देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः। परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ।।
~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 3, श्लोक 11
अर्थ: यज्ञ से देवताओं को आगे बढ़ाओ, तो वो दैवत्य तुम्हारी उन्नति करेंगे। इस तरह परस्पर (आपस में) उन्नति करते हुए तुम परम श्रेय प्राप्त करते हो।
काव्यात्मक अर्थ: *यज्ञ से देवत्व बढ़े देवत्व से बढ़ो आप परस्पर यूँ बढ़ते रहो कर यज्ञ हो निष्पाप
आचार्य जी: बोलता है हां और आप ही के भीतर ऐसा है जो बोलता है उसको ना। आप ही के भीतर एक है जो बहुत साफ सुथरा है ,और आप ही में कोई ऐसा है जो बड़ा मेला कुचेला है।
आप ही में कोई है जो किसी से नहीं डरता, और आप ही में कोई है जो बात बात पे घबरा जाता है । क्या आप इन दोनों से परिचित हैं, हुआ है, परिचय ।और आप क्या ये देखते हैं की, जीवन भर दिन भर इन दोनों में आपस में संघर्ष राहत है।
एक जो उठ बैठना चाहता है, और एक जो बोलता है अभी नींद गहरी है। इन दोनों के संघर्ष का अनुभव किया या अपने, वही महाभारत है वही कुरुक्षेत्र है ।एक जो कृष्णा की तरफ जाना चाहता है,और दूसरा कहता अरे अभी दूसरे कम बहुत बाकी हैं। इन दोनों का संघर्ष अनुभव कर पाते हैं आप अपने प्रतिदिन के जीवन में। यह दोनों ही मौजूद रहते हैं ऊपर एक जो ध्यान में उतरना चाहआचार्य जी :- जिस दिन से मनुष्य है मैंने मनुष्य की चेतना है उसी दिन से यज्ञ भी है। मनुष्य की चेतन को सही गति देने के लिए। क्योंकि मनुष्य अकेला है जिसकी चेतना कुछ विशेष मांगती है और उस विशेष को पाने का जो साधन है वो है,निष्काम कर्म, निष्काम कर्म जो आत्मज्ञान से उद्भूत होता है। और उसे निष्काम कर्म के लिए जो सबसे सफल और सुंदर प्रतीक है वह है यज्ञ इसको हम कभी नहीं भूलेंगे की यज्ञ का अर्थ गीता के संदर्भ में निष्काम कर्म है हां हवे या हवै या आहुति । वह है जो समर्पण करने योग्य है और समर्पण किया जा रहा है उसको जो हमारी वर्तमान स्थिति से ऊपर का है,तो जो कम मूल्य का है उसको बड़े मूल्य हेतु न्योछावर कर देने को या निवेश कर देने को या त्याग देने को "यज्ञ" कहते है।







