![क्या आप आचार्य प्रशांत की गीता कम्यूनिटी [इस सदी का एक अद्भुत आध्यात्मिक प्रयोग] के भाग हैं?](https://cimg.acharyaprashant.org/images/img-3dc72262-a991-4f45-a9d4-a0397e21022c/30/image.jpg)
आचार्य प्रशांत की गीता कम्यूनिटी इस सदी का एक अद्भुत आध्यात्मिक प्रयोग है।
आचार्य प्रशांत के यूं तो सोशल मीडिया इत्यादि पर तीन करोड़ से अधिक फॉलोवर और तीस करोड़ से अधिक श्रोता हैं, परंतु गीता कम्यूनिटी कुछ अलग ही बात है। इसमें मात्र वे गंभीर साधक सम्मिलित हैं जो…


प्रश्नकर्ता: मेरा सवाल फिर से मृत्यु के ऊपर ही है। आम ज़िन्दगी में जीवन के बारे में बोला जाता है कि जीवन आनन्द है या जीवन यह है, पर इसमें मृत्यु की कोई बात नहीं आती। जैसे आध्यात्मिकता में भी आप देखें तो लोगों ने मृत्यु पर ज़्यादा चर्चा नहीं



प्रश्नकर्ता: विशुद्ध चक्र की साधना करता था और एक दिन ऐसा लगा जैसे पार जा ही रहा हूँ, पर मन ने डराकर वापस कर दिया। फिर हिम्मत बाँधकर कोशिश की लेकिन वो मौक़ा दोबारा नहीं मिला। फिर शादी हुई और बाद में कोई दुर्घटना भी हुई जिसकी वजह से घुटने

आचार्य प्रशांत: खिंचाव है, आकर्षण है, किधर को जाने की इच्छा, बदल जाने का मन; कुछ अनजाना, कुछ नया पा लेने की अभीप्सा। कोई ऐसा है जिसको ये न होता हो? कोई ऐसा है जो किधर को खिंचता न हो? कोई है जिसको कुछ-न-कुछ आकर्षित न करता हो? सब हैं








“The will to live.” “The will to just continue.” That, he said, is the basic human existential tendency. I’m asking, “Don’t animals have that tendency?” At the root of all consciousness; is the will to survive and continue. We don’t want to die; the animals, too, don’t want to die, right? We feel pain, we suffer; so do animals. The reasons might be very different. Often the reasons are, in fact, not too different. Separate a human mother from her baby and you see the suffering. It’s very apparent. Separate a cow from her calf, and the suffering is much the same. Read more...


प्रश्नकर्ता: आजकल ये शायद उपयोगी आध्यात्मिकता है कि सन्तुलन बनाएँ। काफ़ी प्रसिद्ध लोग भी ये बोल रहे कि











Questioner: Namskar Acharya ji. Pardon me for not remembering exactly but in one of the shivirs where we had read ‘Gospel of Sri Ramakrishna’ to come to terms with this expression called ‘Adhikar Bhed.’
So therein Ramakrishna was saying that, “now in modern times there cannot be any Adhikar Bhed,…
प्रश्नकर्ता: नमस्कार सर, हाल ही में मैंने अपने आदर्श स्टीव जॉब्स और विराट कोहली द्वारा सुझाई गयी लोकप्रिय किताब ‘ऑटोबायोग्राफी ऑफ ए योगी’ पढ़ी, तो जीवन का अलग ही आयाम खुल गया।
उस किताब के लेखक और उनके गुरु ने, न केवल अपने पूर्व जन्मों के बारे में विस्तार से…
प्रश्नकर्ता: पिछले कुछ दिन से एक सेक्सुअल थॉट (यौन विचार) मन पर छाया रहता है। पॉर्न (अश्लील सामग्री) भी देखने लगा हूँ। जब अध्यात्म से नहीं जुड़ा था, तब भी मन इतना नहीं भागता था उन बातों की तरफ़; अभी एकदम से बहुत ज़्यादा हो गया है। पहले मुझे लगता…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, महामृत्युंजय मंत्र का जाप क्या मदद कर सकता है कुछ वृत्तियों को काबू करने के लिए? क्योंकि वृत्तियों से मुक्ति ही सत्य की ओर ले जा सकती है और यह जाप भी बंधनों से मुक्ति के लिए जाना जाता है।
आचार्य प्रशांत: 'जाना जाता है,' किसके द्वारा? …
प्रश्नकर्ता: पिछली बार चंडीगढ़ तरफ़ से आया था जी, आपसे जुड़ा था। तब मैं अकेला आया था, बिलकुल हताश, परेशान था। आज मेरी साथ श्रीमती जी भी आई हैं। मेरा प्रश्न यह है जी, जैसे संतों ने कहा है—
प्रेम-गली अति सांकरी, तामे दो न समाहिं। जब मैं था तब…
आचार्य प्रशांत: नहीं, तो उनसे आप…
तोहि मोहि लगन लगाय रे फ़कीरवा तोहि मोहि लगन लगाय रे फ़कीरवा सोबत ही मैं अपने मंदिर में सबद बान मार जगाये रे फ़कीरवा डूबत ही मैं भव के सागर में बहियाँ पकर समुझाये रे फ़कीरवा एकै बचन बचन नहीं दूजा तुम मोसे बंध छुड़ाये रे फ़कीरवा कहै कबीर सुनो…
Questioner: Acharya Ji, a good discussion happened yesterday in which many seekers participated and shared their understanding of Prakṛiti, Puruṣha and other things.
