
जो भीतर के अंधेरे को हटा सके उसके लिए नाम दिया गया गुरु। गुरु शब्द का इतना महत्त्व है कि सिखों ने मंदिर को नाम दिया गुरुद्वारा। गुरु नानक साहब उच्चतम कोटि के और असली गुरु हैं, पर कितने लोग हैं जो वास्तव में गुरु नानक साहब के जीवन पर और उनकी सीख पर चल रहे हैं? जो एक से बढ़कर एक अंधविश्वास के विक्रेता हैं, उनको हमने नाम दे दिया गुरु का। आपकी उच्चतम संभावना को जो अभिव्यक्ति देने में मदद कर सके, उसका नाम गुरु है। बहुत खोजें, बहुत संदेह से भरे रहें, परीक्षण करें, यूँ ही किसी को गुरु मत बना लीजिए।






आचार्य प्रशांत: “मनै सुरति होवे मनि बुधि।”

प्रश्नकर्ता: विशुद्ध चक्र की साधना करता था और एक दिन ऐसा लगा जैसे पार जा ही रहा हूँ, पर मन ने डराकर वापस कर दिया। फिर हिम्मत बाँधकर कोशिश की लेकिन वो मौक़ा दोबारा नहीं मिला। फिर शादी हुई और बाद में कोई दुर्घटना भी हुई जिसकी वजह से घुटने

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपके सत्संग, सेशन (सत्र) होते हैं, मन तो यह करता है कि यहीं रहें, लेकिन कार्य और यहाँ में सामंजस्य इसको कैसे बैठाएँ? वहाँ से (जॉब से) तो ये होता है कि भाग लो।


सेई तुधुनो गावही जो तुधु भावनी रते तेरे भगत रसाले।।

प्रश्नकर्ता: मेरा सवाल फिर से मृत्यु के ऊपर ही है। आम ज़िन्दगी में जीवन के बारे में बोला जाता है कि जीवन आनन्द है या जीवन यह है, पर इसमें मृत्यु की कोई बात नहीं आती। जैसे आध्यात्मिकता में भी आप देखें तो लोगों ने मृत्यु पर ज़्यादा चर्चा नहीं

कुरबाणु कीता तिसै विटहु, जिनि मोहु मीठा लाइआ ॥ – गुरु नानक

श्रोत १: आचार्य जी, एक प्रश्न इसके अनुवाद में था, लिखा था, कोई उसकी शक्ति का गुणगान करे, ये शक्ति किसके पास है?

हुकमीहोवनिजिअ

सालाही सालाहि एती सुरति न पाईआ
-नानक
अनुवाद: बिना बोध के सराहने से सुरति न सधेगी|

वक्ता: खिंथा कालु कुआरी काइआ जुगति डंडा परतीति|

वक्ता: जो तुधु भावै साई भली कार ||
जो तुझे भाता है, वही भला है| जो तुझे भाता है, सो ही भला है|
क्या भाता है उसे? क्या भाता है उसे?

वक्ता: जानो कि तुम जो भी कुछ कह रहो, ‘उसी’ का कह रहे हो, ‘उसी’ को कह रहे हो और ‘उसी’ में कह रहे हो। तुम जब गाय की बात कर रहे हो तो वास्तव में तुम गाय की नहीं ‘उसकी’ बात कर रहे हो| तुम जब यहाँ से इस…

