हमारा एकमात्र कर्तव्य || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
यस्वतंरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानव:।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ।।१७।।
किन्तु जो लोग सत्य में ही अनुरक्त, तृप्त और संतुष्ट हैं उनके लिए तो कर्तव्य कर्म नहीं बचते।
~ श्रीमद्भगवद्गीता, तीसरा अध्याय, कर्मयोग, श्लोक १७
आचार्य प्रशांत: सुंदर बात कही है! पिछला श्लोक समाप्त हुआ था ये कहने पर कि… read_more