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रक्षाबंधन मनाने वाले सब लोगों के लिए (किसको रक्षा चाहिए आज?) || आचार्य प्रशांत (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: सर, मैंने आपका संदेश पढ़ा कि रक्षाबंधन को नए और ऊँचे अर्थ दो। मैं अपने घर की एकमात्र कमाने वाली सदस्या हूँ। मेरे पिता और दोनों छोटे भाई हर तरह से मुझ पर निर्भर हैं। आज बहुत सी महिलाएँ ऐसी हैं, जिन्हें पुरुषों से किसी तरह की सुरक्षा की कोई ज़रूरत नहीं, बल्कि जो स्वयं पुरुषों को सुरक्षा दे रही हैं। तो मैं जानना चाहती हूँ कि राखी के नए और ऊँचे अर्थ क्या हो सकते हैं?

आचार्य प्रशांत: रोहिणी जी, ऐतिहासिक दृष्टि से रक्षाबंधन बहन और भाई के बीच का ही पर्व रहा भी नहीं है। भविष्य पुराण हैं, स्कन्द पुराण हैं, पद्म पुराण हैं और भागवत पुराण है इनमें ऐसे उल्लेख मिलते हैं, जहाँ पर एक व्यक्ति ने दूसरे व्यक्ति को रक्षा बाँधी, राखी बाँधी। और सिर्फ़ धागा, रक्षा का बंधन। और जहाँ वो उल्लेख मिलते हैं, उनमें ज़रूरी नहीं है कि उन दो व्यक्तियों में एक व्यक्ति स्त्री है और दूसरा पुरुष है।

जैसे भविष्य पुराण है। अब उसमें कुछ ऐसा उल्लेख आता है कि देव-दानव युद्ध चल रहा है और इंद्र, देव गुरु बृहस्पति के पास जाते हैं । इंद्र हार रहे होते हैं। तो सहायता के लिए, मार्गदर्शन के लिए जाते हैं। इंद्राणी भी साथ हैं। तो इंद्राणी एक रक्षा तैयार करती हैं, एक तरह की राखी। और उस राखी को फिर बृहस्पति, इंद्र को बाँध देते हैं। बृहस्पति, इंद्र को बाँध रहे हैं।

पहली बात, तो ये दो पुरुष हैं और दूसरी बात, बृहस्पति गुरु हैं और इंद्र एक तरह से शिष्य हैं। तो वहाँ पर राखी बाँधी जा रही है। और फिर जो वहाँ पर मंत्र कहा जा रहा है, जो स्वस्तिवाचन करा जा रहा है, जो रक्षाबंधन का अभीष्ट मंत्र ही है, उसमें क्या कहा जा रहा है?

रक्षासूत्र ‘येन बद्धो बलिराजा, दानवेन्द्रो महाबलः तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल।’

भावार्थ: “जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली दानवेंद्र राजा बलि को बाँधा गया था, उसी सूत्र से मैं तुझे बाँधता हूँ। हे रक्षे (राखी)! तुम अडिग रहना (तू अपने संकल्प से कभी भी विचलित न हो।)”

~ भविष्यपुराण

उसमें कहा जा रहा है कि जिस तरीके से एक धागे भर से दानव राज बलि को बाँध दिया गया था, उसी तरीके से मैं तुम्हें यह धागा बाँधता हूँ और अब तुम अचल रहना, अचल रहना, अचल रहना। तो ये जो धागे को बाँधने की परंपरा है, ये बहुत पुरानी है, बहुत सुंदर है। इसके बहुत गहरे अर्थ हैं। और इसके अर्थ बहन-भाई के रिश्ते को तो अपनी परिधि में लेते ही हैं, पर भाई-बहन के रिश्ते से आगे भी इसके अर्थ हैं। इसके अर्थ बहुत व्यापक हैं।

उदाहरण के लिए, ये परंपरा रही है कि जब गुरुकुलों में शिक्षा पूरी हो जाती थी और शिष्य बाहर निकलने लगता था, तो जो गुरु होता था वो शिष्य को रक्षा बाँधता था और शिष्य होता था वो गुरु को रक्षा बाँधता था। ये बात परस्पर सहयोग की होती थी। ये बात हमें उपनिषदों के शांति पाठ की याद दिलाती है। जहाँ पर गुरु-शिष्य एक-दूसरे से बोलते हैं कि हममें सदा एक-दूसरे के लिए प्रेम रहे, स्नेह रहे। हममें कभी भी एक-दूसरे के लिए वैमनस्य का कोई भाव ना आए।

तो इस तरह के पुराने उल्लेख हैं जिनसे ये प्रथा आगे बढ़ती आई है। और अब ये बहुत महत्त्वपूर्ण प्रथा हो चुकी है, बहुत सुंदर प्रथा हो चुकी है और बहुत व्यापक है। सब भाई-बहन, सब परिवार, पूरा समाज इस दिन का इंतज़ार करता है। लेकिन जो मैं कहना चाह रहा हूँ, वो ये है कि आपका प्रश्न बिल्कुल सही दिशा में है कि शायद समय आ गया है कि हम रक्षाबंधन को और व्यापक और गहरे अर्थ दें।

वो अर्थ क्या हो सकते हैं, जो आज दिए जाने चाहिए?