During the discussion, it was put that Prakṛiti, Puruṣha, Māyā, are mere concepts and that one is pure Ātman, never threatened and…
चार राम हैं जगत में, तीन राम…
आचार्य प्रशांत: ‘नय’ शब्द का अर्थ होता है, साधारण भाषा में, जिस चीज़ को जहाँ होना चाहिए उसका वहीं होना। जहाँ से 'न्याय' निकला था न। जो चीज़ जहाँ हो अगर वहीं है तो न्याय है। ठीक? तो अध्यात्म की दृष्टि से अन्याय सिर्फ़ एक होता है — मन का…
~ संत कबीर
प्रश्नकर्ता: तो आचार्य जी सिर्फ़ पहली पंक्ति कुछ समझ आयी, लेकिन दूसरी पंक्ति समझ नहीं आयी।
आचार्य प्रशांत: वही तो मज़ेदार है। उसको काहे नहीं समझा?
कबीर चतुराई अति घनी, हरी जपै…
प्रश्नकर्ता: सब ही भूमि बनारसी, सब नीर गंगा तोय। ज्ञानी आतम राम है, जो निर्मल घट होय।। ~गुरु कबीर साहब
आचार्य जी, मेरी समझ से इस दोहे का ये अर्थ है कि ज्ञानीजन कोई भेदभाव नहीं करते। उनके लिए सिर्फ़ गंगाजल ही पवित्र नहीं होता, बल्कि हर जगह का जल…
प्रश्नकर्ता: त्रिपुरा रहस्य में संगति के बारे में बहुत बोला गया है। मतलब सत्संगति आपको मोक्ष की ओर ले जाती है। क्या अपनी संगति हम चुन सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: बिलकुल! वहीं एक चुनाव है जो आपको जी-जान से करना चाहिए, जिस पर अड़ जाना चाहिए।
प्र: मेरे जीवन में…
आचार्य प्रशांत: जिसने बोझ उठा रखा हो, उसके लिए एकमात्र कर्तव्य क्या है? बोझ उतार दे। जिसने कोयला पकड़ रखा है जलता हुआ, उसके लिए करणीय क्या है? कोयला छोड़ दे।…
मरते मरते जग मुआ, बहुरि न किया विचार। एक सियानी आपनी, परबस मुआ संसार।।
मरते मरते जग मुआ, औरस मुआ न कोय। दास कबीरा यों मुआ, बहुरि न मरना होय।।
~कबीर साहब
आचार्य प्रशांत: मरते सभी हैं, 'एक सयानि आपनी', एक मौत होती है जो अपनी होती है। बाक़ी संसार…
प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर, मेरा नाम मोहित भाटी है। सर, कबीर दास जी का एक दोहा है :
कबीर कमल प्रकासिया, उगा निर्मला सूर। रैन अंधेरी मिट गयी, बाजे अनहद तूर।। ~ कबीर साहब
सर, इसका अर्थ क्या है? और अगर कोई व्यक्ति इस स्थिति में है तो मुक्ति उसने पा…
आचार्य: तब तुम उन …
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी! समाज में ये जो विवाह की व्यवस्था है, ये आख़िर होनी क्यों चाहिए? क्योंकि ये तो केवल सिक्योरिटी (सुरक्षा) के लिए है कि एक कॉन्ट्रैक्ट (अनुबंध) साइन (हस्ताक्षर) कर दिया, अब जीवनभर के लिए सिक्योर (सुरक्षित) हो गए। तो जब हमें मुक्ति ही चाहिए तो ये …
कबीर माया मोहिनी माहि मिलै न हाथ। मन उतारी झूठ करुँ लागी डौलै साथ।।
~ कबीर साहब
आचार्य प्रशांत: जब फरीद की बात कर रहे थे तो क्या बोला था फरीद ने, "जो तू मेरा होय रहे, सब जग तेरा होय।" "जो तू मेरा होय रहे, सब जग तेरा होय।"…
प्रश्नकर्ता: 'मैं ये नहीं हूँ' ये बात मुझे मन के तल पर तो समझ में आ गयी है, लेकिन ये मेरे जीवन में कैसे उतरे?
