सांसारिक कर्म आप कर ही नहीं रहे हैं। सांसारिक कर्म हो रहे हैं अपनेआप। मूल भ्रम यही है कि सांसारिक कर्म करने वाले आप हैं। इन्द्रियाँ हैं, मस्तिष्क है, बुद्धि है, अंतःकरण है, स्मृति है, ये सब अपना काम करना बख़ूबी जानते हैं। आप न जाने किस दंभ में हैं कि ये सब काम दुनिया के आप कर रहे हैं!
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। जब अज्ञानी दिखता है कि ये अज्ञान के संसार में फँसा हुआ है तो वो संसार से पहले मुक्ति चाहता है, तो उस तल पर उसको तो कर्ताभाव इतनी आसानी से छोड़ेगा नहीं।
आचार्य प्रशांत: स्पष्ट करिए क्या पूछ रहे हैं।
प्रश्नकर्ता: मतलब संसारी कर्म करते हुए, आप जिस आयाम की बात कर रहे हैं, उस आयाम को भी साथ में लेकर कैसे चल सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: सांसारिक कर्म आप कर ही नहीं रहे हैं। सांसारिक कर्म हो रहे हैं अपनेआप। मूल भ्रम यही है कि सांसारिक कर्म करने वाले आप हैं। इन्द्रियाँ हैं, मस्तिष्क है, बुद्धि है, अंतःकरण है, स्मृति है, ये सब अपना काम करना बख़ूबी जानते हैं। आप न जाने किस दंभ में हैं कि ये सब काम दुनिया के आप कर रहे हैं!
आप नहीं कर रहे हैं ये बात सुनने में बड़ी अविश्वसनीय लगती है। अविश्वसनीय इसलिए लगती है क्योंकि इस पर विश्वास करना बड़ा महंगा सौदा है, पर बात है ऐसी ही। न दुनिया को चलाने वाले आप हैं, न ही अपने शरीर को, अपने तंत्र को, अपने विचारों को चलाने वाले आप हैं। शरीर एक स्वायत्त इकाई है, स्वयंभू है, स्वशासित है; वो अपना काम जानता है।








