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सत्य के ध्यान की विधि? || आचार्य प्रशांत (2018)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: मुकेश पूछ रहे हैं कि क्या ध्यान करते समय किसी पर केंद्रित होना है? गिरेन्द्र कह रहे हैं कि मन एक बार में एक ही काम क्यों करना चाहता है? कहते हैं कि जब ईश्वर को याद करता हूँ तो संसार को भूलता हूँ। जब संसार याद आता है तो ईश्वर से ध्यान हटता है।

सत्य पर ध्यान केंद्रित नहीं किया जा सकता। सत्य आँखों के सामने का दृश्य नहीं है। वह आँखों की रोशनी है। जो भी कोई यह माँग करेगा कि उसे सत्य को देखना है या सत्य पर ध्यानस्थ होना है, या तो असफल रहेगा या स्वयं को धोखा देगा।

मैं इसको (गिलास को हाथ में उठाते हुए) उठा रहा हूँ। सत्य यह पात्र नहीं है, सत्य पात्र का पदार्थ नहीं है। इस गिलास को इस शर्बत को सत्य नहीं समझिएगा, सत्य इस हाथ की ताकत है। सत्य इस हाथ की ताकत है जो पदार्थ को उठाती है, जो पदार्थ को चिह्नित करती है, जो पदार्थ को पदार्थ रूप में देखती है। कर्म नहीं है सत्य, कर्ता के पीछे का स्रोत है। कर्म नहीं है सत्य, कर्ता के पीछे का स्रोत है।

कमज़ोर हाथ, कमज़ोर कर्म; मज़बूत हाथ, मज़बूत कर्म। कर्म प्रमाणित कर देते हैं कि सत्य से उठ रहे हैं कि नहीं। पर समस्त कर्म होते तो भौतिक आयाम में है न? उस आयाम में ख़ोजने मत निकल पड़िएगा। इसके आयाम में सत्य आपको नहीं मिलने वाला। आँखों ने इसको देखा, हाथों ने इसको उठाया। आँखों के पीछे जो हैं, उसे कहते हैं सत्य। उसी को ब्रह्म कहते हैं। उसी को आप जो कहना चाहें कह लें। अविनाशी, अमर-तत्व उसी को कहते हैं — जो भी नाम देना चाहें।

तो अब प्रश्न को देखिए, गिरेन्द्र(प्रश्नकर्ता) कह रहे हैं कि जब ईश्वर को याद करता हूँ तो संसार छोड़ता है, जब संसार को याद करता हूँ तो ईश्वर छूटता है। प्रश्न ऐसा ही है कि जब इसको(गिलास) उठाऊँ, हाथ तो मेरा एक है, तो इसको(दूसरी चीज़) कैसे उठाऊँ? कि जब इसको उठाऊँ तो हाथ तो गया फँस। अब इसको कैसे उठाऊँ? हाथ एक है, विकल्प दो हैं; चुनाव करना हैं; एक ही चुना जा सकता है। मैं तो असमंजस में।

तो प्रश्न जो इन्होंने पूछा हैं, उसके पीछे मान्यता क्या है, देख रहे हैं आप? क्या है मान्यता? मान्यता यह है कि इसी तल पर दोनों रखे हैं। यह तल है, आपने संसार को और सत्य को एक ही तल पर रख दिया। हो गई न भूल!

और जब एक ही तल पर दो वस्तुएँ होंगी तब तो विकल्प उठ ही आएगा। फिर तो चुनाव करना ही पड़ेगा कि यह ले लो भाई या यह ले लो। बहुत करोगे, दोनो को ले लोगे तो तीसरे को नहीं ले पाओगे। बहुत जादूगरी दिखाई, पाँच-सात चीज़ें एक ही हाथ से उठा लीं, तो भी कहीं न कहीं जाकर के रुकोगे। जहाँ रुकोगे उसके आगे का सब छूटा। सात चीज़ें उठा लीं, आठवीं नौवीं दसवीं बारहवीं पन्द्रहवीं सब छूटी। तो दुःख कि कुछ छूटा हाथ से; कुछ रह गया, यही तो दुख हैं, भावना में कि कुछ रह गया, कुछ छूट गया, कहीं कमी है।

संसार और सत्य ऐसे नहीं है कि जैसे ‘अ’ और ‘ब’। संसार शब्दों का खेल है, छवियों का खेल है, ध्वनियों का, दृश्यों का खेल हैं; वर्णमाला है पूरी संसार। और सत्य वह अनंत कागज़ है जिस पर अनंत वर्णमालाएँ उभरती और मिटती रहती हैं। सत्य पर लिखा है ‘अ’ और ‘ब’ और सत्य पर ही लिखा है ‘क’ और ‘ख’ और सत्य पर ही लिखे हैं ‘क्ष’ ‘त्र’ ‘ज्ञ’। और एक ही भाषा नहीं, जितनी भाषाएँ आप जानते हो, ‘ए’ ‘बी’ ‘सी’ ‘डी’ भी सब कहाँ लिखें हैं? सत्य पर ही लिखें हैं। आपने ‘अ’ बोला तो ‘अ’ के नीचे भी क्या है? कागज़ है न? बिना कागज़ के कहाँ से ‘अ’ आ जाएगा? पूरी वर्णमाला को एक आधार चाहिए। सत्य के अलावा कुछ भी निराधार नहीं। वह अकेला है जिसे अपने अतिरिक्त कोई आधार चाहिए नहीं। बाकी सब कुछ तो आधार माँगता है। तुम लिखोगे ‘अ’ तो ‘अ’ के नीचे क्या होना चाहिए? कागज़ होना चाहिए। तुमने लिखा ‘ब’; ‘ब’ के नीचे भी क्या मौजूद है? तुमने लिखा ‘राम’; ‘राम’ के नीचे भी क्या मौजूद है? तुमने लिखा ‘काम’; ‘काम’ के नीचे भी क्या मौजूद है? तुमने सुवचन लिखा; क्या मौजूद है उसके नीचे? तुमने गाली दे दी; क्या मौजूद है उसके नीचे? सत्य ख़त्म कहाँ हो गया जो तुम क्षोभ मनाते हो कि जब संसार की तरफ़ जाता हूँ तो सत्य छूट जाता है कि ख़त्म हो जाता है। संसार भी लिखो तो उसके नीचे भी क्या मौजूद है? कागज़ मौजूद है। उस कागज़ को ही हम कह रहे हैं, आधार।

जैसे अनंत बादल हों और जितने बादल होते हैं सबकी अलग-अलग आकृतियाँ होती हैं। देखा है आसमान की ओर? कोई दो बादल के टुकड़े कभी एक से दिखे हैं? और कैसी-कैसी तो आकृतियाँ उभरती हैं। कभी लगता गोभी का फूल, कभी राक्षस, कभी परी, कभी तलवार खिंच जाती है। कभी ताजमहल बन जाता है। कभी पंछी, कभी पेड़। कुछ भी बन जाते हैं न बादल?