आचार्य प्रशांत: 'मैं नहीं' एक निगेशन (नकार) है। वो निगेशन किसी चीज़़ का ही हो सकता है, कुछ होगा तभी तो उसे निगेट करेंगे। जैसे…
प्रश्नकर्ता: कबीर कहते हैं — "माया छाया एक सी, बिरला जाने कोय। भगता के पीछे लगे, सम्मुख भागे सोय।।"
कृपया बताएँ कि दूसरी पाँत (पंक्ति) का क्या अर्थ है? मुझे तो ऐसा लगता है कि माया से पार पाना असंभव ही है! बस कुछ संयम रखा जा सकता है। माया…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा प्रश्न राजा जनक से सम्बन्धित है। वो एक शान्त, सरल और स्पष्ट जिज्ञासा करते हैं कि ज्ञान कैसे प्राप्त हो, मुक्ति कैसे हो और वैराग्य की प्राप्ति कैसे हो। मैं जब राजा जनक की स्थिति की तुलना महाभारत के अर्जुन की स्थिति से करता हूँ…
क्या सभी गुरु और ग्रंथ व्यर्थ हैं, या यह भी अहंकार का एक नया रूप है? इस संवाद में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि सत्य का कोई निश्चित मार्ग नहीं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि गुरु और शास्त्रों का महत्व समाप्त हो जाता है। वे मौलिकता, कृतज्ञता और बौद्धिक ईमानदारी पर ज़ोर देते हुए समझाते हैं कि जिसने जहाँ से सीखा है, उसका स्वीकार आवश्यक है। साथ ही चेतावनी देते हैं कि "मैं स्वयं ही पर्याप्त हूँ" का विचार भी अहंकार का सूक्ष्म खेल बन सकता है।
Kabir Saheb's message questions the very act of searching for fulfilment outside oneself. Whether through religion, relationships, success, possessions, or identity, people keep assuming that what is missing lies somewhere else. The problem is not the destination but the belief that fulfilment exists at a distance. Real freedom begins when the search turns inward, recognising that the seeker and the sought were never truly separate.
The principle of maya is founded on free choice. That's the very condition behind her existence, which is that, “I will disappear only when I choose to.” Grace is not something that happens coincidentally, randomly. Grace is a function of your own willingness. They say, “it may rain but you have to keep your umbrella aside.” The willingness to at least receive, be a recipient has to be there. Otherwise, you will remain dry and untouched.
If your trust has an object, it is mere belief, like saying, "I’ll be rescued because my friend will come." Faith is: "I do not bother whether I’m rescued; I am alright either way." Faith is not dependent on a person or reason; it reflects a fulfilled Self that is unbothered, when you are alright without an objective reason to be alright.
यह बिल्कुल भी मत सोच लेना कि जिसको होश आ गया, वह कहीं हिमालय पहुँच जाता है और दुनिया से कट जाता है। अध्यात्म दुनिया को डटकर जीने के लिए है। संत योद्धा होता है। जो बोध साहित्य पढ़ेगा, वह इसी दुनिया में जिएगा और अपनी शर्तों पर जिएगा, अपने हिसाब से जिएगा।
सिद्धांत के तल पर ज्ञान देना बहुत आसान है, पर कबीर साहब जब तक उस ज्ञान को ज़िन्दगी बनता नहीं देख लेते, छोड़ते नहीं हैं। पाखंड पर जितनी चोट संत कबीर ने की है, उतनी शायद ही किसी ने की हो। वे संत-शिरोमणि इसीलिए कहे जाते हैं, क्योंकि मजाल है कि उनकी ज़ुबान सच बोलने में काँप गई हो। जानवर की ख़ातिर अपनी जान को दाँव पर लगाने का काम कबीर साहब के अलावा किसी ने नहीं किया है। ये वो जगह है जहाँ पर संत और सूरमा में फ़र्क़ करना मुश्किल हो जाता है।
Seen a bubble in the sea? That is our story.
You came with the hands empty, empty, and nothing will you carry.
So why be caught in misery? Make merry, make merry!
Who is your family? Who is a lover really?
