वो तुम्हें शर्मिंदा करके झुकाते हैं, तुम बेशर्म हो जाओ || आचार्य प्रशांत (2023)

प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी! आचार्य जी, आज के सत्र में आपने कहा कि सिर्फ़ जानने भर से बात नहीं बनेगी। हम जो जानते हैं, उसे हमको जीना भी पड़ेगा। और इस बात का मतलब जब मैं आत्मवलोकन करती हूँ कि मैं अपनी ज़िन्दगी में इस बात पर कितने हद तक प्रयोग कर पायी हूँ, तो मुझे ये अनुभव होता है कि इसमें एक बहुत बड़ी प्रतिबन्धक जो है, वो माया है। जो मेरी अपनी लगाव है दूसरी चीज़ों से, वो बहुत बड़ी प्रतिबन्धक है। और जैसे कि आप ये भी कहते हैं कि माया सर्वाहारी है, तो वो ज्ञान को भी खा लेती है और अपने एक संसाधन की तरह इस्तेमाल कर लेती है। तो कई हद तक स्पष्टता की तरह से देखो, तो मैं भी वोगलती कई जगह पर करती हूँ। जो समझती हूँ, जानती हूँ, उसका दुरुपयोग कर देती हूँ। तो इसगलती से समझती हूँ पर फिर भी कई बार हो जाती। वोगलती मैं करती हूँ। तो इसका मतलब कोई ऐसा कोई सूत्र या फिर कोई विधि है जो मैं इससे बच सकती हूँ।
आचार्य प्रशांत: पलटते चलिए। वो गलती सब करते हैं, सब करते हैं। हम जैसे पैदा ही हुए हैं ये खेल खेलने के लिए। गलती करो, सुधारो। जब सुधार लोगे तो थोड़ी और सूक्ष्म गलती होगी। सुधार का अन्त सुधार पर नहीं होता, सुधार का अन्त पहले की अपेक्षा थोड़ी बेहतर गलती पर होता है। अब फिर सुधारो। अब जो सुधार आएगा, उसका अन्त भी कोई अनन्त सुधार पर नहीं हो गया। उसका भी अन्त आता है पहले से भी ज़्यादा एक सूक्ष्म गलती पर।
तो पहले की गलती सुधारोगे, तो अगली गलती पर आओगे। बस अगली गलती पिछली गलती से थोड़ी सूक्ष्म हो। दोहराव नहीं होना चाहिए। बदतर गलती नहीं होनी चाहिए। ये उम्मीद तो कभी करिएगा ही नहीं कि सुधार लिया, माने सुधार लिया। माने सुधार का अन्त आ गया, सुधार का अन्त तब तक नहीं आ सकता जब तक हमारा अन्त न आ जाए। हमारा तो अन्त आ नहीं गया। हमारा माने? चाहे तो स्थूल से देह का समझें, चाहे भीतर से अहंकार का। न देह मर गई, न अहंकार मर गया। तो सुधार कैसे मर गया? देह का अन्त आया नहीं, न अहंकार का अन्त आ गया, तो सुधार का अन्त कैसे आ गया?
सुधार लगातार चलता रहेगा। सुधार चलता रहेगा। वो तो तभी सम्भव है जब गलतियाँ बची रहेंगी। तो गलती तो हमेशा बची रहेगी बस पहले से थोड़ी बारीक गलती हो, महीन गलती हो। ऐसी गलती हो जो पहले आप कर ही नहीं सकते थे। ऐसी गलती हुई है इस बार जो पहले कभी हो ही नहीं सकती थी क्योंकि अब हम जिस तल पर खेल रहे हैं पहले उस तल पर खेलते ही नहीं थे। तो अब हम गलतियाँ भी अलग करते हैं। पहले से बेहतर गलती करते हैं। पहले से किसी ऊँचे आयाम में गलती करते हैं। इस पर एक बड़ा प्रचलित शेर है, आप भी लिखिएगा खोज करके उसमें कुछ मैदाने जंग और घुटनों के बल चलें, कुछ गिरते हैं शह सवार ही, ठीक है?



