
नवरात्रि आते ही हम सोचने लगते हैं कि क्या खाना है, क्या नहीं खाना, कौन-सा हवन करना है। पर व्रत का अर्थ है संकल्प, और शुभ संकल्प एक ही है: हम जैसे हैं, वैसे न रहें। इसीलिए ये नौ दिन दुर्गा सप्तशती को समझने के लिए हैं, केवल रस्मों के लिए नहीं। जिसे हम माँ कहते हैं, वह यह पूरी प्रकृति है, और उसके ही बच्चों को चोट पहुँचाकर उसका पर्व नहीं मनाया जा सकता। क्या इस बार हम नौ दिन अपने ही जीवन को ईमानदारी से देख पाएँगे?





साल भर जो निरंजन में जिया है, उसके लिए कल राम निरंजन; और साल भर जिसने मनोरंजन ही पाला है, उसके लिए फिर पर्व भी मनोरंजन। अंजन माने क्या होता है? कालिमा। तो राम निरंजन न्यारा रे, अंजन सकल पसारा रे। समझ रहे हो? अब आपको तय करना है कि सकल पसारा माने चहुदिश जो ये व्याप्त है, आपको इसका होना है या इससे न्यारा होना है। न्यारा माने अलग, अस्पर्शित।






If you know no philosophy and you are just celebrating Holi, Diwali, or Eid, or Christmas, that's dumb. Very dumb. And you call that as your great culture. No, I will have to sacrifice goats. Bloodshed is the name of religion. What kind of religion? No crackers are needed, even if that kills the air. What is this? AQI of 1,400. But I don't bother. I'm a religious man. What are you celebrating?

माँ कोई मिथिकल कैरेक्टर नहीं हैं, इतना ही समझ लोगे तो पर्याप्त होगा। ये समूची प्रकृति, ये अस्तित्व, पूरा ब्रह्मांड जिसमें दृश्य और दृष्टा दोनों शामिल हैं, इसी को कहा जाता है माँ। और चूँकि वो बड़ी माँ हैं तो, माने एक तो होती हैं जिन्होंने इस व्यक्तिगत शरीर को, एक व्यक्ति मात्र को जन्म दिया, तो उनको हम क्या कहते हैं? माँ, माताजी। तो इसीलिए, क्योंकि वो ब्रह्मांड की ही जन्मदात्री हैं, तो उनको हम क्या बोलते हैं? बड़ी माँ। अगर इतना भी समझ लोगे कि माता से आशय क्या है, तो बहुत तरह की मूर्खताओं और अंधविश्वास से बच जाओगे।



प्रश्नकर्ता१: नमस्ते सर। सर, बकरीद आने वाली है तो कल ही मेरे दोस्तों से मेरी बात हो रही थी व्हाट्सएप पर। तो उन्हें मैंने बोला कि भई इस बकरीद पर आप बकरा मत काटना — वो हर बकरीद पर काटते हैं।

















Rama’s festival has become the festival of shopping, shoppers and shopkeepers—Rama, who never had anything to do with shops; Rama, who was never a buyer or a seller or a consumer; Shri Rama, who stands for that which can neither be bought nor be sold. This festival has turned into

You may celebrate Diwali, or you may celebrate Christmas—the weather would remain what it has to. Or is the weather exceptionally fine because today is Diwali? If it has to rain, it will rain. Life has nothing to do with your festivals or your sufferings.

Distinctions are a burden on the mind. If A is different from B, then one has to remember both A and B.

The world’s oldest calendar comes from India. They never recorded when Krishna was born, never, and they never recorded when the character called Krishna died. This was out of a simple understanding and respect that He is not a character at all. Characters come and go, so dates can be…

Yes, Holika… Not to miss out on her. A smart woman, no? A smart woman with extraordinary powers. And it’s her smartness that brought her to flames. That’s a very important message to be remembered. The more smart you are, the more clever you are, the more are the chances

I say, if you have lived up to Rama for 364 days, only then must you celebrate the festival of Rama-ness. How is it that for 364 days your life had nothing to do with Shri Rama, and on the 365th day you jump up and join the bandwagon, the…

Diwali, for most people, must be a festival of austerity, of repentance. We must, on this day, offer our prayers to Shri Rama and say, “We are very sorry, O Holy One! We are extremely sorry. We couldn’t live by your life, your message, your teachings. We are very sorry.

