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स्थूल शरीर क्या? सूक्ष्म शरीर क्या? कारण शरीर क्या? || तत्वबोध पर (2019)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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स्थूलशरीरं किम्? पंचीकृतपञ्चमहाभूतै: कृतं सत्कर्मजनयं सुखदुःखादिभोगायतरन शरीरं अस्ति जायते वर्धते विपरिणमते अपक्षीयते विनश्यतीति षड्विकारवदेतत्स्थूलशरीरं।

सूक्ष्मशरीरं किम्? अपंचीकृतपञ्चमहाभूतै: कृतं सत्कर्मजनयं सुखदुःखादिभोगसाधनं पञ्चज्ञानेन्द्रियाणि पञ्चकर्मेन्द्रियाणि पञ्चप्राणादयः मनश्वैचकं बुद्धिश्वैचकं एवं सप्तदशाकलाभिः सह यत्तिष्ठति तत्सूक्ष्मशरीरं।

स्थूल शरीर क्या है? जो पंचीकृत पाँच महाभूतों से बना हुआ, पुण्य कर्म से प्राप्त, सुख-दु:खादि भोगों को भोगने का स्थान है तथा जिसमें अस्तित्व, जन्म, वृद्धि, परिणाम, क्षय तथा विनाशरूपी षड्विकार होते हैं, वह स्थूल शरीर है।

सूक्ष्म शरीर क्या है? जो अपंचीकृत अर्थात् सूक्ष्म पाँच महाभूतों से बना हुआ, सत्कर्म से प्राप्त, सुख-दु:खादि भोगों का साधन है, जो पाँच ज्ञानेन्द्रियों, पाँच कर्मेन्द्रियों, पाँच प्राणादि, मन और बुद्धि एवं सत्रह कलाओं से युक्त है, वह सूक्ष्म शरीर है।

—तत्वबोध, श्लोक १०.१-११.२

कारणशरीरं किम्? अनिर्वाच्यनाद्यविद्यारूपं शरीरद्वयस्य कारणमात्रं सत्स्वरूपाऽज्ञानं निरवकलपरूपं यदस्ति तत्कारणशरीरं।

कारण शरीर किसे कहते हैं? जो अनिर्वचनीय, अनादि, अविद्यारूप है तथा शरीरद्वय का कारण है, जो सत्यस्वरूपता के अज्ञानरूपता और निर्विकल्परूप है, वह कारण शरीर है।

—तत्त्वबोध, श्लोक १२.१-१२.२

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, शंकराचार्य जी यहाँ पर किन कर्मों, जिससे स्थूल शरीर प्राप्त होता है तथा सत्कर्मों, जिससे सूक्ष्म शरीर प्राप्त होता है, की बात कर रहे हैं? और कारण शरीर किसे कहते हैं?

आचार्य प्रशांत: शरीरी कौन है, इसको समझना होगा। स्थूल शरीर उसे प्राप्त है जो स्थूल शरीर का अभिमानी है, जो कह रहा है, “मैं देही हूँ।” स्थूल शरीर माने हाड़-माँस। जो कह रहा है, “मैं देही हूँ”, उसे स्थूल शरीर प्राप्त है। जिसे स्थूल शरीर भी प्राप्त है, उसकी बड़ी क़िस्मत है। समझाने वालों ने कहा है, उसने बड़े पुण्य कर्म किए होंगे तब उसे देह मिली है, क्योंकि मनुष्य देह बहुत दुर्लभ अवसर है मनुष्यता के पार निकल जाने का।

हम कल ही बात करते थे कि पशु पशुता के पार नहीं निकल सकता; पशु ने जैसा जन्म लिया है, वह वैसा ही मरेगा। पशु किसी संभावना के साथ नहीं पैदा होता। पशु ने जिस दिन जन्म लिया है, उसी दिन से उसकी कहानी तय होती है। आदमी की कहानी तय नहीं है, आदमी के पास बड़ी ऊँची संभावनाएँ हैं, तो इसीलिए कहा गया है कि मनुष्य देह बड़े पुण्य कर्मों से प्राप्त होती है। किसको होती है? जो देहाभिमानी है, जो कह रहा है, “मैं हाड़-माँस हूँ”, वैश्वानर।

फिर आता है सूक्ष्म शरीर। सूक्ष्म शरीर क्या है?

