खाना कौन बनाए, यह बाद की बात है। असली मुद्दा यह है कि भोजन ज़िंदगी में इतना महत्वपूर्ण कैसे हो गया? जब जीवन में कोई ऊँचा लक्ष्य नहीं होता, जिसे खुलकर और डूबकर जिया जा सके, तो उसकी भरपाई हम जबान के स्वाद से करने लगते हैं। जिसके जीवन में ऊँचा उद्देश्य होता है, वे मसालों और घंटों लंबी रेसिपीज़ में समय नहीं गंवाते, बल्कि वे अपने जीवन को विज्ञान, कला, साहित्य, राजनीति और खेल से भरकर जीवन को स्वादिष्ट बनाते हैं। इसलिए ज़िंदगी को एक अच्छा, ऊँचा उद्देश्य दो और अपने हर पल का हिसाब रखो!
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। आचार्य जी, मेरा प्रश्न गृहिणियों के बारे में है। आम घर में कहा जाता है कि गृहिणी अगर खाना बनाए तो वो अच्छा होता है। तमाम कारण हैं। मुख्यतः ऐसे बोलते हैं कि वह बनाती है तो प्रेम से बनाती है, और प्रेम से बना खाना उसमें मेमोरी एंड वो खाएँगें तो सेहत अच्छी रहती है, परवरिश अच्छी होती है।
आचार्य प्रशांत: क्या मेमोरी...
प्रश्नकर्ता: खाने में मेमोरी होती है, प्रेम की एंड ल दैट...
दूसरा, गृहिणी के हाथ से खाना बनेगा तो उसमें प्राण ऊर्जा होती है, तो खाना पौष्टिक रहता है। तो तमाम तर्क दिए जाते हैं कि खाना घर की गृहिणी ही बनाए।
आचार्य प्रशांत: खाना कौन बनाए, यह बात की बात है। पहला मुद्दा तो यह है कि खाना ज़िन्दगी में इतनी बड़ी चीज़ होनी क्यों चाहिए? चाहे महिला बनाए, चाहे पुरुष बनाए, यह इतनी बड़ी चीज़ कैसे हो गई? उसमें जो लिंग आधारित भेदभाव वगैरह का मुद्दा है, वह बाद में आता है। सबसे पहले यह कि कोई भी व्यक्ति खाने को इतना क्यों महत्व दे रहा है कि उसके लिए रसोई में इतने सारे घंटे अनिवार्य हो जाते हैं?