I say, if for 364 days you have really lived up to Rama, only then must you honestly celebrate the festival of ‘Rama-ness’. How is it that for 364 days your life really had nothing to do with Shri Rama, and on the 365th day you jump up and join…

Just think if Rama was there in his bodily shape, in his mortal life, and were to see you celebrating his festival. What would he say? He would call you, “Hey you! Yes, you! Come here. You just did something taking my name? All this tamasha (commotion) is in my…

आचार्य प्रशांत:अगर मैं अपनी हस्ती में बस देह को कीमत दूँगा तो मुझे अपना नुक़सान भी सिर्फ़ कब दिखाई देगा? जब नुक़सान होगा शरीर का। तो मैं कहूँगा, 'अब कुछ नुक़सान हुआ है।' क्यों? क्योंकि मैं ख़ुद मूल्य,


आचार्य प्रशांत: (मुस्कुराते हुए) चुन्ना भाई की कहानी सुनेंगे? ये बड़ा गूढ़ रहस्य था, जो कभी कोई जान नहीं पाया कि चुन्ना भाई आठवीं कक्षा तक पहुँचे कैसे? मैं आठवीं की बात बता रहा हूँ। ब्रह्मांड के सब रहस्यों पर से पर्दा उठ सकता है, चुन्ना भाई आठवीं तक आ

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। मुझे ये समझ में कई बार नहीं आता कि जब मैं किसी माहौल में होती हूँ तो जैसे बार-बार ये बात होती है कि माया को हमें सत्य नहीं समझना चाहिए। लेकिन जैसे मैं आज दशहरा मेले में अपने बच्चों को लेकर गयी तो मैं वहाँ पर


प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा प्रश्न ये है कि – जब हम ‘मुक्ति’ या ‘सत्य’ की बात करते हैं, तो क्या इसके बारे में हमारा कोई दृष्टिकोण होता है? मेरे अनुभव में ये आया है कि जब मुक्ति को पकड़ने की कोशिश करता हूँ, या कोई ‘