जो अन्तःकरण से तादात्म्य रखता हो, वह सूक्ष्म शरीर का अभिमानी हुआ। उसने अपना रिश्ता जोड़ा है शरीर से कम और विचारों, भावनाओं और मत-अभिमत इत्यादि से ज़्यादा। वह देहजीवी नहीं है, उसको बुद्धिजीवी कह सकते हो। उसको अगर तुम कह दोगे कि, "तुम कुरूप हो", तो उसे कम बुरा लगेगा, पर अगर तुम उसे कह दोगे कि, "तू मंदबुद्धि है या तू कुबुद्धि है", तो उसे ज़्यादा बुरा लगेगा, क्योंकि उसने अपना नाता जोड़ा हुआ है सूक्ष्म शरीर से, बुद्धि से।

सत्रह कलाएँ या भीतर का जितना माहौल है, वह उससे रिश्ता रखता है। वह इससे (स्थूल शरीर) से ज़रा कम ही रिश्ता रखता है। वह अगर नहाएगा नहीं तो उसे बहुत अफ़सोस नहीं होगा, पर अगर उससे कोई गणित का सवाल नहीं हल होगा, तो वह परेशान हो जाएगा। शरीर से उसका कोई बहुत लेना-देना नहीं है।

तो ये पूछ रहे हैं कि “किन सत्कर्मों की बात हो रही है, जिससे सूक्ष्म शरीर प्राप्त होता है?”

नहीं, सूक्ष्म शरीर प्राप्त नहीं होता सत्कर्मों से। कहा यह गया है कि जो सूक्ष्म शरीर का अभिमानी है, वह निश्चित रूप से स्थूल शरीर के अभिमानी से ऊँचा है, क्योंकि विचार निर्विचार में प्रवेश करने का साधन बन सकता है। पर यदि आप देह के ही तल पर जीते रह गए तो मात्र प्राकृतिक पशुता के अलावा आपकी ज़िंदगी में कुछ और नहीं होगा।

विचार जो कर रहा है, उसके लिए संभव है कि उसे एक दिन विचार से मुक्ति भी मिल जाए, पर जिसने अभी विचार करना शुरू ही नहीं किया, उसके लिए कोई मुक्ति नहीं। तो इसलिए कहा गया है कि जिनके बड़े भाग्य होते हैं, जिन्होंने पीछे बड़े सत्कर्म किए होते हैं, वही ऐसे होते हैं, वही ऐसे हो पाते हैं कि वो सूक्ष्म शरीर से नाता रख पाएँ, सूक्ष्म शरीर के अभिमानी हो पाएँ।

तो मनुष्य देह मिलना एक दुर्लभ बात हुई और मनुष्य देह पाने के बाद विचार कर पाना, विशेषकर आत्म-विचार कर पाना और भी दुर्लभ बात हुई। तो जितना बड़ा सौभाग्य यह है कि तुम मनुष्य पैदा हुए, उससे ज़्यादा बड़ा सौभाग्य यह है कि तुम ऐसे मनुष्य पैदा हुए जो विचार कर पाता है, आत्म-विचार कर पाता है, स्वयं को देख पाता है।

तो कहा है, “कारण शरीर किसे कहते हैं?”

तुम्हारी मूल वृत्ति को कारण शरीर कहते हैं। मन के स्थूल सिरे को कहते हैं, देह और मन के बीज को कहते हैं कारण शरीर। मन का बीज होता है कारण शरीर। 'कारण' इसलिए क्योंकि उसी के कारण मन है और शरीर है और पूरा ब्रह्मांड और संसार है। वह मूल वृत्ति है, वह बीज है। तो जिस बीज से मन निकला, उस बीज का नाम है कारण शरीर।

मन को कह देते हैं सूक्ष्म शरीर और मन यदि तना है तो शाखाओं, प्रशाखाओं, पत्तों के पूरे विस्तार का नाम होता है शरीर और संसार – स्थूल।

प्र२: जो यह बीज है, जो मन का बीज है, मूल वृत्ति की जो बात हो रही है, वह अहम् की बात हो रही है?

आचार्य: हाँ, हाँ, वही, 'मेरा होना'।

प्र२: जी, जैसे मेरे होने से फिर मेरे विचार उठते हैं। और कारण शरीर का अभिमानी कौन होता है?

आचार्य: जो कारण शरीर का अभिमानी है, वह भी मुक्ति के बहुत निकट आकर भी मुक्ति से वंचित रहता है। क्यों? क्योंकि वह कहता रहता है, “मुझे मुक्ति चाहिए।” तो एक चीज़ का अभिमानी तो वह लगातार है, किसका? 'मुझे'। “मैं तो हूँ ही, तभी तो मुझे मुक्ति चाहिए।”

अंततः मुक्ति तब है जब तुम कह दो, “मुक्ति चाहिए किसे?” मुक्ति की इसीलिए कोई प्राप्ति नहीं होती, 'प्राप्ति' से मुक्ति हो जाती है। अधिकांशतः हम भागते रहते हैं मुक्ति को प्राप्त करने के लिए, पर मुक्त वह है जो प्राप्ति की दौड़ से मुक्त हो गया। उसे अब प्राप्ति नहीं करनी, वह प्राप्ति से ही मुक्त हो गया, क्योंकि प्राप्ति करने के लिए, प्राप्ति के लिए कोई चाहिए न जो प्राप्त करेगा? और यह जो प्राप्त करेगा, यही तो मूल बंधन है, इसी का नाम तो कारण शरीर है। तो आख़िरी मुक्ति यही है कि मुक्ति चाहिए नहीं। पर तुम मत कहने लग जाना मुक्ति चाहिए नहीं, वह आख़िरी वक्तव्य होना चाहिए कि मुक्ति चाहिए नहीं।

