आचार्य प्रशांत: मुकेश पूछ रहे हैं कि क्या ध्यान करते समय किसी पर केंद्रित होना है? गिरेन्द्र कह रहे हैं कि मन एक बार में एक ही काम क्यों करना चाहता है? कहते हैं कि जब ईश्वर को याद करता हूँ तो संसार को भूलता हूँ। जब संसार याद आता है तो ईश्वर से ध्यान हटता है।
सत्य पर ध्यान केंद्रित नहीं किया जा सकता। सत्य आँखों के सामने का दृश्य नहीं है। वह आँखों की रोशनी है। जो भी कोई यह माँग करेगा कि उसे सत्य को देखना है या सत्य पर ध्यानस्थ होना है, या तो असफल रहेगा या स्वयं को धोखा देगा।
मैं इसको (गिलास को हाथ में उठाते हुए) उठा रहा हूँ। सत्य यह पात्र नहीं है, सत्य पात्र का पदार्थ नहीं है। इस गिलास को इस शर्बत को सत्य नहीं समझिएगा, सत्य इस हाथ की ताकत है। सत्य इस हाथ की ताकत है जो पदार्थ को उठाती है, जो पदार्थ को चिह्नित करती है, जो पदार्थ को पदार्थ रूप में देखती है। कर्म नहीं है सत्य, कर्ता के पीछे का स्रोत है। कर्म नहीं है सत्य, कर्ता के पीछे का स्रोत है।
कमज़ोर हाथ, कमज़ोर कर्म; मज़बूत हाथ, मज़बूत कर्म। कर्म प्रमाणित कर देते हैं कि सत्य से उठ रहे हैं कि नहीं। पर समस्त कर्म होते तो भौतिक आयाम में है न? उस आयाम में ख़ोजने मत निकल पड़िएगा। इसके आयाम में सत्य आपको नहीं मिलने वाला। आँखों ने इसको देखा, हाथों ने इसको उठाया। आँखों के पीछे जो हैं, उसे कहते हैं सत्य। उसी को ब्रह्म कहते हैं। उसी को आप जो कहना चाहें कह लें। अविनाशी, अमर-तत्व उसी को कहते हैं — जो भी नाम देना चाहें।
तो अब प्रश्न को देखिए, गिरेन्द्र(प्रश्नकर्ता) कह रहे हैं कि जब ईश्वर को याद करता हूँ तो संसार छोड़ता है, जब संसार को याद करता हूँ तो ईश्वर छूटता है। प्रश्न ऐसा ही है कि जब इसको(गिलास) उठाऊँ, हाथ तो मेरा एक है, तो इसको(दूसरी चीज़) कैसे उठाऊँ? कि जब इसको उठाऊँ तो हाथ तो गया फँस। अब इसको कैसे उठाऊँ? हाथ एक है, विकल्प दो हैं; चुनाव करना हैं; एक ही चुना जा सकता है। मैं तो असमंजस में।