प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी, अभी कुछ दिनों से मैं एक घटनाक्रम को फॉलो कर रहा था। जिसमें एक महिला
अहंकार साधना भी करेगा तो इसलिए नहीं करेगा कि वो विसर्जित हो जाए, विगलित हो जाए, मिट जाए। वो साधना भी करेगा, श्रम भी करेगा तो इसीलिए करेगा कि वो बचा रहे बल्कि अमर हो जाए।
आज जाओ किसी रेस्तरां में खाना खाने के लिए, तो बिना बुकिंग के घुसने को नहीं पाओगे। दुनिया है, दुनिया उत्सव मना रही है। ये जो हमारे भीतर मनोरंजन और उत्सव मनाने की ख़्वाहिश रहती है, वो रहती इसीलिए है कि हम सब भीतर से बड़े सूने और उदास हैं। मनोरंजन से उदासी ख़त्म नहीं होती, सिर्फ़ कुछ समय के लिए छुपती है। पता होना चाहिए कि आपका ‘कर्तव्य’ क्या है, और जब कर्तव्य आपकी अपनी समझ से निकलता है, तो उसका नाम ‘धर्म’ हो जाता है।
आपका न्यू ईयर झूठा है। इसकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि बाकी सब कुछ तो ओल्ड है, ईयर न्यू कैसे हो गया? कैलेंडर के पन्ने फाड़ने से न्यू ईयर कहाँ से आ गया? जब न्यू आएगा, तो सब कुछ न्यू के ही रंग में नहाएगा। ईयर भी न्यू हो जाएगा, स्माइल भी न्यू हो जाएगी, आई भी न्यू हो जाएगी; जब आप ही न्यू नहीं हुए, तो ईयर कैसे न्यू हो गया? हम नहीं बदल रहे, तो हमारी ज़िंदगी में कुछ नया बदलाव कैसे आ जाएगा? अपने पुरानेपन को त्यागना होता है, यही नए का उत्सव है।
If I do not know what I want, what can be sold to me? Anything. How do you know you need anything you aspire for? No, no, that need is artificial. And not knowing yourself, you are blissfully unaware that the need is an implanted thing. Remember, the seller is not selling you just his goods. He’s also selling you the need to buy his goods.
बाहर सौ सूरज भी जगमगा रहे हों, तो उनसे कहीं ज़्यादा कीमत भीतर के एक दीये की होती है। त्योहार का अर्थ ही यही होता है कि भीतर का दीया प्रज्वलित हो जाए। मनुष्य होने के नाते, प्रज्वलन की सामग्री सब में हमेशा से ही उपलब्ध रहती है। दीया भी रहता है, तेल भी रहता है, बाती भी रहती है — लौ नहीं रहती बस; वो भीतर प्रज्वलित हो जाए, यही उत्सव होता है।
त्योहार का मतलब ही यही है कि सत्य को कीमत दो; पटाखे नहीं फोड़ने होते, झूठ फोड़ना होता है। किसी को आप सच्चाई के अलावा क्या उपहार दोगे? त्योहार कोई एक दिन की बात नहीं है; वह जीवन की बात है — “पूरा जीवन ऐसा हो कि अंधेरा हावी नहीं होने देंगे; लगातार श्रीराम की ओर ही बढ़ते रहेंगे।” राम की कोई घर वापसी नहीं होती, आपकी राम वापसी होती है।
दिवाली वह दिन है जब हम अपने जीवन को बहुत ध्यान से देखें और पूछें: हम में इतना डर क्यों है? क्योंकि जो एक बात श्रीराम के साथ बिल्कुल सामने आती है, वह है निडरता। उनके पास क्या था, कुछ भी नहीं। निहत्थे, बिना किसी संपदा के नंगे पांव दो राजकुमार जंगल में, और भिड़ किससे गए? दशानन से। दिवाली पर्व है जब हम अपने आप से पूछें कि आज के रावण कौन हैं और हम भिड़ क्यों नहीं पाते? और रावण आवश्यक नहीं है हमेशा कोई व्यक्ति ही हो। रावण एक सोच भी हो सकती है, एक प्रकार का ट्रेंड, कल्चर भी हो सकता है जिसने हमको दबा रखा हो। भीतर अपने थोड़ा रामत्व तो लाइए, वह उत्सव होगा।
राम को सोने से लगाव था? सोने की लंका, दुनिया का जो बड़े से बड़ा सोने का गढ़ हो सकता था, उसको छोड़कर आ गए। अगर अयोध्या छोड़कर चौदह वर्ष तक वन में भटक सकते हैं तो लंका क्या, इसको भी छोड़ देंगे और फिर वापस जाएँगे। ये राम थे। त्याग और राम समानार्थी शब्द हैं। क्यों न अपने घर से वो सब कुछ त्यागें, जिसकी आवश्यकता नहीं है, और फिर अपने मन से वो सब कुछ त्यागें जो व्यर्थ ही बैठा हुआ है? ऐसी दिवाली क्यों न मनाएँ?