देखिए, बात ये है कि जो दुर्बल हो उसको रक्षा की ज़रूरत होती है न? और रक्षा का अधिकारी भी वही होता है जो दुर्बल होता है। जैसे भाई-बहन की राखी को लेकर के जो बड़ी प्रसिद्ध कथा है, वो आज से मुश्किल से पाँच-सात सौ साल पहले की है।

मेवाड़ की रानी थीं, कर्मावती। वो कमज़ोर पड़ रही थीं। बहादुर शाह आक्रमण कर रहा था। ये कहानी बहुत प्रसिद्ध है। बच्चों को उनकी पाठ्य पुस्तकों में पढ़ाई जाती है। आपने भी पढ़ी होगी। तो रानी ने क्या किया? वहाँ दिल्ली में हुमायूँ का शासन था, तो रानी ने हुमायूँ को राखी भेजी। तो वहाँ से ये लोक परंपरा और सुदृढ़ हो गई कि ये, तो भाई-बहन का ही रिश्ता है।

लेकिन बात इसमें ये है कि दुर्बल को रक्षा की ज़रूरत है। रानी दुर्बल थीं, इसलिए उन्हें रक्षा की ज़रूरत थी। ठीक है न? बात ये नहीं है कि रानी महिला थीं या रानी बहन थीं इसलिए उन्हें रक्षा की ज़रूरत थी। उन्हें रक्षा की ज़रूरत इसलिए थी क्योंकि वो दुर्बल पड़ रही थीं।

आज दुर्बल कौन है?

बिल्कुल ठीक कहा आपने कि जैसे आप अपने घर की कमाऊ सदस्या हैं और आपके पिता हैं और आपके छोटे भाई हैं, वो तो बल्कि आप पर आश्रित हैं। उसी तरीके से आज महिलाएँ जीवन के सब क्षेत्रों में आगे निकल चुकी हैं। खुद कमा रही हैं, खा रही हैं, बहुत तरीकों से बहुत मज़बूत हो चुकी हैं। तो भाई-बहन का त्योहार, तो ये है ही, उसमें एक ऐतिहासिक और परंपरागत महत्त्व है।

लेकिन बात उससे आगे जानी चाहिए। आज कमज़ोर कौन है? हमको ये देखना पड़ेगा। आज कमज़ोर सबसे ज़्यादा पर्यावरण है, पृथ्वी है। आप जानते ही हैं कि अभी स्थिति क्या है? दुनिया में बारिशें किस तरह से हो रही हैं। आप समझ रहे हैं। मौसमों का पूरा चक्र बदल गया है।

अब तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैज्ञानिकों ने ये स्वीकार भी कर लिया है कि ये जो क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन), ये जो पूरा तापमान परिवर्तन और ये पूरी विभीषिका है, ये उस हद को पार कर चुकी है जहाँ पर इसे अब वापस पलटना, ठीक करना भी शायद संभव नहीं रहा है। हम चाहते थे कि जो औसतन वैश्विक तापमान है, वो डेढ़ डिग्री से ऊपर ना जाए। पर अब वो संभव नहीं हो पाएगा।

बहुत-बहुत ज़बरदस्त ये संकट हमारे सामने खड़ा हुआ है। इस समय सबसे ज़्यादा रक्षा की ज़रूरत तो पृथ्वी को है। प्रतिदिन जीवों की सैकड़ों प्रजातियाँ हैं जो सदा के लिए विलुप्त हुई जा रही हैं। मैं एक-दो की नहीं, सैकड़ों की बात कर रहा हूँ। इसमें से कुछ तो ऐसी हैं, जो बिल्कुल प्रकृतिगत कारणों से विलुप्त हो रही हैं। हमेशा, कुछ प्रजातियाँ हैं, जो थोड़ी-थोड़ी विलुप्त होती रहती हैं।

लेकिन अधिकांशतः जो अभी ये स्पीशीज़ लॉस (प्रजाति हानि) या बायो डायवर्सिटी लॉस (जैव विविधता हानि) हो रहा है, वो आदमी की करतूत है। वो हमने किया है। वो एन्थ्रोपोजेनिक (मानव जनित) है। तो ये सब जो ख़त्म हो रहे हैं, एक-दो जानवरों की बात नहीं हो रही है, एक-दो प्रजातियों की बात हो रही है। समझ रहे हैं? पहले, तो जानवर से ऊपर प्रजाति और यहाँ पर मैंने कहा, प्रजातियों की नहीं बात हो रही, प्रजातियों में भी सैकड़ों प्रजातियों की बात हो रही है।

एक जीव ही ख़त्म हो जाए, तो ये भी एक दुःख का विषय होता है। यहाँ हम एक जीव नहीं, एक प्रजाति की बात कर रहे हैं। और फिर एक प्रजाति से आगे हम कह रहे हैं, प्रतिदिन सैकड़ों प्रजातियाँ पेड़ों की, पौधों की, छोटे-मोटे जीवों की, हर तरह के जीवों की ख़त्म हुई जा रही हैं। उन्हें इस वक़्त सुरक्षा की ज़रूरत है।

