शराबी वह है, जिसे पता चल गया है कि उसे कुछ चाहिए, जो मिल नहीं रहा। उसे कुछ ऐसा चाहिए, जो उसकी चेतना को ज़रा बदल दे। शराब का काम ही यही है—जो चेतना की अवस्था होती है, उसे बदल देना। इससे बहुत-सी बातें भुला दी जाती हैं, और बहुत सारे बंधन व बोझ हट जाते हैं। तो Alcoholism या किसी भी तरह का नशा वास्तव में एक आध्यात्मिक कमी को ही दर्शाता है। यदि उसे पहले ही अध्यात्म मिल गया होता, तो उसने कभी Drugs या Alcohol को हाथ नहीं लगाया होता।
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प्रश्नकर्ता: शराब की लत क्यों लगती है?
आचार्य प्रशांत: हम जिनको एल्कोहॉलिक (शराबी) कह देते हैं न, वास्तव में उनमें थोड़ी ज़्यादा अभिव्यक्त — एक्सप्रेस्ड प्यास है। आम आदमी की चेतना भी प्यासी होती है लेकिन वो प्यास भी दबी-दबी रह जाती है। एल्कोहॉलिक वो है जिसे पता चल गया है कि उसे कुछ चाहिए जो मिल नहीं रहा। वो प्यासा है उसे पानी चाहिए। उसे साफ़ पानी चाहिए जो उसे मिल नहीं रहा और उसे पता चल गई ये बात। तो कहीं और तलाशता है, कहता है — यहाँ नहीं मिल रहा, प्यास नहीं बुझ रही तो कुछ और क्यों नहीं आज़माकर देखें; तो वो शराब आज़माता है। चाहिए क्या उसे?
श्रोता: पानी।
आचार्य प्रशांत: आज़मा क्या लेता है?