You need to earn the right to even utter ‘Shri Ram’. If, for 364 days, you have really lived up to Shri Ram, only then must you celebrate the festival of Ramness. For 364 days, your life had nothing to do with Shri Ram, and on the 365th day, you join the noisy bandwagon. Shri Ram, who stands for that which can neither be bought nor sold, his festival has been turned into an orgy of sales and discounts. Live your life just as Shri Ram lived his life, and then you will have the right to celebrate Diwali.
रक्षा का अधिकारी वही होता है, जो दुर्बल हो। आज सबसे अधिक रक्षा की ज़रूरत पृथ्वी को है — जहाँ सैकड़ों प्रजातियाँ रोज़ विलुप्त हो रही हैं। स्त्री-पुरुष, भाई-बहन, सभी को यह संकल्प लेना होगा कि जो भी सच्चा है पर कमज़ोर पड़ रहा है, उसकी रक्षा करेंगे। यही रक्षाबंधन के प्रति हमारा सच्चा सम्मान होगा और सिर्फ़ इसी तरीके से हम इस पर्व को अमर और प्रासंगिक बना सकते हैं।
धर्म के केंद्र में करुणा बैठी है। यह सही हो ही नहीं सकता कि धर्म के नाम पर जानवर की बलि दी जाए। बात यह है कि आदमी भी बहुत हद तक पशु ही है। आपकी बेहतरी के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा आपके भीतर का जानवर है। उस भीतर के जानवर की कुर्बानी देनी होती है। बाहर के जानवर को मारकर और उसका माँस खाकर आप भीतर के जानवर को ही और बलवान बना रहे हो। जबकि बकरीद की कहानी का मर्म है — “चेतना के ऊँचे उद्देश्यों के लिए अपने भीतर की पाशविकता को पीछे छोड़ो।”
तो उन्होंने मुझे सीधा ये बोला कि भाई, हम…
जो लक्ष्य हमें एक विशेष परिस्थिति ने, एक विशेष दिन ने दिए होते हैं, उसके प्रति लिए गए संकल्प भी उस परिस्थिति और दिन के बीतते ही स्वयं भी बीत जाते हैं। जीवन का एक ही लक्ष्य हो सकता है – अपने तक वापस आ जाना। ऐसे संकल्प लें जो हर पल होश बनाए रखने में सहायक हों। ग्रंथ अध्ययन, कला, खेल, पर्यावरण और पशुओं के प्रति जागरूकता, दुनिया के बारे में समझ; ये सभी संकल्प हैं जो आपके निर्भीक और मुक्त जीवन की ओर एक नई शुरुआत करेंगे।
जो सच का प्रेमी होता है, उसके हाथ में थोड़ा-सा संसाधन भी कमाल कर देता है। रावण की पूरी सेना और सारे अस्त्र-शस्त्र, माँ सीता के एक तिनके के आगे विफल हो गए — जीत तो बस उस तिनके की हुई। उन्होंने श्रीराम, अर्थात् सत्य को ही स्वीकार किया। जो शिव-शक्ति का संबंध है, वही राम-सीता का संबंध है। सीता के रूप में शक्ति हमको सिखा रही है कि राम को अपने आगे-आगे चलने दो। जब एक बार राम जीवन में आ जाएँ, तो फिर डर, लालच, स्वार्थ के कारण विचलित मत होना।
अमृत केंद्र में है इस कहानी के।और अमृत कहां से मिलना है? आत्म मंथन से। जो जितना स्वयं को जानता जाएगा उतना वो स्वयं से माने मृत्यु से मुक्त होता जाएगा। हम जो बने बैठे हैं वही मृत्यु है। जो आप अपने आप को समझते हो ना उसी का नाम मौत है। और जितना आप खुद को देखते जाते हो उतना समझ में आता जाता है कि मैं अपने आप को जो मानता हूं वो सब व्यर्थ है। मैं वो हूं ही नहीं। “नकार नेति”। अमृत माने कुछ पाना नहीं। अमृत माने मृत्यु से मुक्त होना। यही अमृतत्व है। मृत्यु से मुक्त होना।