बादल सब अलग-अलग रहते हैं, पहली बात। दूसरी बात, बादल बनते बिगड़ते रहते हैं। उन सब के नीचे क्या है? आकाश। उसी आकाश को हम कागज़ कह रहे हैं।

आपने तो ऐसे कह दिया कि जब बादलों के साथ होता हूँ तो आकाश के साथ नहीं होता और जब आकाश के साथ होता हूँ तब बादलों के साथ नहीं होता। अरे, बादल कहाँ से आएँगे अगर आकाश नहीं हैं? और बादलों की भी अपनी मौज हैं, अपनी सुंदरता है। काहे उनको डंडा लेकर मारना हैं? सुंदर, खाली नीरव, निरभ्य आकाश की अपनी गरिमा है। और मेघाच्छादित आकाश भी तो सुंदर है न, कि नहीं है? आषाढ़ का आकाश देखा है? कहीं काले बादल, कहीं क्षुभ्र बादल और बीच-बीच में उनके पीछे से सूरज झाँकने लगता है। और तब बादलों की किनारी देखी हैं? कैसी सुनहरी हो जाती है — वह संसार है। सुन्दर है न संसार? क्यों परेशान हो कि संसार में रहता हूँ तो सत्य भूल जाता है। क्यों परेशान हो?

धारणा है गलत। इस धारणा को मन से निकालो। यह पुरानी परिपाटी की धारणा है। न जाने कहाँ से शुरू हुई। जहाँ से भी शुरू हुई वह स्रोत शुभ नहीं हो सकता। लोगों ने कह दिया कि बेटा या तो संसार चुन लो या सन्यास चुन लो। उन्होंने बता दिया कि दुनिया में जैसे कोई खोट हैं, कोई कमी हैं, तो तुम्हें तो हर समय बस प्रभु का स्मरण करना है। और प्रभु का स्मरण करने से ज्यादा मूर्खतापूर्ण बात नहीं हो सकती। मैं फिर कहता हूँ — जिन्होंने भी सत्य को स्मरण की वस्तु बनाया, उन्होंने इसको और इसको कहाँ रख दिया? एक तल पर। यह तो तुमने सत्य का अपमान कर दिया, यदि उसका अपमान किया जा सकता हो।

सत्य को तुमने स्मरण की वस्तु वैसी ही बना दिया कि जैसे दीवार का स्मरण किया जाता है, पेड़ का स्मरण किया जाता है, काम-धंधे का, रोज़गार का, दुकान का, अपनी तमाम व्यस्तताओं का, रिश्तेदारियों का स्मरण किया जाता है। वैसे ही तुमने क्या कह दिया? कि सत्य का भी तो स्मरण करना है।

जिन्होनें सुमिरन का पाठ पढ़ाया, उनका आशय बिलकुल कुछ और था। सत्य का स्मरण वैसे ही नहीं किया जाता जैसे सुबह अख़बारवाले या दूधवाले का किया जाता है। उनका भी तो करते हो न स्मरण कि आए नहीं अभी तक? और मीरा भी प्रभु को जपती थीं कि कब आओगे। तो आयामगत अंतर है, आमूलचूल भेद है।

हमने सोच लिया वैसे ही तो रटना है कि राम-राम और मन में छवि तैर रही हैं, मर्यादा पुरूषोत्तम की। सोचा कि यह बड़ा पुण्य का काम कर रहे हैं हम, कि हम याद कर रहे हैं इस प्रकार। नहीं, इस प्रकार नहीं याद करना होता। इस प्रकार यदि याद करना भी होता है तो यह बहुत आरंभ की विधि है। इस विधि पर अटक नहीं जाना होता है। थोड़ा सा आगे निकलते ही यह बोध होना आवश्यक है कि सत्य हृदय में रहे। हृदय पर है तो मैं नहीं कह रहा हूँ कि छुपा हुआ है। हृदय पर है तो कूटस्थ है।

जानते हो ‘कूटस्थ’ शब्द बहुत प्यारा हैं। सत्य को कहा गया है ‘कूटस्थ’। इसके दो आशय हैं। ‘कूट’ का अर्थ होता है शिखर। ‘कूटस्थ’ का अर्थ होता है वह जो सबसे ऊँचा है और ‘कूटस्थ’ का अर्थ वह भी होता है जो ज़रा गुह्य हैं, जो ज़रा अदृश्य है, नहीं पता चलता। सत्य ऐसा ही है। वह सबसे ऊपर है। और इसीलिए इन मानवीय आँखों को दिखाई ज़रा मुश्किल से देता है, कूटस्थ है। वह वहाँ रहे और वहाँ होकर के सब संचालित करे। संसार के सारे काम-धंधे चलते हैं, नीचे- नीचे ज़मीन पर, वादियों में।

वो ऊपर हैं। ऊपर होने का अर्थ क्या है? ऊपर होने का अर्थ है कि तुम उसको सर्वोच्च प्राथमिकता दो। ऐसी प्राथमिकता दे दी उसे कि अब उसके बारे में सोचना नहीं है। उसका तो पता ही है कि ख़याल निरंतर है। और जिसका ख़याल निरंतर है उसका ख़याल आना बंद हो जाता है। यह सूत्र समझना अच्छे से।

तुम्हें किसी का खयाल है यह पता ही तुम्हें तब चलेगा जब ख़याल रुक-रुक कर आए, जब ख़याल सावधिक हो, जब ख़याल टूटा-फ़ूटा हो; जब ख़याल कभी आए और फिर कभी न भी आए, तो तुम्हें पता चलता है कि ख़याल आया।

