स्त्री को ये अनुमति ही नहीं दी गई कि वह ये सोच भी पाए कि पुरुष के बिना जीवन हो सकता है। इससे बड़ा दुश्मन किसी स्त्री का नहीं हो सकता, ये जो भाव है — "I need a man in my life," ये सब छवियाँ हैं जो आपके भीतर डाली गई हैं। जीवन को किसी सार्थक उद्देश्य में डालिए। अपने आप में पर्याप्त रहिए, उसके बाद जो रिश्ता बनता है, उस रिश्ते में प्रेम की खुशबू होती है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। सर, अभी मेरी उम्र पैतीस वर्ष है। अभी तक जीवन जो देखा मैंने, उसमें ये देखा कि हमेशा एक समय पर एक विपरीत लिंगी की आवश्यकता महसूस होती है। सर, मुझे उससे कुछ चाहिए नहीं, लेकिन वो मौजूद हो कि हाँ, कोई एक विपरीत लिंगी है; और वो नहीं है तो मैं अधूरा-सा महसूस करती हूँ। मैं ये भी जानती हूँ कि कोई किसी का सहारा बन नहीं सकता, लेकिन फिर भी एक कमी महसूस होती है कि कोई हो जो साहस दे, जीवन भर साथ निभाए। सर, इस मानसिक स्थिति से उबरने का कोई मार्ग बताएँ।
आचार्य प्रशांत: आप जो बोल रही हैं उसमें उत्तर भी आपने दे ही दिया है, मैं क्या बताऊँ? मिथ्या है, माया है, आप खुद ही कह रही हैं कि कुछ चाहिए नहीं है। आपने कहा होता, ‘उससे कुछ चाहिए है,’ तो मैं आपसे बोलता, ‘आप जो चाह रही हैं वो हासिल होता नहीं है, या होता भी है तो कुछ रखा नहीं है।‘ आप खुद ही कह रही हैं स्वयं ही कि कुछ नहीं चाहिए होता लेकिन फिर भी मैं चाहती हूँ कि बस हो, उसकी मौजूदगी रहे, प्रेज़ेंस रहे, तो इसमें मैं क्या उत्तर दूँ?
आपके प्रश्न में ही उत्तर है न कि कुछ नहीं है, कल्पना है, मिथ्या है। और ऐसा लग ही रहा है अगर आपको कि चाहिए है, तो एक रख लीजिए घर में; ‘कौ-हकना’ बोलते हैं उसको गाँव में। वो जो ऐसे खड़ा होता है, ‘स्केयर-क्रो’ (पक्षियों को डराने वाला पुतला)। स्केयर-क्रो देखा है? कौ-हकना, वो ऐसे खेत में खड़ा कर देते हैं? तो मान लीजिए यही पुरुष है मेरा। पुतला पुरुष है हमारा! क्या बोला जाए इसमें, एक मौजूदगी चाहिए,




