तुम्हारे पास खाली समय रहता ही नहीं, क्योंकि तुम्हारे दिमाग में वो सब चलता रहता है। और वो सब चलता इसलिए रहता है क्योंकि तुम पचास चीज़ों के गुलाम हो, वो तुम्हें खाली छोड़ती ही नहीं। जब तुम्हें लगता है कि तुम उनसे खाली हो गए, तो तुम उनकी कल्पनाओं से भर जाते हो। अगर मुझे स्त्री से बहुत आसक्ति हो, तो जब तक स्त्री सामने है तब तक तो मैं उससे लिपटा ही हुआ हूँ, और जब वो सामने नहीं है तब भी दिमाग में क्या चलेगा? उसकी कल्पना। ये फ़िलॉसफ़ी नहीं कहलाती कि तुम बैठे-बैठे कुछ सोच रहे हो, ये आसक्ति कहलाती है।
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प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। आचार्य जी, हम तो जो भी काम कर रहे हैं, वो तो हमें पदार्थ से ही जोड़ता है, तो फिर सही काम कैसे चुनें?
आचार्य प्रशांत: तुमने शुरुआत करी न, ये सवाल तो तुम्हारे सामने आया न कि सही काम क्या है। दिन-रात अगर खट रहे हैं, वो भी गलत काम करने में खट रहे हैं, तो वो तो बड़ी बेवकूफ़ी हो गई। तुम्हारे सामने ये सवाल तो आया न, ये विचार तो आया न कि सही काम क्या है। कैसे आया है ये विचार? यहाँ मौजूद हो, तुमने समय दिया। तो ऐसे ही और समय दो इस प्रश्न को कि जीवन किसलिए है।
अगर सारा समय तुम बॉस की सेवा को ही दे दोगे, तो असली प्रश्न पर विचार कब करोगे? तुम्हारे पास ज़रा भी समय है क्या जीवन के वास्तविक प्रश्नों की गहराई में उतरने के लिए? संसार का काम यही है, वो तुमको समय नहीं छोड़ता, लगातार उलझाए रखता है। तुम्हारा एक मिनट भी तुम्हारा नहीं रहने देता। बढ़िया है तुम्हें मौका ही नहीं मिलता कि थमकर देख पाओ कि ये चल क्या रहा है, ये मामला क्या है, मैं फँसा कहाँ हुआ हूँ, ये क्या चक्की चले जा रही है रोज़।