सत्य को आकाशवत्त इसीलिए कहा गया है क्योंकि उसमें कोई टूट-फूट नहीं, कोई अवरोध नहीं, कोई विघ्न नहीं। वहाँ जो हैं, वह अनंत है और अविरल है। कितने ही तो शब्द दिए गए हैं — अविक्षिन्न, अक्षुण्ण। सोचा नहीं कि इनका अर्थ क्या है? वह जो कभी रुकता-थमता न हो और जो कभी रुकता-थमता न हो, उसका ख़याल कैसे उठेगा? विचार की तो पहचान और परिभाषा ही यही है कि वह आएगा और जाएगा। सत्य का विचार नहीं किया जाता। इस फ़ेर में मत पड़ जाना। विचार कर लिया जिसका तुमने, वह फिर सत्य नहीं। सत्य तो ऐसे मौजूद रहें तुममें जैसे कि साँस। साँस का विचार करते हो, बोलो? हाँ, तुम विचार करते जाते हो हज़ार चीज़ों का और साँस अविरल चलती जाती है। धड़कन जैसे दिल की। विचार करते हो कि अगली धड़कन उठी, अब धड़कन रुकी, यह सब सोचते हो क्या? तुम्हें जो करना हो करो, धड़कन चल रही है न? सत्य ऐसा है।

और तुम्हें इस विषय में कुछ करना नहीं है। मैं नहीं कह रहा हूँ कि तुम मेरी बात को मान्यता बना लो। मैं सिर्फ़ यह चाहता हूँ कि तुमने जो मान्यता बना रखी है उसको काट दो ताकि तुम इस ग्लानि से मुक्त हो जाओ कि अरे, अरे, अरे, दो घंटे बीत गए परमात्मा का नाम लिया नहीं। यह ग्लानि तुम्हें मारे डाल रही है। और इसका नतीजा जानते हो क्या होता है? जब तुम देखते हो दो घंटे बीत गए, समझना बात मनोवैज्ञानिक है, तुम कहते हो दो घंटे बीत गए, परमात्मा का नाम लिया नहीं। तो शुरू में तो तुममें प्रेरणा उठती है, तुम ज़रा ज़ोर लगाते हो। तुम कहते हो अगले दो घंटे परमात्मा का नाम लेना ज़रूरी है। लेकिन नाम की तो पहचान ही यही है कि शुरू होगा तो ख़त्म भी होगा। तुम फिर नाम लेना शुरू करते हो पूरे दम-खम से और थोड़ी ही देर में तुम चूक जाते हो। और जब चूक जाते तो तुम और ग्लानि में पड़ते हो कि अरे! फिर बड़ा धर्म विपरीत काम हो गया। नाम लेना था परमात्मा का, सतत सुमिरन होना चाहिए था और मैं तो फिर भूल गया। तुम पाँच-सात दफ़े और कोशिश करते हो। चलो तुमने पचास दफ़े, सत्तर दफ़े कोशिश कर ली। लेकिन इंसान हो, एक मुकाम आएगा जब तुम टूटोगे। और जब तुम टूटते हो तो फिर या तो तुम अपनेआप को धोखा देना शुरू कर देते हो। कैसे? अपनेआप से बताते ही नहीं कि मैं भूल गया था। तुम कहते हो, “नहीं, नहीं! मैं भूला नहीं था, बिलकुल याद था।” या फिर तुम अपनेआप को विफ़ल जान कर परमात्मा से ही मुँह मोड़ लेते हो। तुम कहते हो यह चक्कर ही मेरे लिए नहीं है।

बहुत लोग आते हैं मेरे पास, कहते हैं, “यह अध्यात्म वगैरह हमारे लिए है ही नहीं, *नॉट माय कप ऑफ टी*। हमने तो जो कोशिश की उसी में विफ़ल हुए।” कोशिश तुम जो करोगे उसमे तो विफ़ल होगे ही। परमात्मा किसी कोशिश से मिलने वाली वस्तु थोड़े ही है। जिस किसी ने कोई आध्यात्मिक प्रयत्न किया हैं, उसे विफलता ही मिली है। प्रयत्न आध्यात्मिक मात्र इतना होता है कि तुमने जो अनाध्यात्मिक मान्यताएँ पकड़ रखी है, उनकी निस्सारता को पहचान लो।

अभी भी मैं आपको कुछ बता नहीं रहा हूँ करने के लिए। मैं सिर्फ आपको जता रहा हूँ कि आपने जो पकड़ रखा है वह व्यर्थ है। आँखों से वह देखिए न जिसे आप आँखों से देख पाएँ, जिसको देख पाने की आँखों की पात्रता हो। आँखें इसको देख सकती हैं और इसको देख सकती हैं और इसको देख सकती हैं इसको देख सकती हैं। आप आँखों से देखने निकलें कि कहीं पर दिख जाएँ त्रिमूर्ति। अरे वह नहीं दिखने वाले।

हाँ, उनको खोजने की कोशिश में आपकी आँखें फिर वह भी नहीं देख पातीं जो देखने की आँखों की क्षमता है। आँखे क्या देख सकती है? संसार। बुद्धि किसका अन्वेषण कर सकती है? संसार का। यह हाथ, यह बाज़ू क्या उठा सकते हैं? पदार्थ।

पर आप इन बाज़ुओं से स्वर्ग उठा लेना चाहते हैं। आप आँखों से परमात्मा के दर्शन कर लेना चाहते हैं। और आप बुद्धि से सत्य-तत्व का अनुसंधान कर लेना चाहते हैं। यह सब हो नहीं सकता, इसलिए नहीं कि आप अक्षम हैं बल्कि इसलिए क्योंकि यह बात सैद्धांतिक रूप से असम्भव है। जो बात हो ही नहीं सकती वह करने की आपने ठान रखी है क्योंकि कोई आपको बता गया है कि ऐसा सम्भव है। ना, वह हो नही सकता।

