पीड़ा दुख तब बनती है जब आप पीड़ा के साथ जीने से इनकार करते हो। और पीड़ा के साथ जीने से इनकार आप अक्सर इसलिए करते हो क्योंकि अध्यात्मवादियों ने आपको बता दिया है कि जीवन आनंद है। तो आप कहते हो, आनंद तो मिल नहीं रहा, गुरु जी तो बता गए थे फूल बरसेंगे, फुहारें उठेंगी, जीवन नृत्य है, और वो तो कहीं दिख नहीं रहा। यहाँ तो कभी यहाँ (कोहनी में) दर्द होता है, कभी धूप लगती है, कभी कोई बीमारी लग जाती है, कभी कहीं शोर होता है, कभी कहीं कोई मौत देख लेते हैं। यहाँ तो जिधर देखो वहीं मौत का नाच चल रहा है। मृत्यु लोक ही है।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या शारीरिक कष्ट के साथ हम अध्यात्म और समाधि की तलाश कर सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: शारीरिक कष्ट के साथ तो जीना ही है। उसके बिना अगर आप हो गए, तो फिर कौन-सी शांति चाहिए। शरीर स्वयं एक कष्ट है, कभी वो कष्ट बहुत बड़ा है, कभी वो कष्ट बहुत छोटा है। कष्ट तो उसी दिन शुरू हो गया था जिस दिन शरीर धारण किया था। जहाँ कष्ट नहीं है, वहाँ जीवन कैसा? वो तो रहेगा-ही-रहेगा। और उसी के साथ जीने की कला को कहते हैं अध्यात्म।
पीड़ा दुख तब बनती है जब आप पीड़ा के साथ जीने से इनकार करते हो। और पीड़ा के साथ जीने से इनकार आप अक्सर इसलिए करते हो क्योंकि अध्यात्मवादियों ने आपको बता दिया है कि जीवन आनंद है। तो आप कहते हो, आनंद तो मिल नहीं रहा, गुरु जी तो बता गए थे फूल बरसेंगे, फुहारें उठेंगी, जीवन नृत्य है, और वो तो कहीं दिख नहीं रहा। यहाँ तो कभी यहाँ (कोहनी में) दर्द होता है, कभी धूप लगती है, कभी कोई बीमारी लग जाती है, कभी कहीं शोर होता है, कभी कहीं कोई मौत देख लेते हैं। यहाँ तो जिधर देखो वहीं मौत का नाच चल रहा है। मृत्यु लोक ही है।




