जो लक्ष्य हमें एक विशेष परिस्थिति ने, एक विशेष दिन ने दिए होते हैं, उसके प्रति लिए गए संकल्प भी उस परिस्थिति और दिन के बीतते ही स्वयं भी बीत जाते हैं। जीवन का एक ही लक्ष्य हो सकता है – अपने तक वापस आ जाना। ऐसे संकल्प लें जो हर पल होश बनाए रखने में सहायक हों। ग्रंथ अध्ययन, कला, खेल, पर्यावरण और पशुओं के प्रति जागरूकता, दुनिया के बारे में समझ; ये सभी संकल्प हैं जो आपके निर्भीक और मुक्त जीवन की ओर एक नई शुरुआत करेंगे।
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क्यों नहीं पूरे होते हमारे संकल्प?
इस विषय में हमें यह बाज अच्छी तरह जान लेनी चाहिए कि आमतौर पर हम जिस भी लक्ष्य के पीछे भागते हैं, वो हमें किसी और से मिला होता है। नतीजतन, उसके प्रति लिए संकल्प में भी बहुत दम नहीं होता। जो लक्ष्य हमें समाज ने दिए होते हैं, उनके प्रति हम बहुत समय तक ऊर्जावान नहीं रह पाते।
जो लक्ष्य हमें एक विशेष परिस्थिति ने, एक विशेष दिन ने दिए होते हैं, वो उस परिस्थिति और दिन के बीतते ही स्वयं भी बीत जाते हैं।
ये जो बाहर से आया हुआ उत्साह होता है, यह ऐसा ही होता है जैसे कोई गाड़ी को धक्का लगा रहा हो। गाड़ी ठीक है, गाड़ी में इंजन भी है और हर प्रकार से स्वयं चलने के काबिल है, पर फिर भी गाड़ी में कोई बाहरी ताकत धक्का लगा रही है। वो गाड़ी कब तक चलेगी? जब तक धक्का लगेगा! और याद रखना धक्का सिर्फ एक दिशा में नहीं लग रहा है; दस ताकतें हैं जो दस दिशाओं में धक्का लगा रही हैं। तो अब गाड़ी की हालत क्या होगी? कभी इधर, कभी उधर।