परमात्मा को निर्गुण, निराकार जानो और इन आँखों से फिर बस वह देखो जो देखा जा सकता है। भरपूर संसार को देखो और बुद्धि को मौका दो कि वह संसार को देखे और समझे। बुद्धि के लिए परमात्मा बहुत बड़ा बोझ है अगर वह बुद्धि के ऊपर बैठ गया। हाँ, यदि वह बुद्धि के नीचे है तो वह फ़िर बुद्धि की सबल बुनियाद है। यह भवन है इसके नीचे क्या होगी? वह नींव होगी। और वह नींव बड़ी भारी होगी। नींव कैसी होगी? बड़ी भारी नींव होगी। वह सारी नींव उखाड़ करके इसकी छत पर रख दें तो क्या हो? सब गिर जाएगा। हम यह कोशिश करते हैं।

परमात्मा को होना चाहिए हमारा आधार। यह बुद्धि है, यह बुद्धि का भवन है्, यह संसार का भवन है। इसका आधार होना चाहिए सत्य को। और हम उसके विषय में सोचने की कोशिश करते हैं, उसे पकड़ने की कोशिश करते हैं। तो यह हम ऐसा कर रहे हैं कि जैसे आधार को उखाड़ा है और अपने हाथों में संभालने की कोशिश कर रहे हैं। फिर सब गिर जाएगा। फिर इस भवन में परमात्मा तो नहीं ही होगा, वह भी नहीं होंगे जो बेचारे हो सकते थे। हम भी नहीं होंगे। इसीलिए अक्सर सत्य के आग्रहियों को सत्य तो नहीं ही मिलता, वह संसार से भी वंचित रह जाते हैं।

तुम ज़रा भरपूर संसार को तो देखो भाई। तुम और कुछ नहीं देख पाओगे‌। तुम किस फ़ेर में हो? बार बार बार यही सिखाता रहा हूँ कि देखो तो दुनिया को, देखो तो अपनी हालत को वहाँ पर। दुनिया के चक्करों को देखो, दुनिया के ढर्रों को देखो; दुनिया को देखने वाली अपनी मनोस्थिति को, अपनी दृष्टि को देखो। यह सब क्या खेल चल रहा है, उसको ज़रा ध्यान से देखो। वही मात्र एक दृष्टव्य वस्तु है। पर हम वह नहीं देखते। हमें संसार का कुछ पता नहीं।

संसार का यदि हमें पता होता तो क्या संसार में हमारी वह हालत होती जो अभी हैं? दुनिया का हमें कुछ पता नहीं, हम बात करते हैं ऊपरवाले की। वह वहाँ बैठ करके कभी माथा पकड़ता हैं, कभी हंसता है। कहता है, “जहाँ हो पहले उस जगह को तो पहचान लो। मृत्युलोक का तुम्हें कुछ पता नहीं, अमरलोक की बातें करते हों।“

दुनिया को जाना क्या आपने? संसार को जानिए। जिस क्षण आप संसार के बोध में होते हैं, बोध को देने वाले को परमात्मा कहते हैं। समझे बात को? जो संसार को जान रहा है उसको जो जानने की शक्ति दे रहा हैं, उसे परमात्मा कहते हैं। जाना नहीं जा रहा है परमात्मा को। जाना किसको जा रहा है? संसार को। संसार को जानो भाई। संसार को जानो और जब तुम संसार को जान रहे हो तो समझ लेना कि परमात्मा ने आशीर्वाद दे दिया। न दिया होता तो संसार को कैसे जान पाते?

मैं आपसे ज़ोर देकर कह रहा हूँ, “कोई आवश्यकता नहीं है आत्मा का राज़ जानने कि।” वहाँ कोई राज़ है नहीं, कोई राज़ नहीं है। आप तो जानिए कि यह सब क्या है? कौन पैदा हो रहा है, क्यों पैदा होता है? पैदा होते ही क्यों रोता है? उसकी बुद्धि क्यों भ्रष्ट रहती है? वह जिन कर्मों को अपना भी कहता है उन कर्मों में अपनापन कितना होता है? दुनिया को ऐसे देखिए जैसे आप बिलकुल अनपढ़, बेबूझ हों, जैसे कुछ पता न हो। अवाक् रह जाइए, हक्के-बक्के कि यह खेल क्या चलता है! एक छोटे बच्चे को खेलते देखिए, अटक जाइए। इसने कैसे सीखा कि ऐसे खेलना है? कौन आकर सिखा गया इसको? सुबह-सुबह सड़क पर देखिए कि सारा ट्रैफ़िक भागा जा रहा है, ठिठक जाइए। थोड़ी देर रुककर किनारे खड़े हो जाइए, बस दो मिनट और पूछिए यह क्या है? यह माज़रा क्या है? यह कहाँ सब सुबह-सुबह जाते हैं और रोज़ ही जाते है और जिसको यह ज़िंदगी कहते हैं उससे एक दिन और कम हुआ। और फ़िर शाम को फिर उसी जगह खड़े हो जाइए, कहिए, अभी वापस जा रहे हैं? कहाँ को गए, कहाँ से आए? क्या खोया, क्या पाया?

वह सब जिसे मानवता महत्वपूर्ण कहती हैं, उस सबमें ज़रा एक दृष्टा की तरह खड़े हो जाया करिए।

जाते हैं शादी ब्याह में, वहाँ खड़े हो जाइए, कहिए यह क्या है? यह एक स्त्री हैं, यह पुरुष हैं, यह क्या हो रहा है? यह स्त्री पुरुष का रिश्ता क्या होता है? कैसा है यह रिश्ता? कैसे बन गया? क्या बुनियाद है? रिश्ता हम किसको कहते हैं?

शमशान के बगल से निकलिए तो मुँह न फ़ेर लीजिए, आँखें न बंद कर लीजिए। किसी जलती चिता को देखें और ज़रा ध्यानमग्न हो जाएँ। यह क्या जल रहा है? जो जल रहा है उसे कष्ट क्यों नहीं हो रहा? और क्या कष्टों का अंत ऐसे संभव है? यदि ऐसे ही संभव है तो फिर यही क्यों नहीं? और जो लोग आए थे उसे यहाँ तक छोड़ने, वह कहाँ गए? छोड़ क्यों गए? इसे तो अपना बोलते थे और इसे यदि छोड़ गए हैं तो फिर अपना किसे बोलते थे? कल तक तो इसी शरीर की ओर इंगित करके कहते थे, ‘तू मेरा, तू मेरा।’ इसी शरीर की ख़ातिर जाने कितने बवाल थे। आज इस शरीर को यहाँ छोड़ क्यों गए? वह कहाँ गया जिसे वह अपना कहते थे और यदि वह शरीर नहीं जिसे वह अपना कहते थे तो था कौन जिससे उन्हें आत्मीयता थी?

