मनुष्य के मन की बेचैनी का अय्याशी समाधान होती तो अमेरिका में सब एकदम प्रसन्न ही नहीं, आनंदित होते। लेकिन मानसिक समस्याएँ भारत की तुलना में अमेरिका में और अधिक पाई जाती हैं। आदमी अय्याशी इसलिए नहीं करता कि उसे अय्याशी से प्रेम है, वह अय्याशी इसलिए करता है क्योंकि वह भीतर से बहुत दुखी है। सारी समस्या बस यही है कि आँखें बाहर देख सकती हैं, भीतर नहीं देख सकतीं। अय्याशी कोई समाधान नहीं है, क्योंकि यदि उसमें सच में कुछ सार्थक मिलता, तो बुद्ध और महावीर अपना विलासितापूर्ण, वैभवपूर्ण जीवन छोड़कर जंगलों की ओर न जाते।
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आचार्य प्रशांत: कोई अय्याशी कर रहा हो तो वो बाहर-बाहर से आपको दिखाई देगा कि ये बहुत अय्याशी कर रहा है। चार करोड़ की गाड़ी में चल रहा है, उसने अपना बहुत बड़ा महल बना लिया है, पैसे उड़ा रहा है। प्राइवेट जेट और ये जितनी चीज़ें होती हैं, अय्याशी के जो चिन्ह होते हैं, वो आपको सारे दिखाई देंगे। तो बाहर-बाहर से तो आपको दिखाई दे जाएगा कि अय्याशी चल रही है, लेकिन भीतर का जो खोखलापन और सूनापन है वो आपको कभी दिखाई देगा?
प्रश्नकर्ता: नहीं।
आचार्य प्रशांत: अमीरों की शादियाँ होंगी, उसमें दो-सौ करोड़ उड़ा दिए गए, वो दो-सौ करोड़ जो उड़ाए गए उसकी फोटो खींच ली जाएगी, लेकिन भीतर यहाँ अभी भी जो श्मशान गूँज रहा है उसकी फोटो खिंचती है कभी? उसकी फोटो खिंचती नहीं, उसकी फोटो आपके सामने आती नहीं, तो आपको कभी पता चलता नहीं कि इतनी अय्याशी करके भी ये आदमी कितना दुखी है।
सारी समस्या बस यही है कि आँखें बाहर देख पाती हैं, इधर नहीं देख पाती (भीतर की ओर इशारा करते हुए)। अय्याशी समाधान नहीं है। अय्याशी समाधान होती तो अमेरिका में सब एकदम प्रसन्न ही नहीं, आनंदित होते। लेकिन मानसिक बीमारी जितनी भारत में है उससे ज़्यादा अमेरिका में पाई जाती है। हर चौथे दिन पढ़ते हो, कोई बन्दूक़ लेकर के गया और चालीस बच्चे मार दिए। घुस गया है, किनको मार रहा है? छोटे-छोटे, दूधमुँहे बच्चे को। जाकर के चालीस मार दिए।




