प्रश्नकर्ता: पिछले बीस-चालीस साल से ऐसा क्यों हो रहा है कि लोगों को राम पसंद आने बहुत कम हो गए हैं? तो आम जनमानस को ख़ासतौर पर जो नई पीढ़ी है उसे तो नहीं ही पसंद आते राम, इधर पिछले बीस-चालीस साल के कुछ प्रसिद्ध गुरुओं ने भी राम का बड़ा अनादर और विरोध किया है। राम लोगों को पसंद क्यों नहीं?
आचार्य प्रशांत: राम को थोड़ा ज़रा अभी अलग रखते हैं, कुछ मूल बातें समझते हैं इंसान के बारे में। इंसान की पूरी प्रकृति को समझिए। हमारी रचना और हमारे रुझान को समझिए। हम इस तरीक़े से निर्मित हैं कि हमें दुनिया की चीज़ें भोगने में बड़ी रुचि रहती है।
ये हाथ हैं दो, ये मन के अंदर की किसी चीज़ को तो पकड़ नहीं सकते न। आप कितना भी बोल दें — मेरे भीतर आत्मा इत्यादि है, हाथ आत्मा को तो नहीं पकड़ सकते, हाथ विचारों को भी नहीं पकड़ सकते, पर ये हाथ पकड़ने को बहुत लालायित रहते हैं। इन्हें बाहर की कोई चीज़ चाहिए पकड़ने को।
इन आँखों को लगातार बाहर की चीज़ें देखनी हैं और बाहर भी वो चीज़ें देखनी हैं जो देख करके बस मज़ा आ जाए। ये कान हैं इन्हें बाहर से कुछ सामग्री सुननी है। किसी की बातचीत सुननी है, संगीत सुनना है, कोई और आवाज़ सुननी है। कौन-सी आवाज़ सुननी है? जिसको भोग करके अनुभव बड़ा अच्छा आए। मन को भी ऐसा ही करना है।
मन को भी विचार भोगने हैं, कल्पनाएँ भोगनी हैं। मज़ा आना चाहिए बस। और आँखें, भूलिएगा नहीं भीतर को नहीं देख सकती, कान भीतर का कुछ नहीं सुन सकते। हमारी पूरी रचना ही इस तरह है कि हमें बाहर से भोगना है।
जानवर भी यही करते हैं, वो लगातार बाहर को देखते रहते हैं। खरगोश की कभी आप नाक देखिएगा। वो लगातार अपनी नाक जो है चलाता रहता है। वो लगातार सूंघ रहा है कि बाहर कुछ मिल जाए, भोग लूॅं। बंदर को देखिएगा, बंदर लगातार इधर-उधर कूद फांद कर रहा है कि कुछ मिल जाए, जल्दी से खा लूॅं। बिल्ली को देखिएगा, वो कभी इस घर में घुस रही है, कभी यहाॅं झांक रही है, कभी वहाॅं जा रही है, कुछ खाने पीने को मिल जाए, भोग लूॅं।







