कुंभ मेला से बड़ी सामुदायिकता पूरे विश्व में कभी नहीं होती। हर चार साल में चार अलग जगहों पर हम मिल रहे हैं। इस तरह के सम्मेलनों की वजह से भारत में सहिष्णुता, वैचारिक खुलापन और उदारवाद रहा है। किसी की बात से हम सहमत नहीं है तो हम शास्त्रार्थ करते हैं। दूसरे की बात अगर अच्छी लगती है तो हम कहते हैं ये दूसरे की बात नहीं, हमारी ही बात है। भारत को इसी ने बहुत आगे बढ़ाया है कि मिलो, बात करो, जानो और समझो।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
विवरण: नमस्कार। मैं, राणा यशवंत, आपका स्वागत करता हूं।
हिंदू समाज में सदियों पुरानी एक परंपरा रही है और वह समागम की है। समागम जिसमें समाज के सामाजिक, धार्मिक, आध्यात्मिक इन तीनों पक्ष के लिए पाठ्यक्रम सिलेबस तैयार किए जाते रहे। और इस परंपरा को हम कुंभ कहते हैं। कुंभ की जो पौराणिक कहानी है, वह यह कहती है कि देवताओं और दानवों के बीच में युद्ध हुआ।
युद्ध जो है समुद्र मंथन के दौरान जो आखिर में अमृत निकला, उसको हासिल करने के लिए। विष्णु ने इंद्र के बेटे जयंत को कलश दिया कि लो और तुम भागो। और जयंत के पीछे दानव गए। फिर जयंत को उन्होंने पकड़ा और उस युद्ध के भीतर जो चार बूंदे छलकी: प्रयागराज, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन। इन चार जगहों पर गिरी। और इन चार जगहों पर महाकुंभ का आयोजन होता रहा है। पौराणिक कथा यह है। इसके भी अपने कुछ निहितार्थ होंगे। इसके भी अपने कुछ मायने होंगे। और यह जो लगातार एक बड़ा समाज दुनिया का रहा है। जो हर बारह वर्ष पर बैठता रहा है महाकुंभ के नाते। उसका अपना कुछ सामाजिक आध्यात्मिक और धार्मिक पक्ष होगा। उसके अपने अर्थ होंगे। इसको समझने के लिए आज मेरे साथ आचार्य प्रशांत जी हैं। आपका बहुत-बहुत स्वागत है।
आचार्य प्रशांत:




