हम अपनी देह के साथ डर लेकर पैदा होते हैं। चूँकि हम में डरने की वृत्ति है, इसलिए समाज भी हमें डरा लेता है। डर से मान्यता आती है, और वही मान्यता आतंकवादी भी बनाती है। चेतना का धर्म आनंद की ओर जाना है। यदि किसी के भीतर यह मान्यता बैठ गई है कि कुछ लोग दुश्मन हैं और उन्हें मारकर आनंद या जन्नत मिलेगी, तो वह मारेगा। आतंकवादी भी अपनी सामाजिक व्यवस्था और धार्मिक मान्यताओं का गुलाम है। अज्ञान ही हर हिंसा का कारण है, और अज्ञान का अर्थ ही मान्यता है।
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प्रश्नकर्ता: सबसे पहले तो सर खुशी हो रही है मुझे आपके समक्ष अपना प्रश्न रखने की। और मेरा प्रश्न सर आज का आतंकवाद से जुड़ा हुआ है। अभी हाल ही में रूस की राजधानी मॉस्को के एक मॉल में आतंकवादी हमला हुआ है। तो सर आतंकवादियों ने बड़ी क्रूरता बरती है। और ये हमले कोई नए नहीं हैं, होते ही रहते हैं। भारत के अन्दर छब्बीस/ग्यारह (२६/११) मुंबई में सन् २००८ में हुआ था। पाकिस्तान के इस्लामाबाद के एक आर्मी स्कूल में फायरिंग हुई थी, बच्चों की जान ले ली गई थी। तो सर हम एक-दूसरे की जान के पीछे क्यों पड़े हुए हैं? ये क्रूरता सर कहाँ से आ रही है? मैं इस पर स्पष्टता चाहता हूँ, देखी नहीं जाती सर ये। लोगों पर गोलियाँ चलाना…
आचार्य प्रशांत: देखो, इसका जो जवाब है, वो चटपटा नहीं है। जब ऐसी घटनाएँ होती हैं न, जो हमें झकझोर देती हैं तो हम उनके जवाब भी आँधी-तूफान जैसे ही चाहते हैं। और आँधी-तूफान जैसी घटनाओं को आँधी-तूफान जैसे ही जवाब देना, आग को आग से ही जवाब देना, सिर्फ भीतर के अहंकार को, अज्ञान को ही सन्तुष्ट करता है। तो चटपटे जवाबों में मज़ा तो आएगा, समाधान कुछ नहीं निकलेगा। एक आदमी दूसरे आदमी को क्यों मार देता है? क्योंकि उसको लगता है कि दूसरे आदमी को मारकर उसको संतुष्टि मिल जाएगी।
जो मैं बोलने जा रहा हूँ वो बात बड़ी फीकी, हो सकता है उबाऊ-सी लगेगी लेकिन असली बात ये है कि, चेतना आनंद-धर्मा होती है! चेतना का धर्म ही है, ‘आनंद की ओर जाना।’ जैसे अहम् का धर्म है आत्मा की ओर जाना न? उसी बात का समानार्थी होता है, ‘चेतना का धर्म है आनंद की ओर जाना।’ क्योंकि चेतना की जो सामान्य साधारण स्थिति होती है, वो किसकी होती है? दुख की।




