हम अकेले होते ही नहीं हैं क्योंकि हमारे दिमाग में घर, दफ़्तर, बाज़ार और अतीत की हजार आवाज़ें बोल रही होती हैं, और वो हमें चैन से जीने नहीं देतीं। अकेलापन आध्यात्म में उच्चतम अवस्था होती है। जब भी लगे कि बहुत सूनापन है, तो देख लो कि क्या है जो आकर्षित कर रहा है, और मिल नहीं रहा। जो तुम्हारे दिमाग को खाली करता हो, साफ़ करता हो, वही कीमती चीज़ है। अगर दिमाग साफ़ है, तो अकेलापन नहीं सताएगा।
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प्रश्नकर्ता: अकेलापन दूर कैसे करें?
आचार्य प्रशांत: अकेलेपन से कैसे मुकाबला करें? कैसे सामना करें? अकेलापन झूठ है क्योंकि जो अकेला है वो अकेला है नहीं। जो अकेला होता है उसकी तो सारी समस्याएँँ ही खत्म हो जाती हैं। आप कहते हो अकेलापन आपकी बीमारी है। अकेलापन कभी बीमारी नहीं होती। अकेलेपन का तो वास्तविक अर्थ होता है कि दूसरे को लेकर परेशान होना, दूसरे को लेकर प्रभावित होना, दूसरे का व्यर्थ संज्ञान लेना छोड़ दिया। अकेले तो हम कभी होते ही नहीं।
वो अवस्था जिसे आप कहते हो अकेलापन, सूनापन, वास्तव में वो अवस्था होती है जब आप भीड़ से घिरे हुए हो, जब आपके दिमाग में भीड़ का उपद्रव चल रहा है। और ये शब्दों की विडंबना है, शब्दों का झूठ है कि आप अपनी भीड़युक्त अवस्था को अकेलापन बोल देते हो।
अकेलापन उस दशा का नाम है जब आपके दिमाग में पचासों बातें, पचासों लोग, पचासों विचार और प्रभाव उथल-पुथल मचा रहे हों। तब आप कहते हो अकेलापन।




