आलस, एक अर्थ में तो सन्देश देता है कि जीवन नीरस है। कुछ है नहीं ऐसा कि तुममें बिजली कौंध जाए। ज़िंदगी में जिन-जिन चीज़ों में शामिल हो, उन चीज़ों को पैनी दृष्टि से देखो। प्रेम है कहीं पर? या मजबूरी में ही ढोये जा रहे हो? जहाँ मजबूरी होगी, वहाँ आलस होगा। आलस अपने आप में कोई दुर्गुण नहीं है। आलस सिर्फ़ एक सूचक है। जब कुछ अच्छा मिल जाएगा, आलस अपने आप पलक झपकते विदा हो जाएगा।
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प्रश्न: आचार्य जी, किसी भी काम में मन नहीं लगता। आलस बना रहता है। इस आलस से छुटकारा कैसे पाएँ?
आचार्य प्रशांत: आलस से ज़्यादा सुन्दर कुछ मिला नहीं। आलस के मज़े होते हैं। आलस से ज़्यादा मज़ेदार कुछ मिला ही नहीं अभी तक।
सुबह-सुबह बिस्तर पर पड़े रहने के मज़े होते हैं। और एक मज़ा ये होता है कि- खिड़की खोलो, सर्दी की धूप है, सामने बागीचा है, वहाँ जाओ भागकर। और अगर बागीचा ही न हो? तो पड़े रहो। फ़िर तो आलस ही सबसे ज़्यादा मज़ेदार है।
आलस सिर्फ़ ये बताता है कि जीवन में कुछ ऐसा है ही नहीं जिसकी ख़ातिर तुम दौड़ लगा दो। जैसे ही वो मिलेगा, दौड़ना शुरू कर दोगे। ‘अहम्’ को कुछ तो चाहिए न पकड़ने को। कुछ और नहीं मिलता है, तो वो आलस को पकड़ लेता है।
आलस अपने आप में कोई दुर्गुण नहीं है। आलस सिर्फ़ एक सूचक है। जब कुछ अच्छा मिल जाएगा, आलस अपने आप पलक झपकते विदा हो जाएगा।