संसार को समझिए, यही तो महत्वपूर्ण है न आपके लिए? जन्म, विवाह, मृत्यु, नौकरी, घर। और किसकी ख़ातिर जीते हैं? मन में और क्या चक्कर काटता रहता है?

जाइए कहीं किसी अस्पताल के सामने खड़े हो जाइए। इधर एक बीमार अंदर गया, स्ट्रेचर पर लेटा हुआ। उधर से एक नवजात शिशु बाहर आया; माँ के उल्लास का ठिकाना नहीं। पूछिए, यह क्या, यह क्या? यह क्या हुआ अभी? यह मत कह दीजिए मुझे पता है — अरे भाई, बीमारी, शोक की बात है और जन्म हर्ष की बात है। ना, ऐसे नहीं चलेगा, ऐसे नहीं चलेगा कि मुझे तो पता है।

ठिठकना बहुत ज़रूरी है। भीड़ से थोड़ा किनारे खड़े होकर के मौन, ध्यान बहुत ज़रूरी है। और जब मैं ध्यान कह रहा हूँ तो मैं नहीं कह रहा न कि परमात्मा पर ध्यान करो। मैं कह रहा हूँ जो तुम्हारे सामने हैं, उसी को देख लो। ध्यान में सदा कोई ध्येय होता है। बिना ध्येय के न ध्यान हैं, न ध्याता है। ध्येय परमात्मा तो हो ही नहीं सकता। परमात्मा तो ध्याता के हृदय में होता है। वह ध्येय कैसे हो जाएगा? ध्येय तो संसार ही होगा। इसी संसार को कह रहा हूँ ध्येय बनाओ, इसको समझो।

और जहाँ हैं, जो हैं, वह सब अचरज से भरपूर है। आश्चर्यों में आश्चर्य यह है कि तुम्हें आश्चर्य होता क्यों नहीं! बहुमंज़िली इमारत है, पचास उसमें मंज़िलें हैं। कभी वहाँ रुकते नहीं तुम? यह क्यों खड़ी हुई है? हम क्या चाहते हैं?

यह पृथ्वी हैं; पृथ्वी पर प्रकृति है और इन्सान है। और इन्सान ने यह सब खड़ा करा है। इसका क्या सम्बंध है प्रकृति से? प्रकृति की क्या दिशा है, इन्सान की क्या दिशा है? प्रकृति क्या चाहती हैं? हम क्या चाह रहे हैं?

आईने के सामने ही खड़े हो जाया करो; चेहरे को देखो, झाइयों को देखो, माथे की शिकन को देखो, काले सफ़ेद बालों को देखो, बोझिल आँखों को देखो। मन में यदि इस ख़्याल को तवज्जो न दो कि जो सामने खड़ा है वह तो मैं ही हूँ, तो सामने का दृश्य तुम्हें विस्मित कर जाएगा! तुम अपने चेहरे को ही ऐसे भौंचक्कें होकर देखोगे कि यह क्या दिख गया आज। और मैं तुम्हें आश्वासन दे रहा हूँ तुम्हारे चेहरे से ज़्यादा आश्चर्यपूर्ण चीज़ कुछ हो नहीं सकती। यह प्रयोग करके देख लेना। आईने में आँखों को आँखों पर टिकाना। हैरान हो जाओगे। जब तुम हैरान हो जाते हो तब समझो कि तुम्हारे सामने तुमसे बड़ा कुछ आया। कुछ इतना बड़ा आया जो अब वाणी के द्वारा उच्चारित नहीं हो सकता। उसी अवस्था को कहा गया है अवाक रह जाना — अ, वाक्। अब वाक् काम नहीं करेगा। तुम्हारी ज़बान चिपक गई तालू से। कुछ इतना बड़ा सामने आ गया कि होंठ सिल गए।

यह तुम्हें किसी परी, किसी देवता या किसी पिशाच को देख करके नहीं अनुभव होने वाला। यह तुम्हे स्वयं को ही देख कर ही अनुभव हो जाएगा। आईने के सामने ही बिलकुल जड़वत् खड़े हो जाओगे। देखते नहीं न!

हम तो ऐसे हैं कि आत्मीयता के आलिंगन के प्रगाढ़तम क्षणों में भी प्रियतम का चेहरा भी ध्यान से न देखें। हम कुछ भी नहीं देखते ध्यान से। शब्द पर गौर करो — ‘ध्यान से देखना’। ध्यान, केंद्र हो देखने का। ‘ध्यान से देखना’ माने समझ लो परमात्मा ‘से’ देखना, परमात्मा ‘को’ नहीं देखना, ध्यान ‘से’ देखना।

संसार को देखो, ज़िंदगी को देखो, अपनी हालत को देखो, अपने विचारों को देखो, अपनी गति को, अपनी दौड़ को देखो — यही अध्यात्मिकता है। और स्वयं को देखे बिना जो राम-नाम जपे, सो राम का अनुगामी तो नहीं है। बड़े खेद की बात है कि राम का नाम आत्मज्ञान से बचने की विधि की तरह इस्तेमाल कर लेता है अहंकार।

जब राम ‘से’ देखते हो, जब ध्यान ‘से’ देखते हो तो दुनिया फिर वैसी नज़र नहीं आती जैसी तुमको आमतौर पर लगती है। दुनिया टूटने लगती है। इसी घटना को बताने वालों ने यूँ कहा है कि संतों को सर्वत्र परमात्मा ही नज़र आता है। उनका आशय बस इतना ही है कि उनको वह नज़र नहीं आता, संतों को, जो तुमको नजर आता है। तुम जो देखते हो उनको वह नहीं दिखता क्योंकि तुम जो हो वो, वो नहीं है।