मन जिस आयाम को देख सकता है, वो द्वैत का ही आयाम है। वहाँ उसे वो नहीं मिलता जिसकी उसे तलाश है। हमको तलाश तो सत्य की ही है, पर तरीके अनुचित हैं, क्योंकि हम होश में नहीं है। गुरु तुम्हें कुछ देता नहीं है, वो सिर्फ़ इशारा करता है कि गलत जगह खोज रहे हो। तलाश तो तुम्हारी सपना टूटने पर ही बुझेगी।
Prayer is not an activity; it is your very being. "So you cannot pray; you can only be full of prayer." Prayer is the silent call of the mind. The deeper the silence, the truer the prayer. The noisier the mind, the more it is desire, not prayer. True prayer asks for nothing; it’s simply being prayerful in every movement of the mind—eating, walking, talking.
धुरी करमु जिना कउ तुधु पाइआ ता तिनी खसमु धिआइआ ||
“Dhuri Dhuri karam jinaa ka-o tuDh paa-i-aa taa tinee khasam Dhi-aa-i-aa.”
(Only those whose karma You have pre-ordained from the very beginning, O Lord, meditate on You.
~ Asa di Vaar (Guru Granth Sahib)
Questioner: What does Karma being…
Questioner: Sir, when you were growing up, is there any special memory, or any time you realized and had this aspiration to become, or go on the spiritual path? Is there something interesting related to your life, from your childhood, that you want us to know?
Acharya Prashant: First of…
वजाइया वाजा पउण नउ दुआरे परगट कीए दसवा गुपतु रखाइआ।। ~ नितनेम (अनंदु साहिब)
आचार्य प्रशांत: ‘आनन्द साहिब’ से है कि उसने शरीर के वाद्य यन्त्र में साँस फूँकी और नौ द्वार खोल दिये लेकिन दसवें को छुपाकर रखा। दसवाँ द्वार कौनसा है? कौनसा हो सकता है दसवाँ द्वार? मन…
आचार्य: हर शब्द का अपना एक माहौल होता है, एक पृष्ठभूमि होती है, वो कहाँ से आ रहा है। तो जब मन में बहुत कुछ भरा रहे, संसार बहुत अर्थपूर्ण लगे तब शून्यता शब्द की प्रासंगिकता है।
जब लगे कि आगे-पीछे जो कुछ है, ऊपर-नीचे जो कुछ है, स्मृतियों में…
आचार्य प्रशांत: आप इधर आएँगे या नहीं, यह तो आपकी स्वेच्छा है। आप…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, नितनेम साहिब ग्रन्थ को ध्यान में रखते हुए आज का मनुष्य समय में रहते हुए समयातीत को कैसे याद रख सकता है?
आचार्य प्रशांत: कह रहे हो समय में रहते हुए समयातीत को कैसे याद रखें? समय परेशान करेगा इसलिए समयातीत को याद रखना पड़ेगा; समय ही…
जो तुझे भाते हैं वही तुझे गाते हैं। तेरे भक्त तेरे रस में डूबे होते हैं।
~ जपुजी साहिब
आचार्य प्रशांत: पहली पंक्ति का अनुवाद ये है, 'जो तुझे भाते हैं वही तुझे गाते हैं।' "रते तेरे भगत रसाले" —…
मोह हमेशा कड़वा होता है। मोह का अर्थ है अपने से बाहर किसी से…
आचार्य जी: नहीं, वो ठीक है। वो अनुवाद में गलती नहीं है। नानक कह रहें हैं कि जिसको मिलता है, वो गाता है। वो सबको दे रहा…
वक्ता: “हुकमीहोवनिजिअ,“
हुक्म से समस्त जीव हैं। जीव मात्र ‘उसकी’ इच्छा से है। जीव का क्या अर्थ होता है?
श्रोता १: कॉनशसनेस (चेतना)।
वक्ता: जीव का अर्थ होता है – वो, जो संसार को संसार देखे; सो…
~ कबीर साहब
वक्ता :गुरु और शिष्य की कहानी है। उनके संबंधों के विषय में है। अहं की आग सीने में धकधक जल रही है। अहं कहता है, “मुझे मान्यता मिले, स्वीकृति मिले, प्रशंसा मिले”।…

A modern woman calls herself liberated, yet lives anxious — anxious about age, desirability, marriage, motherhood. Acharya Prashant exposes this anxiety as proof that feminism never touched the real wound: centuries of conditioning that reduced women to bodies for pleasure and reproduction. External equality isn't enough. True freedom demands she reject the entire inheritance of tradition and simply become human — not woman, not wife, not mother by decree, but free.

प्रेम की गहराई हमेशा प्रेमी की अपनी चेतना जितनी होती है — जो जैसा है, उसका प्रेम भी वैसा ही होगा, चाहे उसे कितना भी पावन या अनोखा क्यों न मान लिया जाए। जिस चेतना ने खुद को कभी गहराई से नहीं जाना, वह प्रेम में भी सतह से आगे नहीं जा सकती। जो कोई अपने प्रेम को गहराई से परखने से बचता है, वह असल में खुद को परखने से बच रहा होता है — और यही बचाव, प्रेम के नाम पर पाला गया एक और भ्रम है।

आचार्य प्रशांत बताते हैं कि क्यों हम सही खान-पान, स्वास्थ्य और अपने ऊपर ज़रूरी खर्च से बचते हैं, लेकिन दिखावे और फ़ालतू सामाजिक परंपराओं पर पैसा बहा देते हैं। अधिकांश लोगों के लिए समस्या सिर्फ़ पैसों की कमी नहीं, बल्कि विवेक और सही प्राथमिकताओं की कमी भी है।

