हमेशा पूछा करो कि यह जो ग्रंथ है, क्या यह अपने केंद्र में मेरी समस्या को रख रहा है? अगर रख रहा है, तो वह ग्रंथ आपके काम का है। दुर्गा सप्तशती में सुरथ और समाधि की जो समस्या है, वह हमारी, आपकी, सबकी समस्या है। कौन-सी समस्या? आदमी का मोह में ग्रस्त रहना, आदमी का अपमान पाकर दुख झेलना। यह बात आज भी हो रही है। अगर आप यह समझ पाएँ, तो आगे फिर आपको देवी से बोध और आशीर्वाद प्राप्त होगा।
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आचार्य प्रशांत: तो मूल प्रश्न क्या है सप्तशती में? जो वहाँ पर मूल समस्या है, वह कोई दैवीय समस्या नहीं है, वह कोई शास्त्रीय समस्या नहीं है, वह कोई पारलौकिक समस्या नहीं है। वह पूरे तरीक़े से हमारी, आपकी, मानवीय समस्या है। और जो भी ग्रंथ किसी मानवीय समस्या से नहीं उलझ रहा, मूल्यहीन है - व्यर्थ, त्याज्य, है न?
मनुष्य ग्रन्थ के पास जाता ही क्यों है? अपनी समस्याएँ सुलझाने के लिए न? हमेशा पूछा करो कि यह जो ग्रन्थ है, क्या यह अपने केंद्र में मेरी समस्या को रख रहा है? अगर रख रहा है तो वह ग्रन्थ आपके काम का है। जैसे हमने कहा कि भगवद्गीता में अर्जुन की जो समस्या है, वह हमारी, आपकी, पूरे विश्व की समस्या है। इसीलिए गीता हमारे इतने काम की है।
इसी तरीक़े से सप्तशती में सुरथ और समाधि की जो समस्या है, वह हमारी, आपकी, सबकी समस्या है। इसलिए यह ग्रन्थ हमारे काम का है। और अब मुनि आगे जो कुछ भी बताएँगे, वह बात हमारे काम की है। ध्यान दीजिएगा कि आगे जो कुछ बताया जा रहा है, वह बड़े प्रतीकात्मक तरीक़े से बताया जा रहा है। कोई ऐसी गुप्त बात को सरल करने के लिए बताया जा रहा है, जो यदि सरल नहीं की गई, तो आम मन में उतरेगी नहीं।
निश्चित रूप से जो बताया जा रहा है, वह इतिहास नहीं है। जिन घटनाओं का वर्णन किया जा रहा है, वो स्थूल घटनाएँ नहीं हैं। वो मानस घटनाएँ हैं, सूक्ष्म घटनाएँ हैं। वो ज़मीन पर नहीं घट रही हैं, वो धरालोक पर नहीं घट रही हैं, वो मानसलोक में घट रही हैं; वो किसी समय पर नहीं घटी थीं, वो हर समय घट रही हैं।