भाषा को सुरक्षा की ज़रूरत है। आप दिल्ली से हैं। दिल्ली में आपको कहीं भी लिखित में हिंदी दिखाई दे रही है? जो ये पूरा हिंदी भाषी क्षेत्र है, उसी से हमको लोगों की टिप्पणियाँ आती हैं कि ‘साहब! आप जो अपने वीडियोज़ के टाइटल (शीर्षक) हैं, और ये सब हैं, ये देवनागरी में मत लिखा करिए। ये अंग्रेज़ी में लिखा करिए। हम देवनागरी पढ़ नहीं पाते हैं।’ और ये बात कहाँ के लोग बोल रहे हैं?

ये बात कोई विदेशों के लोग या दक्षिण भारत के लोग नहीं बोल रहे हैं। ये बात लखनऊ और कानपुर के लोग बोल रहे हैं। समझ रहे हैं? आप कनॉट प्लेस निकल जाइएगा। वहाँ पर आपको कोई बैनर (कपड़े पर सूचना या विज्ञापन), होर्डिन्ग (विज्ञापन पट्ट) कुछ मिल जाए देवनागरी में लिखा हुआ, तो बात करिएगा।

इतना मैंने लोगों से बोल दिया कि भाई! अगर लिपि विलुप्त हो गई तो भाषा जाएगी। भाषा जाएगी, तो संस्कृति जाएगी, और संस्कृति जाएगी तो अध्यात्म भी चला जाएगा। अध्यात्म चला गया, तो इंसान बचेगा नहीं। ये दुर्बल हैं जो आज ख़त्म हो रहे हैं। हम कहने को कहते हैं 'सत्यमेव जयते'। लेकिन वो बात बहुत आख़िरी तौर पर ही सच होती है, और बड़े गुप्त, बड़े रहस्यमयी तरीके से सच होती है। अगर आप अपने आस-पास का माहौल देखें, तो जीत तो झूठ ही रहा है।

मैं कहा करता हूँ कि सच तो बहुत छोटे बच्चे की तरह है। उसे बड़े जतन से और बड़ी नज़ाकत से पालना-पोसना पड़ता है, बड़ा करना पड़ता है। तो सच को आज सुरक्षा की ज़रूरत है। मैंने कहा – प्रकृति, पर्यावरण, पशु, पृथ्वी। मैंने कहा – भाषा, लिपि। मैं कह रहा हूँ– सत्य। मैं कह रहा हूँ– अच्छाई, सच्चाई। इनको आज हमारा संरक्षण चाहिए।

तो रक्षाबंधन के इस महान और पुराने पर्व को हमें आज गहरे और व्यापक अर्थ देने पड़ेंगे। हमें ये साफ़-साफ़ देखना पड़ेगा कि समकालीन परिवेश में, माने आज के माहौल में कौन है जो दुर्बल है कौन है, जिसे वास्तव में सुरक्षा दी जानी चाहिए। और उसको हमें सुरक्षा देनी पड़ेगी। गौर से देखिए न कि क्या-क्या है, जो मिटा जा रहा है।

बहुत अच्छा है, लेकिन मिटा जा रहा है। आज मैं चाहूँगा कि हम उसकी सुरक्षा का संकल्प लें। वो सब कुछ जो बहुत अच्छा है पर मिटा जा रहा है। हमारी संस्कृति में बहुत तत्त्व ऐसे हैं, जो बहुत सुंदर हैं, बहुत गहरे हैं। उन्हें बचाने की ज़रूरत है। पर ये जो आज की वर्तमान पीढ़ी है, इस तक वो तत्त्व पहुँचे ही नहीं। नहीं पहुँचे हैं, तो वो मिट जाएँगे, क्योंकि संस्कृति तो एक जीवंत चीज़ होती है। उसको जीने वाला अगर कोई है तो वो बचेगी। नहीं तो किताबों तक सीमित रह जाएगी, मुर्दा हो जाएगी। तो आप भी अपने आस-पास देखिए और कहिए कि कौन है जो सच्चा है लेकिन कमज़ोर पड़ रहा है। मैं उसकी रक्षा का संकल्प लेती हूँ।

मैं दोहरा रहा हूँ। आज के दिन, चाहे स्त्री हो, चाहे पुरुष, चाहे भाई हो, चाहे बहन, चाहे माँ हो, चाहे बाप हो, कोई हो सब ये संकल्प उठाएँ कि जो भी कोई सच्चा है, लेकिन कमज़ोर पड़ रहा है, हम उसकी रक्षा के लिए खड़े हो जाएँगे। ये रक्षाबंधन के पर्व के प्रति हमारा सच्चा सम्मान होगा। इसी के माध्यम से अध्यात्म की, धर्म की रक्षा हो सकती है और हम इस पर्व को बिल्कुल अमर और प्रासंगिक बना सकते हैं।

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