You are deep in illusion, happily, happily fooling yourself…
अहं अगनि हिरदै जरै, गुरू सों चाहै मान। तिनका जम न्यौता दिया, हो हमरे मिहमान॥
~ कबीर साहब
वक्ता :गुरु और शिष्य की कहानी है। उनके संबंधों के विषय में है। अहं की आग सीने में धकधक जल रही है। अहं कहता है, “मुझे मान्यता मिले, स्वीकृति मिले, प्रशंसा मिले”।…
मन जहाँ बार-बार जाकर बैठे उसी का नाम माया है। जो ही विचार मन में लगातार भरे रहें, उसी का नाम माया है। कबीर साहब कहते हैं — ‘एक माया ऐसी भी है जो राम से मिला देती है।’ मन ही है जो यत्र-तत्र भागता है। इसी मन को ऐसा क्यों न कर दें कि ये राम की ओर भागे। यही कला है जीने की कि क्या चुनें और क्या न चुनें। उसको चुनो जो तुम्हें तुम्हारे क़रीब ले आता हो और उससे बचो जो तुम्हें तुमसे दूर ले जाता हो।
कह रहे हैं कि ये तुमने जो तमाम तरह की कहानियाँ गढ़ ली हैं, ये कहानियाँ तुम्हारे अंजन का ही विस्तार हैं, निरंजन की कोई कथा नहीं हो सकती। सारी समस्या तब होती है जब धर्म में कथाएँ घुस जाती हैं। जितनी तुमने किस्से बाज़ियाँ और कहानियाँ ये खड़ी की हैं, इन्होंने ही तुम्हारे धर्म को चौपट कर दिया है। श्रीराम को निरंजन ही रहने दो, श्रीकृष्ण को भी निरंजन ही रहने दो। जैसे ही तुमने गोपी संग गोविंद बना दिया, वैसे ही मामला अंजन का हो गया। गोविंद को गोविंद रहने दो, गोपियाँ मत लेकर के आओ।
साहब नज़र रखना, मौला नज़र रखना तेरा करम सबको मिले, सबकी फ़िक्र रखना न आदमी की आदमी झेले गुलामियाँ, न आदमी से आदमी मांगे सलामियाँ जो फ़र्क पैदा हो रहे, वो फ़र्क गर्क हों सबको बराबर बाँट, ये धरती ये आसमान कोई भी न हो दर्द में, सबकी ख़बर रखना…
Acharya Prashant: Suffering is a fire that burns down a lot. It brings along a certain purification. One of the poets gave the example of a snowball. Snowball that is cleansing itself in its own blood; by melting down. When a snowball starts melting, it starts becoming cleaner. And the…
देने वाले ने तुम्हें जो भी कुछ दिया है वो सहजता में ही दे दिया है और जो तुम्हें सहज न मिल रहा हो समझ लो कि वो तुम्हारे लिए है नहीं। कबीर साहब कह रहें हैं कि जो भी कुछ सहज मिल रहा हो, वही मीठा है; और जहाँ कहीं खींचा-तानी है, ज़ोर-ज़बर्दस्ती है, वो नहीं है तुम्हारे लिए। उसकी कोशिश व्यर्थ मत करो।
Usually our love is about one special thing or person. But Kabir Sahab is saying, "Hari bhai ban rai—the entire jungle has turned green. I see greenery not merely in one tree, but in the entire jungle.” That’s the difference between common love and Kabir Sahab’s love. In your love, there is just one green tree; in Kabir Sahab’s love, the entire world has turned green: there is nothing dry anywhere anymore.
If you cannot win the love of the Lord, so what if you can lord over your neighbor? What is the good of dressing your hair and donning your feet with jingling jewelry? What is the value of all your makeup with kajal to your eyelids and vermilion to your…
जो जगेगा, वही रोएगा क्योंकि संसार बड़ी पीड़ा में है। और जो जगता है, संसार की पीड़ा अपने ऊपर ले लेता है। संतों का रोना संत की करुणा की अभिव्यक्ति है। वो तुम्हारे लिए रोते हैं, वो अपने लिए नहीं रोते। दस लोग सो रहे हैं और घर में आग लग गई है। उन दस में से एक जगा हुआ है, तनाव किसे रहेगा? एक जगे हुए आदमी को ना! जो जग जाता है, वह शिव की तरह संसार के विष को ग्रहण करता है।
हम जंगल से आए हैं। जंगल में अपने शारीरिक अस्तित्व को बनाए रखने के लिए, बदला सहयोगी होता था। बदले से मन को ठंडक मिलती है, पर बहुत थोड़े समय के लिए। मन को जो वास्तव में चाहिए, वह बदला लेने से नहीं मिलता। तुम्हें ज़्यादा फ़ायदा हो जाएगा, अगर जिसने तुम्हें नुकसान पहुँचाया है, उसे माफ़ कर दो, छोड़ दो। उसे छोड़ने में तुम्हारा अपना फ़ायदा है।