, अशिक्षित रख दिया, तो पूरा घर बर्बाद होगा। लड़कियों में ये भावना बचपन से ही डाल दी जाती है कि तुम्हारी ज़िन्दगी तो दूसरों के लिए है। सबके लिए आप जो सबसे ऊँची सेवा कर सकती हैं, वो है आपकी शिक्षा। आप अगर अज्ञान और अँधेरे में रहेंगी, तो किसी का भला नहीं होने वाला है। पर-निर्भरता आपको कहीं का नहीं रहने देगी।
प्रेम विवाह बेहतर है या आयोजित?
प्रेम विवाह बेहतर है या आयोजित?
11 min
जो प्रेम का वास्तविक अर्थ नहीं समझते, वो विवाह चाहे घरवालों के कहने पर करे या फिर अपनी मर्ज़ी से करे, उसने ले-देकर चुनी तो माया ही है। हम प्रेम समझने को तैयार नहीं होते, प्रेम-विवाह करने को बड़े उतावले रहते हैं। ये जो पूरी विवाह की व्यवस्था को रच रहा है, वो कौन है? वो भीतर बैठा मन है। उस मन को हम समझते हैं क्या? उसको नहीं समझा तो उसके द्वारा रची गई व्यवस्था पर भरोसा कैसे कर लिया?
जिनसे मन लगाते हैं, उन्हीं से दुख क्यों पाते हैं?
जिनसे मन लगाते हैं, उन्हीं से दुख क्यों पाते हैं?
64 min

आचार्य प्रशांत: चलिए, अब ज़रा माता से कुछ बात कर ली जाए। तो सप्तशती, अब ये मुझे बहुत-बहुत, बहुत प्यारी रही है। सबसे पहले, आज से तीन साल पहले हुआ था, दो साल पहले हुआ था?

श्रोतागण: तीन साल।

आचार्य: तीन साल, तो २०२० हो गया न?

श्रोतागण: दो साल।

पैसे और भविष्य की चिंता
पैसे और भविष्य की चिंता
10 min
शरीर है, तो उसे रोटी–कपड़ा देना पड़ेगा, वह बंदोबस्त करके अलग रख दो। रुपए–पैसे की बात थोड़ा अलग रखकर देखो कि जीवन जीने का एक सार्थक तरीका क्या है। सही उद्देश्य क्या है, उसको पकड़ो। उसको पकड़ने के बाद फिर विचार करो कि काम तो सही पकड़ लिया, अब इसमें पैसा कैसे बनाया जाए। अध्यात्म और पैसा एक-दूसरे के ख़िलाफ़ नहीं हैं। अध्यात्म बस यह सिखाता है कि पैसा कहीं तुम्हारा मालिक न बन बैठे। पैसा ज़िंदगी के लिए होना चाहिए, ज़िंदगी पैसे के लिए नहीं; ज़िंदगी सच्चाई के लिए होनी चाहिए।
इतनी कामवासना प्रकृति नहीं, समाज सिखाता है
इतनी कामवासना प्रकृति नहीं, समाज सिखाता है
29 min

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैंने अपने मन को बहुत टटोला, और पाया कि मेरा मन डरा हुआ है और अपने-आपको हीनता भरी निगाहों से देखता है। मुझे इतना जिस चीज़ ने गिराया है वो है मेरी कामुकता। इस कामुकता ने मुझसे बहुत ग़लत काम करवाए हैं, जिससे मैं अपने-आपको बहुत हीन

पढ़ना क्यों ज़रूरी है?
पढ़ना क्यों ज़रूरी है?
14 min
मूलभूत शिक्षा लेनी ज़रूरी होती है। कुछ बातें हैं दुनिया की, जो नहीं पता होंगी तो पूरे इंसान भी नहीं बन पाओगे। विद्या-अविद्या दोनों चाहिए। अविद्या माने सांसारिक भौतिक शिक्षा और विद्या माने आध्यात्मिक शिक्षा। उपनिषद् कहते हैं, जिनके पास विद्या नहीं होती, वो गहरे कुएँ में गिरते हैं। लेकिन जिनके पास सांसारिक ज्ञान नहीं होता वो और ज़्यादा गहरे कुएँ में गिरते हैं। और जिनके पास दोनों हैं, वो मृत्यु को पार करके अमर हो जाते हैं।
काम में तनाव क्यों होता है?
काम में तनाव क्यों होता है?
13 min
काम तनाव तभी देता है जब आप काम सही कारणों से न कर रहे हों। जब आप सही कारणों से काम नहीं करते तो आप दो ही चीज़ों का इंतज़ार करते हो — एक रविवार का और दूसरा सैलरी डे का। काम का अंतिम उद्देश्य पैसा नहीं हो सकता। आपको काम में अर्थ ढूँढना पड़ेगा। कुछ ढूँढिए जिसमें सौंदर्य हो, सार्थकता हो, बड़ी कोई चुनौती की बात हो। तब फिर उस काम में आप घंटे नहीं गिनते, उस काम में आप परिणाम की ओर भी नहीं देखते।
असली प्रेम की क्या पहचान है?
असली प्रेम की क्या पहचान है?
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प्रेम की कसौटी यह है कि दूसरे के लिए जो हम कर रहे हैं, वह वास्तव में उसके हित का है कि नहीं। और बड़ा मुश्किल होता है निरपेक्ष आँखों से देख पाना कि दूसरे का हित कहाँ पर है। जितना आप अपने साथ सहज और सन्तुष्ट होते जाएँगे, उतना आप समझते जाएँगे कि दूसरा कौन है, कैसा है और इसीलिए उसके लिए क्या उचित है।
स्थूल शरीर क्या? सूक्ष्म शरीर क्या? कारण शरीर क्या? || तत्वबोध पर (2019)
स्थूल शरीर क्या? सूक्ष्म शरीर क्या? कारण शरीर क्या? || तत्वबोध पर (2019)
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स्थूलशरीरं किम्? पंचीकृतपञ्चमहाभूतै: कृतं सत्कर्मजनयं सुखदुःखादिभोगायतरन शरीरं अस्ति जायते वर्धते विपरिणमते अपक्षीयते विनश्यतीति षड्विकारवदेतत्स्थूलशरीरं।

सूक्ष्मशरीरं किम्? अपंचीकृतपञ्चमहाभूतै: कृतं सत्कर्मजनयं सुखदुःखादिभोगसाधनं पञ्चज्ञानेन्द्रियाणि पञ्चकर्मेन्द्रियाणि पञ्चप्राणादयः मनश्वैचकं बुद्धिश्वैचकं एवं सप्तदशाकलाभिः सह यत्तिष्ठति तत्सूक्ष्मशरीरं।

स्थूल शरीर क्या है? जो पंचीकृत पाँच महाभूतों से बना हुआ, पुण्य कर्म से प्राप्त, सुख-दु:खादि भोगों को भोगने का

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