जो तुम होकर देखते हो, वैसा ही तुम्हें नज़र आता है। भीतर तुम्हारें यदि धुआँ भरा हैं, कोहरा भरा है तो दुनिया में भी तुम्हारें लिए धुआँ और कोहरा ही होगा। और चलना तुम्हें दुनिया में ही है, जीव हो तुम। जो धुएँ और कोहरे में चलते हैं, उनका क्या होता है? ठोकरें खा-खा कर खा-खा कर बार-बार गिरते हैं। यह सज़ा है तुम्हारी। भीतर धुआँ भरा हो, भीतर राम का नाम न हो तो सज़ा यह नहीं होती है कि तुम्हें स्वर्ग नहीं मिलेगा। सज़ा यह होती है कि इसी दुनिया में सौ दफ़े ठोकर खाओगे और गिरोगे। जैसे कि ज़्यादातर लोग रोज़ाना गिरते हैं।

बात को समझना। भीतर धुआँ है तो बाहर भी धुआँ ही धुआँ है और बाहर अगर धुआँ-धुआँ है तो तुम ठोकर खाओगे और गिरोगे — यही तो नर्क है यही सज़ा है। संसार ही तो स्वर्ग हैं, संसार ही तो नर्क है। और भीतर यदि राम हैं तो भीतर प्रकाश है। भीतर यदि प्रकाश है तो बाहर भी प्रकाश है। बाहर यदि प्रकाश है तो सब दिखेगा साफ़-साफ़। और जिसको सब साफ़-साफ़ दिख रहा हैं, वह ठोकर नहीं खाएगा। वह पानी को पानी जानेगा और आग को आग जानेगा। फिर उसको पता है कि जीवन कैसे जीना है। फिर वह मीरा को मीरा जानेगा और माया को माया जानेगा। बात समझ में आ रही है?

यह स्वर्ग है — मीरा को मीरा और माया को माया जानना। यही तो स्वर्ग है। अन्यथा माया को मीरा समझोगे और पछियाए रहोगे।

इस बात से क्या आशय है कि संतों को सर्वत्र परमात्मा दिखता हैं? और यह बात तुम अध्यात्मिक साहित्य में खूब पढ़ोगे। इसका यही आशय है कि उसके हृदय में प्रकाश हैं, उसकी आँखों में रोशनी है तो उसको दुनिया साफ़ नज़र आती है। हमें दुनिया साफ़ नहीं नज़र आती। इसीलिए वह दुनिया को जैसा देखता है वैसा हम दुनिया को नहीं देखते और इसीलिए वह जैसा जीवन जीता है वैसा जीवन हम नहीं जीते।

हम तो ऐसे हैं कि जैसे कोई बेहोश आदमी कोहरे में गाड़ी चला रहा हो। कबीर से पूछो तो कहेंगे, “अरे थमो, गाड़ी के बारे में भी तो कुछ बोलो।” बोलते हैं, “नाँव जर्जरा।“ गाड़ी भी जर्जर है यह भी बताओ बेहोश आदमी। जर्जर गाड़ी और घना कोहरा, ऐसे हम ज़िंदगी जी रहे हैं। कोई ताज़्ज़ुब है कि हमें पग-पग पर ठोकर लगती है और पूरी काया खून से तर-बतर है। है आपकी हस्ती का कोई भी स्थान जहाँ चोट न लगी हुई हो? कोई भी जगह है आपके वजूद में जो घायल न हो? हर जगह चोट लगी हुई है। कोई कहीं भी छू दे, आप कहते हैं, “आह! दुख गया।“ होता है कि नहीं?

मुहावरा है — दुखती रग। हमारी कोई रग नहीं है जो दुखती है। हमारा तो पूरा वजूद ही सूजा हुआ है, पीड़ित। वह कहते हैं न कि अहंकार फ़ैलता है। वैसे ही फ़ैलती है जैसे सूजी हुई जगह फ़ैलती है। कभी अंगूठा सूजा है? सूजा अंगूठा देखा है कैसे फ़ैलता हैं? सूजे पाँव को आप जूते में डाल कर दिखा दें! यही तो अहंकार है।

दुनिया को जानो, दुनिया को समझो और डरना मत कि तुम दुनिया को जानने समझने लग गए तो तुम तो राम से विमुख हो गए। लोगों के मन में यह भी बड़ा भय उठता है। वह कहते हैं, “साहब, अगर हम दुनिया का ही अन्वेषण करने लग गए तो फ़िर हमने मंदिर को तो पीछे छोड़ दिया न?” पागलपन की बात मत करो।

दुनिया को अगर तुम समझने निकले हो और दुनिया यदि तुम्हें समझ में आ रही हैं, तो तुमने राम से ही शुरुआत की है और राम पर ही अंत होगा तुम्हारा। दोनों बातें समझना। दुनिया को समझने की तुम्हारी इच्छा उठ ही नहीं सकती अगर वह इच्छा राम प्रदत्त न हो। दुनिया से पूछो कि क्या तुझे समझें? तो दुनिया कहेगी न। दुनिया समझने की बड़ी विरोधी है।

दुनिया कहती है — हमारे साथ चलो, अनुगमन करो, हमारे रस्मों का, रवायतों का पालन करो। पर हमें कभी समझ मत लेना क्योंकि अगर तुमने हमें समझ लिया तो तुम्हारा अंत हो जाएगा। समझना मत, बस पालन करना‌।

तो दुनिया से पूछोगे कि तुझे समझें? तो दुनिया तो कहेगी “ना”। यानि कि दुनिया के चलाए तो तुम दुनिया को नहीं समझने वाले। तो किसके चलाए समझोगे तुम दुनिया को? सिर्फ़ राम के।

इसलिए मैंने कहा कि राम से शुरुआत होती है दुनिया को जानने की। अगर तुम समझने ही निकले दुनिया को तो तुम्हारी प्रेरणा, शक्ति, आदिसत्य के अतिरिक्त कुछ और नहीं हो सकता। उसी ने प्रेरणा दी है कि — देखो! समझो दुनिया को। और फिर मैंने कहा — राम से शुरुआत होती है और राम में ही अंत होता है। जिसने दुनिया को समझा उसका अंत राम के अलावा कहाँ होगा?

