आचार्य प्रशांत: (मुस्कुराते हुए) चुन्ना भाई की कहानी सुनेंगे? ये बड़ा गूढ़ रहस्य था, जो कभी कोई जान नहीं पाया कि चुन्ना भाई आठवीं कक्षा तक पहुँचे कैसे? मैं आठवीं की बात बता रहा हूँ। ब्रह्मांड के सब रहस्यों पर से पर्दा उठ सकता है, चुन्ना भाई आठवीं तक आ कैसे गये, ये कोई नहीं जानता था। क्योंकि उनको स्कूल में भी बहुत कम देखा गया, किताबें उनके पास होती नहीं थीं, होती थीं तो बेच खाते थे, और जब स्कूल आते थे उस दिन भूचाल आ जाता था।
ऐसे बच्चे मैंने कम देखे हैं जिनका छठी, सातवीं, आठवीं में आधे से ज़्यादा बाल सफ़ेद हो गए हों। चुन्ना भाई का जीवन, उनकी लाइफ़-स्टाइल (जीवन शैली) कुछ इस तरह की थी कि बारह-चौदह की उम्र में उनके बाल भी सफ़ेद हो गये थे। दुनियाभर की कलाओं में पारंगत थे चुन्ना भाई।
तो जब परीक्षा का दिन आया करे, तो पूरी कक्षा व्यस्त दिखाई दे, तनाव में दिखाई दे। परीक्षाएँ पास आ रहीं हैं, खासतौर पर अगर वार्षिक परीक्षाएँ हों, एनुअल एग्ज़ाम्स। और लोग जितना ही परेशान दिखाई दें, चुन्ना भाई उतना ही मौज मार रहे हैं, कुछ कर रहे हैं।
फिर परीक्षा का दिन आये, परीक्षा के दिन लोग परीक्षा भवन से बाहर निकलें तो किसी के चेहरे पर मुस्कुराहट है, कोई थोड़ा सा परेशान हो रहा है कि कुछ और अच्छा कर सकता था कर नहीं पाया और चुन्ना भाई बाहर निकलकर ज़ोर से अट्टहास करें, ठट्ठा, ठहाका। और जितना वो परीक्षाओं के दिनों में कूदें, नाचें, मज़ाक करें उसकी कोई सीमा नहीं।
अगर सौ नम्बर की परीक्षा में पाँच ही नम्बर के वो सवाल कर पाएँ हैं तो उनको बहुत आनन्द आये। और अगर कभी ऐसा हो जाए कि सौ मे से शून्य अंक लिखकर के आएँ हैं तो उस दिन तो समाधि, उल्लास की कोई सीमा नहीं। वो कहें कि आज वो दिन है जिस दिन साबित हो गया न कि मैंने सालभर कुछ नहीं किया। आज वो दिन है जिससे साबित हो गया न कि मैं ये परीक्षा देने के काबिल ही नहीं हूँ। मैं इसी बात पर नाचूँगा, मज़े मनाऊँगा, दावतें दूँगा।