नौ का आँकड़ा सांकेतिक है। नौ का मतलब है बहुत सारे—शिव की शक्ति जितने भी अनंत रूपों में प्रकट हो सकती है। वह सृजन भी कर सकती है और विनाश भी। नवरात्रि हमें बताती है कि परवाह मत करो कि कर्म का रूप, रंग, नाम, आकार कैसा है। तुम यह देखो कि कर्म के पीछे 'कर्ता' कौन है। शक्ति के पीछे जो असली कर्ता बैठे हैं, उनका नाम है ‘शिव’। नवरात्रि अस्तित्व और जीवन की विविधताओं का प्रतीक है। कोई विविधता न तो अच्छी है, न बुरी। अगर मर्म ठीक है, तो सब रूप पूजनीय हैं।
किसी भी धार्मिक त्योहार पर पशु को, जीव को क्षति पहुँचाना धर्म के बिल्कुल विरुद्ध है और देवी के महोत्सव पर तो ऐसा करना महोत्सव के प्राण खींच लेने जैसी बात है। देवी माने वो जो उनका संहार करती हैं जो प्रकृति के साथ हिंसा करते हैं और हम देवी के ही दिनों में प्रकृति के साथ हिंसा करते हैं। त्योहार आता इसलिए है कि आप वैसे न रहो जैसे आप रहते हो, कुछ ऊँचे उठ पाओ, लेकिन त्योहार के दिन तो हम अपनी रही-सही तमीज़ भी गायब कर देते हैं।
ज़कात माने दान, और दान वह नहीं जिसमें तुमने कुछ ऐसा छोड़ा जो तुम्हारे पास है। दान की महत्ता इसलिए है क्योंकि दान में तुम स्वयं को ही छोड़ देते हो। अहंकार तो व्यापारी होता है—वह कुछ देता भी है तो उसमें मुनाफ़ा देखकर देता है। सबसे निम्न कोटि का दान वह है जिसमें तुम देते हो और अपेक्षा करते हो कि बदले में कुछ मिले। उससे ऊपर वह दान है जिसमें यह उम्मीद नहीं बाँध रहे कि कुछ मिलेगा। ज़कात एक विधि है, जिससे ज़िंदगी में कुछ ऐसा करो जिसमें तुम्हें मुनाफ़ा नहीं चाहिए।
होली का मतलब है कि चाहे कोई भी कीमत चुकानी पड़े और झूठ कितना भी ताकतवर हो, उसका साथ नहीं देना है। हिरण्यकश्यप सिर्फ राजा ही नहीं था, प्रह्लाद का पिता भी था। प्रह्लाद ने कहा – "आप चाहे राजा हों या मेरे पिता, मैं आपका साथ नहीं दूँगा।" समाज, सत्ता, परिवार, प्रकृति, परिस्थिति कुछ भी कहे, मुझे वही करना है जो सही है; यही होली का सार है। यह त्यौहार हमें बताने के लिए रचा गया है कि अहंकार कितना भी चालाक हो जाए, परम-सत्ता से नीचे ही रहेगा।
Holi isn’t just about colors and fun; its symbolism runs deep. Hiranyakashyap represents the ego that seeks its own continuation and misuses power for some nefarious end. Prahlad embodies detachment, valuing Truth above all relations. If you’re cunning like Holika, your own powers will destroy you. And Narsingh reminds us that God is cleverer than the cleverest—He is the source. Do not try to act too smart or be ungrateful.
The legend of Kumbh revolves around the struggle between the gods of heaven and the lords of hell. Heaven and hell exist in the mind. Heaven is where your deepest dream of freedom and contentment is realized, while hell convinces you to play safe and stay afraid. Spirituality is the journey from hell to heaven and beyond, into the absolute joy of Liberation. That is the true essence of Kumbh.
बसंत पंचमी, विद्या की देवी सरस्वती को समर्पित है। जीवन में शिक्षा दो प्रकार की होती है—विद्या और अविद्या। सांसारिक ज्ञान जैसे विज्ञान, कला, राजनीति आदि अविद्या हैं, और स्वयं को जानना विद्या। शास्त्र कहते हैं, "जब आप विद्या और अविद्या को एक साथ जानते हैं, तभी आप सच में जानते हैं।" हमारी शिक्षा प्रणाली में विद्या और अविद्या, दोनों होने चाहिए, ताकि युवाओं को "मैं कौन हूँ और मेरा दुनिया से क्या रिश्ता है," इसकी गहरी समझ मिले। यही बसंत पंचमी का वास्तविक उत्सव है।