इतिहास साक्षी है। जिन्होंने भी दुनिया को जाना हैं, उन्होंने दुनिया को फ़ानी पाया है। फ़ानी समझते हो? क्षणभंगुर, नश्वर, मृत्युधर्मा, मिटने के लिए तैयार, भरोसे के क़ाबिल नहीं।

जो दुनिया को देखने निकलेगा, वह राम के अलावा और कहाँ ठिकाना पाएगा? तो तुम बिलकुल मत डरना कि दुनिया को देखने निकलें तो कहीं दुनिया में खो न जाएँ। नहीं ऐसा नहीं होगा। तुम निकलो दुनिया में, बस आँखें प्रकाशित रखना, आँखें खोल कर निकलना।

मैं तुमसे कह रहा हूँ तुम्हारा अंत मात्र ही नहीं होगा राम में, दुनिया को यदि देखने निकले हो तो तुम्हारी शुरुआत भी राम से ही हुई है। यह पूर्णतया धार्मिक कृत्य है। जहाँ आदि में राम हैं और अंत में राम हैं, वहाँ मध्य में भी तो राम का होना तय है न? तो तुम क्यों डर रहे हो कि संसार में निकले तो कहीं संसार हमें सोख न ले, कहीं संसार हमें जकड़ न ले। पगले हो क्या?

यदि वह कमरा आश्रम का है और यदि यह कक्ष आश्रम का है तो बीच में क्या बाज़ार आ जाएगी? आश्रम से आश्रम तक की यात्रा आश्रम से ही तो होकर होगी। तो राम यदि आदि में है और राम ही अंत में हैं तो मध्य में भी कौन होंगे? राम ही तो होंगे। तुम डर क्यों रहे हो?

सतर्क रहिए, सावधान, सचेत। “यह सब क्या है?” लगातार पूछते रहें। यह भावना, यह पूर्वाग्रह मन में आने ही न दें कि मैं तो जानता हूँ। छोटी-छोटी बातें जो बड़ी साधारण लगती हों रोज़मर्रा की, उनके प्रति भी जिज्ञासा रखें। जिज्ञासा और आध्यात्मिकता एकदम साथ-साथ चलते हैं। जो सवाल नहीं पूछ सकता, जो जिज्ञासु नहीं हैं, उसके लिए अध्यात्म में कोई जगह नहीं। और जिज्ञासा के बिना तो समर्पण भी सम्भव नहीं हो पाएगा। जब तक आपने जिज्ञासा करके यह जाना ही नहीं कि आप किस चीज़ से भरे हुए हैं, तब तक उस चीज़ को समर्पित कर देने का, विसर्जित कर देने का, आपमें हौंसला ही नहीं आएगा।

जब यह पता चल जाता है कि घर में कचरा बहुत हैं, तभी तो उस कचरे को फेंक पाते हो न? कचरे को फेंक पाओ, इसके लिए पहले कचरे का पता होना ज़रूरी है, कचरे के प्रति जिज्ञासा होनी ज़रूरी है। मुझे बताओ कचरा कहाँ है? यह भी नहीं “कचरा कहाँ हैं?” “मुझे बताओ यह क्या है जब चूक जाते तोजब चूक जाते तो?” और उत्तर में पता चला कि यह जो है सो कचरा हैं, तब तुम उसे फेंक पाओगे। इसी फेंक पाने को तो समर्पण कहते हैं। कि जो निरर्थक था, मूल्यहीन था, उसको मैंने फेंका, बहाया। यही तो समर्पण है।

समर्पण भी तुम कैसे करोगे अगर अपने रोज़मर्रा के जीवन के प्रति तुममें उत्सुकता ही नहीं हैं? अगर तुम यंत्रवत्, मूढ़ों की तरह कहे ही जा रहे हो “ऐसे ही तो होता है तो मैंने भी कर दिया। ऐसे ही तो सब जी रहे हैं तो मैंने भी कर डाला।” यदि यही तुम्हारा कथन है या ऐसी ही भावना है तो फिर छोड़ दो तुम। राम, शिव कृष्ण, कहाँ फँसे हो तुम? यह तुम्हारे लिए नहीं फिर।

कर तो आप बहुत कुछ रहे ही हैं। जो कर रहे हैं, उसको आँखें खोल कर देखिए — यह मैं क्या कर रहा हूँ, क्यों कर रहा हूँ? मैं नहीं कह रहा कि इस पूर्वाग्रह के साथ देखें कि जो कर रहा हूँ उसको रोकना है कि त्यागना है। मैं कह रहा हूँ, शुद्ध जिज्ञासा के साथ देखें।

यह क्या है जिसमें मैं सुबह से रात तक लिप्त हूँ? यह क्या है जो मेरे मन में लगातार चक्कर काट रहा है? बस जिज्ञासा। वह जिज्ञासा करने के लिए भी आपमें बड़ी हिम्मत चाहिए। वह हिम्मत आपको राम ही देगा। उस हिम्मत को बुलाइए, वह आएगी। इसी को प्रार्थना कहते हैं। प्रार्थना यही है — जो सामने हैं, जो समक्ष हैं, जो उपस्थित ही हैं, उसको देखने की सामर्थ्य दो मुझे।

प्रश्नकर्ता: मैं जिज्ञासा की ही बात कर रहा था लेकिन इसमें भी एक थोड़ा सा प्रश्न मेरे मन में आ रहा है कि यह जो प्रेरणा का स्रोत, जिज्ञासा का स्रोत हैं, यह भी ब्रह्म ही है। तो जो मेरी इच्छा पैदा होगी कि मुझे यह ताक़त दीजिए, वह भी तो स्रोत उसी का रहेगा।

आचार्य: हाँ। उसके बिना, कोई भी सद्-इच्छा पैदा होने नहीं वाली। उसके बिना, आपकी यह इच्छा तो हो सकती है कि संसार में लिप्त हो जाऊँ। समझिएगा। पर उसके बिना यह इच्छा नहीं पैदा होगी कि मैं संसार को जान लूँ।