आध्यात्मिकता का उद्देश्य व्यक्ति को बाहरी अधिकारों से आगे आंतरिक स्वतंत्रता की ओर ले जाना है। विज्ञान और संविधान अपने-अपने क्षेत्र में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आत्म-भ्रम, गलत चुनाव और अहंकार से मुक्ति का मार्ग आत्मज्ञान से खुलता है। सच्चा गुरु शिष्य को निर्भर नहीं, स्वतंत्र बनाता है। साथ ही, शिष्य का आचरण उसके गुरु और शिक्षा का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए उसे नकल नहीं, समझ और विवेक के साथ जीना चाहिए।

We often call something “help” or “love” while secretly expecting something in return. When that return does not come, we feel hurt, revealing that the relationship was a trade, not genuine help. The ego, being unfulfilled, cannot truly love or share. Likewise, desperation to be loved makes us controllable. Real love emerges when we stop seeking validation, work on ourselves, and become so inwardly fulfilled that we no longer need to be loved.

“फॉलो योर पैशन” तभी सार्थक है, जब वह सचमुच आपका अपना हो। अक्सर जिसे हम अपनी पसंद, पैशन या इच्छा मानते हैं, वह समाज, परिवार, संस्कार और परिस्थितियों से भीतर बैठा हुआ प्रभाव होता है। वास्तविक स्वतंत्रता न बाहरी दबाव में जीने में है, न भीतर की कंडीशनिंग का गुलाम बनने में। आत्मनिरीक्षण से सही कर्म की स्पष्टता आती है और बिना बिके, बिना डरे एक गरिमापूर्ण जीवन जिया जा सकता है।

स्वतंत्रता दिवस को केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मावलोकन और सतर्कता दिवस की तरह देखने की आवश्यकता है। भारत की परतंत्रता के पीछे रहे आंतरिक कारणों को समझना ज़रूरी है, क्योंकि राजनीतिक स्वतंत्रता के बावजूद लोकधर्म, अंधविश्वास, जातिगत विभाजन, ज्ञान-विज्ञान की उपेक्षा, परंपरागत जड़ता और आत्मबल की कमी आज भी मौजूद हैं। वास्तविक देशभक्ति इन बंधनों को पहचानकर ज्ञान, आत्मनिर्भरता, वैज्ञानिक दृष्टि और जागरूक नागरिकता विकसित करने में है।

The balance between order and disorder should not be decided by personal likes or dislikes, but by what the task at hand requires. Sometimes a project demands discipline and order; at other times, more important work requires leaving things messy. The right action comes from responding to the actual need, not personal preference. Even sacrifice can be meaningful when it serves something important, but “staying backstage” should never become an excuse to avoid what one cannot tolerate.

लोकतंत्र, गणतंत्र और स्वतंत्रता केवल संविधान में लिखे शब्द नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक की चेतना पर निर्भर हैं। वास्तविक स्वतंत्रता मनमानी करने की छूट नहीं, बल्कि भीतर घुसे भय, लालच, अंधविश्वास, पूर्वाग्रह और बाहरी प्रभावों से मुक्ति है। जब नागरिक अपने ही विचारों और मान्यताओं की जाँच नहीं करता, तो लोकतंत्र भीड़तंत्र और संप्रभुता खोखली बन सकती है।

सोमवारी और काँवड़ यात्रा का बाहरी आयोजन तभी सार्थक है जब उसका संबंध शिवत्व और सत्य से हो। केवल भीड़, दिखावे, मांसाहार छोड़ने की औपचारिकता या पुत्र की कामना को धर्म मान लेना वास्तविक धर्म नहीं है। काँवड़ियों को दोष देने के बजाय उस सामूहिक मानसिकता को देखना चाहिए जो ऐसे कर्मों को जन्म देती है। धर्म का उद्देश्य लोकधर्म की रूढ़ियों को बढ़ाना नहीं, बल्कि विवेक और समझ के द्वारा उनसे मुक्त करना है।

Migration can arise from genuine needs such as safety, education, livelihood, or environmental conditions, as well as from the ego's pursuit of greater consumption and fulfilment. The challenge is to distinguish between these motives with wisdom rather than ideology. Fair, impartial screening, mutual respect between migrants and host societies, and practical integration create a balanced approach that is both humane and responsible.