यह भी मैंने ख़ूब देखा है। कहीं कभी किसी साल मैंने ही बोल दिया होगा कि परम मुक्ति है मुक्ति से मुक्ति, कि अब मुक्ति भी नहीं चाहिए। तो दो-चार ऐसे जिनमें आज़ादी की ओर बढ़ने का दम ही नहीं था, भीरु और भगोड़े, वो चंपत हो गए। बाद में बताते हैं कि, "हमें तो मुक्ति चाहिए ही नहीं, यही तो मुक्ति है। आप ही ने तो बताया था आचार्य जी, 'मुक्ति हमें चाहिए ही नहीं, यही तो मुक्ति है'।”

तुम्हें तो मुक्ति चाहिए और तुम्हें दिल-ओ-जान से चाहिए, तुम मत कह देना कि हमें मुक्ति नहीं चाहिए।

प्र३: आदि शंकराचार्य कह रहे हैं कि बड़े पुण्यों से शरीर मिलता है और संत कबीर साहब समझाते हैं कि देह धरोगे तो दंड मिलेगा, “देह धरे का दंड है, जो पाए सो रोए।” तो इतनी भिन्नता क्यों? शंकराचार्य कह रहे हैं कि तुम्हारा बड़ा सौभाग्य है कि तुमको मनुष्य देह मिली और कबीर साहब कह रहे हैं कि यह दंड है कि तुम्हें मनुष्य देह मिली। ऐसा कैसे?

आचार्य: शंकराचार्य ऐसे देख रहे हैं कि ग़ुलाम तो तुम हो ही, क़ैद में तो तुम हो ही—हर प्रकार की देह एक क़ैद ही है—अब सब क़ैदख़ानों में से सर्वश्रेष्ठ क़ैदख़ाना है मनुष्य का शरीर। मनुष्य का शरीर सर्वश्रेष्ठ क़ैदख़ाना है, क्यों? क्योंकि इस क़ैदख़ाने में संभावना है मुक्ति की। तो मनुष्य जन्म है सर्वश्रेष्ठ क़ैदख़ाना। अब शंकराचार्य साहब ने ज़ोर दिया किस शब्द पर? तुमने कहा, सौभाग्य है कि तुम्हें सर्वश्रेष्ठ मिला। कबीर साहब ने ज़ोर दिया क़ैदख़ाने पर। कबीर साहब कह रहे हैं, "सर्वश्रेष्ठ भी मिला तो क्या, क़ैदख़ाना ही तो है!" तो कह रहे हैं कि दंड है। तो इनमें दृष्टि का अंतर है।

शंकराचार्य कह रहे हैं कि, 'बच गए बेटा, अगर कुत्ते पैदा हुए होते तो कर चुके सत्संग!' शंकराचार्य कह रहे हैं कि, 'बधाई हो! तुम मनुष्य पैदा हुए, क्योंकि अगर कुत्ते पैदा हुए होते तो कौन-सा गुरु तुम्हें सत्संग करा देता?' तो कह रहे हैं, 'सौभाग्य, सौभाग्य!' और कबीर साहब कह रहे हैं, 'लो! फिर पैदा हो गए क़ैदख़ाने में? अतिदुर्भाग्य!' दोनों ही बिलकुल ठीक कह रहे हैं। मनुष्य जन्म सर्वश्रेष्ठ क़ैदख़ाना है, शंकराचार्य देख रहे हैं ‘सर्वश्रेष्ठ’ की ओर, कबीर साहब देख रहे हैं ‘क़ैदख़ाने' की ओर, इसलिए तुम्हें उनके वक्तव्यों में भिन्नता दिखाई दे रही है।

प्र४: आचार्य जी, प्रणाम। विज्ञानमयकोश का बुद्धि से संबंध है जबकि श्री शंकराचार्य जी ने आगे चित्त की अवस्था अलग बतायी है कि चित्त ज्ञानस्वरूप है, तो क्या चित्त और बुद्धि दोनों अलग-अलग हैं? दोनों की अनुभूतियाँ अलग-अलग क्यों होती हैं? कृपया मार्गदर्शन करें।

आचार्य: चित् और चित्त अलग-अलग हैं। इन दोनों शब्दों में तुम भ्रमित हो गए। चित्त अन्तःकरण का हिस्सा है, चित् का संबंध चेतना से है, तो वो एक नहीं हैं, ये दो अलग-अलग हैं। सच्चिदानंद में जिस चित् की बात हो रही है, वह चित्त नहीं है। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार – यह चार तो अन्तःकरण का, भीतर के महकमे का हिस्सा हैं। और चित् दूसरा है, चित् वह है जिससे चेतना निकलता है, चैतन्य। तो यह दो अलग-अलग हैं।

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