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हममें और चुन्ना भाई में कोई अंतर? || आचार्य प्रशांत (2019)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: (मुस्कुराते हुए) चुन्ना भाई की कहानी सुनेंगे? ये बड़ा गूढ़ रहस्य था, जो कभी कोई जान नहीं पाया कि चुन्ना भाई आठवीं कक्षा तक पहुँचे कैसे? मैं आठवीं की बात बता रहा हूँ। ब्रह्मांड के सब रहस्यों पर से पर्दा उठ सकता है, चुन्ना भाई आठवीं तक आ कैसे गये, ये कोई नहीं जानता था। क्योंकि उनको स्कूल में भी बहुत कम देखा गया, किताबें उनके पास होती नहीं थीं, होती थीं तो बेच खाते थे, और जब स्कूल आते थे उस दिन भूचाल आ जाता था।

ऐसे बच्चे मैंने कम देखे हैं जिनका छठी, सातवीं, आठवीं में आधे से ज़्यादा बाल सफ़ेद हो गए हों। चुन्ना भाई का जीवन, उनकी लाइफ़-स्टाइल (जीवन शैली) कुछ इस तरह की थी कि बारह-चौदह की उम्र में उनके बाल भी सफ़ेद हो गये थे। दुनियाभर की कलाओं में पारंगत थे चुन्ना भाई।

तो जब परीक्षा का दिन आया करे, तो पूरी कक्षा व्यस्त दिखाई दे, तनाव में दिखाई दे। परीक्षाएँ पास आ रहीं हैं, खासतौर पर अगर वार्षिक परीक्षाएँ हों, एनुअल एग्ज़ाम्स। और लोग जितना ही परेशान दिखाई दें, चुन्ना भाई उतना ही मौज मार रहे हैं, कुछ कर रहे हैं।

फिर परीक्षा का दिन आये, परीक्षा के दिन लोग परीक्षा भवन से बाहर निकलें तो किसी के चेहरे पर मुस्कुराहट है, कोई थोड़ा सा परेशान हो रहा है कि कुछ और अच्छा कर सकता था कर नहीं पाया और चुन्ना भाई बाहर निकलकर ज़ोर से अट्टहास करें, ठट्ठा, ठहाका। और जितना वो परीक्षाओं के दिनों में कूदें, नाचें, मज़ाक करें उसकी कोई सीमा नहीं।

अगर सौ नम्बर की परीक्षा में पाँच ही नम्बर के वो सवाल कर पाएँ हैं तो उनको बहुत आनन्द आये। और अगर कभी ऐसा हो जाए कि सौ मे से शून्य अंक लिखकर के आएँ हैं तो उस दिन तो समाधि, उल्लास की कोई सीमा नहीं। वो कहें कि आज वो दिन है जिस दिन साबित हो गया न कि मैंने सालभर कुछ नहीं किया। आज वो दिन है जिससे साबित हो गया न कि मैं ये परीक्षा देने के काबिल ही नहीं हूँ। मैं इसी बात पर नाचूँगा, मज़े मनाऊँगा, दावतें दूँगा।

पढ़ने वाले जो बच्चे थे वो जब बाहर निकला करें परीक्षा केन्द्र से तो चुन्ना भाई उनसे कहें, ‘आजा, आज तुझे कुछ खिलाता हूँ।‘ वो कहें, ‘नहीं, भैया जाने दो अब, कल की तैयारी करनी है।‘ चुन्ना कहे, ‘अरे! छोड़ न।‘ चुन्ना भाई उत्सव मनाएँ उस दिन।

हममें से अधिकाँश लोग जो उत्सव मनाते हैं वो चुन्ना भाई की तरह ही मनाते हैं। राम के दिन हम इस बात का उत्सव मनाते हैं कि सालभर हम राम की तरह बिलकुल नहीं जिये। चुन्ना भाई परीक्षा के दिन इसी बात का उल्लास मनाते थे कि उन्होंने सालभर परीक्षा की बिलकुल तैयारी नहीं करी। हम भी अधिकाँशतः यही तो कर रहे हैं न?

आज श्रीराम का पर्व है, सालभर हमने राममय जीवन जिया है क्या? लेकिन आज हम कितनी खुशी दिखाएँगे। अरे! आज परीक्षा का दिन है, आज खुशी मनाने का पूरा अधिकार है, लेकिन किनको? परीक्षा के दिन कौन होते हैं जो आनन्दित नज़र आते हैं?

किसको अधिकार है परीक्षा के दिन आनन्दित और प्रसन्नचित होने का, जिसने सालभर परीक्षा की पूरी तैयारी की हो। जिसने न्याय किया हो पाठ्यक्रम के साथ, उसे पूरा अधिकार है कि वो परीक्षा के दिन कहे कि आज त्यौहार है मेरा।

हमने सालभर श्रीराम के साथ न्याय करा है? पर हम चुन्ना भाई की तरह आज खूब धूम मचाएँगे। किस बात की, ये पता नहीं। (बाहर से आ रहे लोगों के शोर को लक्ष्य करके) वो देखिए, बाहर मच रही है धूम। त्यौहार हुड़दंग का लाइसेंस नहीं होते। न खरीददारी, शॉपिंग, सेल, डिस्काउंट का तमाशा होते हैं। त्यौहार परीक्षा का दिन होते हैं, उस दिन जाँचना होता है कि सालभर मिला था मुझे इस त्यौहार के लिए। दो त्यौहारों के बीच ठीक एक वर्ष मिलता है न। जैसे दो वार्षिक परीक्षाओं के बीच ठीक एक वर्ष मिलता है।

त्यौहार के दिन जाँचना होता है कि आज तीन-सौ पैंसठवाँ दिन है, तीन-सौ चौंसठ दिन मिले थे मुझे अपने जीवन में थोड़ा रामत्व उतारने के लिए। मैंने उतारा क्या, ये जाँचना होता है आज के दिन। आज का दिन सत्यता का, ईमानदारी का होता है।

तीन-सौ चौंसठ दिन न श्रीराम से प्रेम, न श्रीराम की सुध, न श्रीराम की तरफ़ बढ़े, न उन ऊँचाइयों का ज़रा भी ध्यान किया जिन पर श्रीराम विचारे थे। तो फिर… ये मैं इसलिए कह रहा हूँ ताकि आज से ही अगली दिवाली की तैयारियाँ शुरू हो जाएँ। ये वाली तो जैसी है तो है, पर अगली वाली सच्ची होनी चाहिए। अगली दिवाली पर अधिकार के साथ कहें कि हाँ, मुझमें पात्रता है श्रीराम का पर्व मनाने की। पर्व पात्रता माँगते हैं भाई। पात्रता समझते हैं न, एलिजिबिलिटी। त्यौहार भी एलिजिबिलिटी माँगते हैं, यूँही थोड़े ही कि चुन्ना भाई भी परीक्षा के दिन नाच रहे हैं।

आप जहाँ हैं, जैसे हैं, सालभर पूरी कोशिश करनी होती है। बात ये नहीं है कि सालभर पाया क्या, बात ये है कि सालभर ईमानदारी से कोशिश करी या नहीं करी। अगर करी तो आज जितना आप गा सकते हैं, प्रकाश बिखरा सकते हैं, ज़रूर बिखराएँ। और नहीं करी तो फिर तो सब धूम-धड़ाका मात्र आडंबर है, दिखावा है। उसमें कोई आत्मा नहीं होगी। उसमें कोई सच्चाई नहीं होगी।

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