सच्चा गुरु या मित्र पूजा का विषय नहीं, बल्कि दर्पण होता है, जो बिना स्वार्थ हमारी वास्तविक स्थिति दिखाता है। आध्यात्मिक मार्ग पर अंधभक्ति नहीं, बल्कि प्रेम, कृतज्ञता और व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी आवश्यक है। मुक्ति किसी गुरु के भरोसे नहीं मिलती; स्वयं को बदलने का साहस स्वयं जुटाना पड़ता है। गुरु का कार्य केवल सत्य का प्रतिबिंब दिखाना है, चलना साधक को ही होता है।

True freedom begins when we question the beliefs that make us feel trapped. Most of our suffering comes not from circumstances but from unquestioned assumptions, attachments, and imagined obligations. By suspending our beliefs, even briefly, we allow truth to enter, revealing that life always offers choice. Transformation is born from love for truth, the courage to let go, and the willingness to step beyond the boundaries created by the ego.

True love is not a biological instinct, emotional attachment, or social conditioning. Biology and science explain the body's drives, but they cannot explain the self that seeks freedom. Love is the inner restlessness to move from ignorance and bondage toward truth and liberation. Religion is not rituals or inherited beliefs but this personal journey of understanding. Freedom—not possession or conformity—is the essence of both love and religion.

प्रेम का मार्ग सुरक्षा नहीं, बल्कि घायल होने का साहस माँगता है। जो चोट, हार, पीड़ा और ठगे जाने से डरता है, वह सत्य और प्रेम तक नहीं पहुँच सकता। अहंकार हर कीमत पर जीत चाहता है, जबकि प्रेम हारना, झुकना और दर्द को स्वीकारना सिखाता है। जो छोटी-छोटी हारों का अभ्यास करता है, वही अंततः अहंकार हारकर हरि को पा सकता है। सच्ची शक्ति दूसरों को हराने में नहीं, बल्कि प्रेम के लिए स्वयं घायल होने में है।

The Bhagavad Gita deserves reverence not because of inherited beliefs about its author, but because of its power to dissolve falsehood and reveal Truth. Real devotion is not ritual or blind faith—it is understanding, inquiry, and living the wisdom of the Gita. Through sincere study, one discovers the true meaning of Krishna, making the Gita the most authentic path to knowing and worshipping Him.

आत्मसम्मान उपलब्धियों से नहीं, अपनी पहचान से जन्म लेता है। जब तक हम स्वयं को केवल शरीर मानते हैं, तब तक प्रकृति और समाज की अपेक्षाएँ हमें अधूरा महसूस कराती रहती हैं। सच्ची मुक्ति तब है जब हम जैविक और सामाजिक बंधनों से ऊपर उठकर चेतना के अनुसार जीवन जिएँ। शरीर साधन है, साध्य नहीं। जीवन का उद्देश्य प्रकृति के आदेशों का पालन नहीं, बल्कि अपने बंधनों को पहचानकर उन्हें तोड़ते हुए स्वतंत्रता और आत्मबोध की ओर बढ़ना है।

Truth cannot be forced upon anyone, but neither should falsehood be entertained. Genuine love is not about preserving relationships at any cost; it is about helping oneself and others break free from illusion, even if that means risking the relationship itself. Spiritual growth begins by questioning conditioning, examining falsehood without bias, and choosing authenticity over comfort. Real relationships are built on the courage to seek freedom, not convenience.

True revolution begins with inner transformation, not merely with protest. Lasting social change is possible only when individuals cultivate self-knowledge, integrity, and personal responsibility. Replacing governments or demanding reforms without examining the mind that sustains the same patterns only repeats history. Awaken yourself first, educate others with clarity and compassion, and let conscious citizens, not unconscious crowds, become the foundation of a better society.

सत्य के मार्ग पर चलने के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता बाहरी समर्थन नहीं, बल्कि भीतर की निष्ठा और साहस की होती है। जब व्यक्ति स्वार्थ, भय और सामाजिक दबाव से ऊपर उठकर न्याय का साथ देता है, तभी वास्तविक स्वतंत्रता जन्म लेती है। जीत या हार से अधिक महत्वपूर्ण है सत्य के प्रति अडिग रहना। इतिहास उन्हीं को याद रखता है जो अन्याय के सामने झुकने के बजाय अकेले खड़े होने का साहस रखते हैं।

True learning is not built on memorizing answers but on understanding reality. Memory may help in examinations, but life constantly presents new questions that demand clarity, presence, and intelligence. Education becomes meaningful only when knowledge is deeply understood and lived, not merely remembered. Real understanding frees us from dependence on rote learning and enables us to respond wisely to every new situation.

भारत की असली चुनौती तकनीक या प्रतिभा की कमी नहीं, बल्कि ऐसा सामाजिक ढाँचा है जहाँ उत्कृष्टता कुछ द्वीपों तक सीमित रह जाती है। जब समाज सत्य, स्वतंत्र सोच और मानवीय विकास के बजाय लोकधर्म, भय और सामाजिक स्वीकृति से संचालित होता है, तब स्थायी परिवर्तन संभव नहीं होता। एक बेहतर समाज केवल संसाधनों से नहीं, बल्कि साहसी, ईमानदार और जागरूक समुदायों के निर्माण से जन्म लेता है।

The crisis exposed by the NEET paper leak goes far beyond examination malpractice. When society teaches young people that a single rank determines their worth, corruption, desperation, and broken trust become inevitable. Lasting reform requires more than stricter systems—it demands a transformation in how education, success, and self-worth are understood by students, parents, teachers, and society.

समझ केवल जानकारी इकट्ठा करने या बातों को याद रखने से नहीं आती, बल्कि पूरी सजगता से वर्तमान में जीने और हर अनुभव को स्वयं देखने से आती है। जीवन हर दिन नए प्रश्न पूछता है, इसलिए रटी हुई बातें पर्याप्त नहीं होतीं। वास्तविक सीख तब होती है जब जिज्ञासा, प्रश्न और प्रत्यक्ष समझ विकसित होती है। स्मृति नहीं, बल्कि जागरूकता और समझ ही सही निर्णय, सीखने और जीवन को सार्थक दिशा देने का आधार बनती है।

आध्यात्मिक प्रगति अधिक गुरु, ग्रंथ या संस्थाएँ बदलने से नहीं, बल्कि एक सत्य को गहराई से जीने से होती है। सतही अध्ययन अहंकार को बढ़ाता है, जबकि वास्तविक अध्ययन स्वयं को बदल देता है। जो वास्तव में समझता है, उसे निरंतर नए उपाय नहीं चाहिए। विनम्रता से अपनी अधूरी समझ स्वीकार कर, एक प्रामाणिक स्रोत के साथ गहराई से जुड़े रहना ही आत्मज्ञान और आंतरिक परिवर्तन का मार्ग है।

धर्म का अर्थ अंधविश्वास या मान्यताओं को मान लेना नहीं, बल्कि निर्भीक जिज्ञासा और सत्य की खोज है। बच्चों पर धार्मिक नियम थोपने के बजाय उन्हें प्रश्न पूछने की पूरी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। भय, शर्म और अपराधबोध पर आधारित धार्मिक संस्कार व्यक्ति को सत्य से दूर और देह-केंद्रित बना देते हैं। सच्चा धर्म हर मान्यता की निष्पक्ष जाँच, तथ्य के प्रति ईमानदारी और आंतरिक स्वतंत्रता का नाम है। प्रश्नचिह्न ही धार्मिकता का सबसे बड़ा प्रतीक है।

The Bhagavad Gita is not a separate spiritual path or an escape from everyday life - it is a mirror that reveals the truth of your present life. Real spirituality begins with self-observation, not rituals or temporary practices. Lasting transformation comes when work, relationships, career, and personal growth become one integrated life driven by awareness, love, and freedom rather than ego, fear, money, or social pressure.

श्रीकृष्ण, श्रीराम और अन्य अवतारों को केवल उनके मानवीय जीवन से समझना भ्रम पैदा करता है। साकार रूप सीमित होता है, जबकि उसका उद्देश्य मनुष्य को निराकार सत्य की ओर ले जाना है। देह, परिवार या घटनाओं में कमियाँ खोजने के बजाय उनके संदेश का सार समझना आवश्यक है। विवेक, कृतज्ञता और सही दृष्टि ही आध्यात्मिक समझ का आधार हैं, जबकि हर बात में दोष ढूँढ़ना केवल अहंकार को पोषित करता है।

क्या सभी गुरु और ग्रंथ व्यर्थ हैं, या यह भी अहंकार का एक नया रूप है? इस संवाद में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि सत्य का कोई निश्चित मार्ग नहीं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि गुरु और शास्त्रों का महत्व समाप्त हो जाता है। वे मौलिकता, कृतज्ञता और बौद्धिक ईमानदारी पर ज़ोर देते हुए समझाते हैं कि जिसने जहाँ से सीखा है, उसका स्वीकार आवश्यक है। साथ ही चेतावनी देते हैं कि "मैं स्वयं ही पर्याप्त हूँ" का विचार भी अहंकार का सूक्ष्म खेल बन सकता है।