कुंभ मेला से बड़ी सामुदायिकता पूरे विश्व में कभी नहीं होती। हर चार साल में चार अलग जगहों पर हम मिल रहे हैं। इस तरह के सम्मेलनों की वजह से भारत में सहिष्णुता, वैचारिक खुलापन और उदारवाद रहा है। किसी की बात से हम सहमत नहीं है तो हम शास्त्रार्थ करते हैं। दूसरे की बात अगर अच्छी लगती है तो हम कहते हैं ये दूसरे की बात नहीं, हमारी ही बात है। भारत को इसी ने बहुत आगे बढ़ाया है कि मिलो, बात करो, जानो और समझो।
No "New Year" will give you the "new." So many New Years have come and gone, only to become old years. If you want the new, why do you stick to the old? The new, the happiness you are looking for, will not come through experience. Look around, look at your relationships, look at your mind, your thoughts, and maybe you will suddenly cry out, “The looking itself is new.”
Man has always been attracted to the new. But attraction alone is not enough, especially when one is resistant to leaving the old ways. 'New' comes with an opportunity to change, and equally with a responsibility to act upon that change. Bridging this gap between attraction and action, Acharya Prashant guides us with practical resolves that possess the potential to bring real development—if followed honestly!
Jesus is not a mere mortal. He is the source of light, the root of all flowers and beauty. Jesus stands for the Truth, and Truth is omnipresent. In one form, he disappears; in another, he arises again. Prophets don’t come and go—they live forever. Going back into the past to look for them is the tragedy of the living. He is here, right now, in the hearts of those who love him.
प्रश्नकर्ता: सर, अभी दशहरा आ रहा है और हर साल हम दशहरा मनाते आ रहे हैं लेकिन दशहरा का वास्तविक अर्थ क्या है?
आचार्य प्रशांत: जिसके दस सिर वही रावण। रावण वो नहीं जिसके दस सिर थे। जिसके ही दस सिर हैं, वही रावण। और हम में से कोई ऐसा…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। वसंत पंचमी भारत के अलग-अलग राज्यों में मनाई जाती है और इस दिन हम देवी सरस्वती की पूजा करते हैं। देवी सरस्वती कौन हैं, और वसंत पंचमी के दिन उनकी पूजा का क्या महत्व है?
आचार्य प्रशांत: कल वसंत पंचमी का पर्व है, और ये पर्व…
Every instance of freedom from…
And if A to Z all are nothing,…
आचार्य प्रशांत: हर उत्कृष्टता एक इशारा है, एक संकेत है। आसमान की ओर संकेत है और प्रकृति के विरुद्ध विद्रोह है। जब सबको एक जैसा होना चाहिए था तो कोई ख़ास हो कैसे गया? जो ख़ास हो गया, उसको तुम मानो कि वही अगर भगवान नहीं तो भगवत्ता का प्रतिनिधि…
आचार्य प्रशांत: जो कुछ होली के नाम पर होता है उसमें प्रह्लाद तो कहीं नहीं है उसमें होलिका-ही-होलिका है लोगों ने ये जो नाम है होली लगता है इसका कुछ गलत अर्थ कर लिया। उन्हें लगा होली का मतलब है कि आज होलिका माता को याद करना है और उनको…
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, आजकल नवरात्रि के दिन चल रहे हैं। और मैं देख रहा हूँ कि बहुत समय से जितने विडियोज़ हैं उनपर नवरात्रि से जुड़े प्रश्न आ रहे हैं लोगों के। उसमें से एक प्रश्न था जो मुझे लगा कि काफ़ी ज़रूरी है आपके सामने उसे रखना। और…
आचार्य प्रशांत: ऐसों से बचना जो मिलते ही ये कहते हैं कि चल यार, वीकेंड (सप्ताहान्त) पर पीते हैं। ऐसों से बचना जो जब तुमसे मिलने आते हैं तो तुम्हारे लिए साथ में गलौटी कबाब लेकर आते हैं, बचना। ये तो आया ही है देह का सुख साथ लेकर के।…