यह दो बहुत अलग-अलग आयामों की इच्छाएँ हैं। एक इच्छा है कि मैं भोगूं, मैं लिप्त हो जाऊँ। दुनिया दिखी और मैं उसमें कूद पड़ूँ भोगने के लिए। और दूसरी इच्छा है कि मैं जानूँ कि यह क्या चीज़ है जो मुझे खाने के लिए दी जा रही है। इसे खाने की इच्छा तो उठ रही है पर इससे आंतरिकता देने से पूर्व, इसे ग्रहण कर लेने से पहले, यह पूछना ज़रूरी है कि यह है क्या। अब जब यह आप पूछ रहे हो कि यह है क्या? और यह चीज़ सुस्वादु लग रही हैं, तो जो हमारी बरसों की बनावट है वह चिल्ला-चिल्ला कर क्या कह रही है? पूछो मत, भोगो; जानो नहीं, खाओ। ऐसी स्थिति में जानने की इच्छा क़ायम रहे, यह चमत्कार तो राम ही कर सकता है। अन्यथा दुनिया जब सामने आती है, मैं फिर कह रहा हूँ, आपसे वह कभी नहीं कहती कि मुझे जानो। वह सदा यह कहती है कि मुझे भोगो।

ठहर करके भोगने से पूर्व जानना यह इच्छा तो कहीं पार से ही आ सकती है। और मैं तो इतने आगे की बात भी नहीं कह रहा कि भोगने से पूर्व जान लो क्योंकि भोग तो रहे ही हो। भोगने से पूर्व जानने की बात तो उसके लिए है जिसने अभी भोगा न हो। यहाँ ऐसा तो कोई भी नहीं है जिसने भोगा नहीं हो। हम सब तो भोग में आकंठ डूबे हुए हैं। है ना?

तो जिज्ञासा अभी यह भी नहीं है कि भोगने से पूर्व जानें। अब तो जिज्ञासा यह है कि यह जो मैं भोगे जा रहा हूँ इससे मुझे क्या प्रयोजन है, क्या मिल रहा है? किसके वशीभूत होकर मैं रोज़-रोज़ यही भोग रहा हूँ? अब तो जिज्ञासा मात्र यह है।

प्र२: यह भोग ही तो जिज्ञासा का कारण बनेगा न?

आचार्य: भोग जिज्ञासा का कारण नहीं बनते। आप जितना भोगते जाते हो जितना भोगते जाते हो, जिज्ञासा की चाह आपमें उतनी कम होती जाती है। कारण समझना।

दुनिया कुछ भी आपको भोगने के लिए निःशुल्क नहीं देती। आपने सदा जो भी भोगा हैं, उसका ऊँचा दाम चुकाया है। अब आप बीस साल से दाम चुका रहे हो किसी चीज़ के। जिसका दाम आपने बीस साल चुकाया हैं, उसके प्रति जिज्ञासा करना बहुत मुश्किल हो जाएगा। पूछो क्यों? क्योंकि यदि जिज्ञासा का उत्तर आ गया कि तुमने दाम व्यर्थ चुकाया तो अहंकार को बड़ी चोट लगेगी। अहंकार कहेगा कि बीस साल जीवन के जिस चीज़ को दे दिए और अब सिद्ध हो रहा है कि वह सब व्यर्थ था! तो जो जितना ज़्यादा भोग का अनुभवी हो जाता हैं, उसके लिए जिज्ञासा करना उतना मुश्किल हो जाता है। क्योंकि अब आपने निवेश का पहाड़ खड़ा कर लिया है। उसको पीछे छोड़ना बड़े हिम्मती आदमी की बात है।

प्र: व्यर्थता तो वहीं से समझ आएगी न?

आचार्य: समझ ही नहीं आएगी न। समझ तो आप ऐसे कह रहे हैं कि जैसे मौजूद है। समझ के ऊपर भोग का पहाड़ खड़ा हो जाता है। इसीलिए क्रांतियाँ कभी बहुत अनुभवी लोगों द्वारा नहीं होतीं। उनके सामने तो, जैसा मैंने कहा, उनके निवेश का पहाड़ खड़ा होता है। वह कहते हैं, “अब तो तीस-चालीस साल इस तरह की ज़िंदगी जी है। हम कैसे स्वीकार कर लें कि आज तक जैसे जिया वह सब झूठा था, नकली था और हम बेवकूफ़ बने?” वह नहीं स्वीकार कर पाते। वह तो यही कहेंगे कि देखो बेटा हमारे पास अनुभव बहुत है।

प्र: लेकिन कई बार अहंकार न हो लेकिन परिस्थितियों वश वह भोगा ही चला जाता हैं, भोगा ही चला जाता है।

आचार्य: परिस्थितियाँ आमंत्रित कर सकती हैं। भोगने का कृत्य सदा आपकी सहमति से होगा। और ऐसा तो कोई भी नहीं दुनिया में जो किन्हीं भी परिस्थितियों में घिरा हुआ न हो।

आप जेल चले जाइए। वहाँ जितने अपराधी होंगे उनसे पूछिए, “क्यों किया?” वो कहेंगे, “परिस्थितियाँ ऐसी थीं।“ परिस्थितियाँ तो सबके लिए हैं। राम परिस्थिति नहीं हैं। परिस्थिति का अर्थ समझते हैं? बाहर की स्थिति। परिधि पर जो स्थिति हो उसे कहते हैं, परिस्थिति। वह बाहर-बाहर की बातें हुई।

अंतःस्थिति क्या है यह बताइए न? अंतःस्थिति यदि ठीक होती तो परिस्थिति से फ़र्क नहीं पड़ता। और अंतःस्थिति जब ठीक होती है तो परिस्थिति के रंग और मायने अपनेआप बदल जाते हैं। एक ही परिस्थिति में क्या सबलोग एक से होते हैं? क्यों नहीं होते? क्योंकि सबकी अंतःस्थिति अलग-अलग है।

राम और रावण को एक ही स्थिति में रख दीजिए। उनका आचरण, उनका मन, उनका व्यवहार बिलकुल अलग-अलग रहेगा। तो स्थिति की बात करना ऐसा ही है कि जैसे कोई अपनी असमर्थता का पक्ष ले। असमर्थता भी बिलकुल अनुकूल शब्द नहीं है। जो एक शब्द सदा अनुकूल होता है वह होता हैं, ‘असम्यक चुनाव’। चुना नहीं ठीक से।

निर्णय की घड़ी में चूक हो गई और वह चूक होती ही जाती हैं, होती ही जाती है। पीछे जो हुई सो हुई, चुनाव तो अभी भी हो रहा है न? अभी ठीक चुनिए और अभी ठीक चुनने में न परिस्थितियों का हवाला दीजिए, न अतीत का। ठीक अभी सही चुनाव करिए। वह संभव है।

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