धर्म की दिशा सबसे पहले भीतरी होती है। दूसरों को काफ़िर कहकर मार देना धर्म की दिशा नहीं है। धर्म जब गलत दिशा ले लेता है, तो ऐसी व्यापक तबाही करता है जिसकी कोई इंतहा नहीं होती। धर्म दोधारी तलवार है — अगर सही से समझा गया, तो ऊँचाइयों पर ले जाएगा; और नहीं समझा गया, तो ऐसा गिराएगा कि उठना असंभव हो जाएगा।
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प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी, बात थी बेसिकली अबाउट जिहाद एंड जिहाद के बारे में जितना सबको जो पता होता है मीडिया के थ्रू वो ये होता है कि एक्सटर्नल स्ट्रगल। जो जिहाद अल-नफ़्स है वो क़ुरान में ये लिखा है — जिहाद अल-नफ़्स इज़ द अफ़ज़ल जिहाद माने — इंटरनल स्ट्रगल। ये इतना डिफिकल्ट समझने के लिए भी और ट्रांसलेट करने के लिए भी इतना क्यों हो गया कि बाहर की लड़ाई और बाहर का जिहाद आसान हो गया? और ज़्यादा सर चढ़ के बोलता है और जो इंटरनल जिसके ऊपर इतना स्ट्रेस दिया गया है हमेशा से वही चीज़ को इतना नीचे दबा दिया गया जबकि उससे तो हमें सारे आंसर्स सारे ख़ुलासे उसी से हमारे होने वाले हैं। तो ये शिफ्ट कैसा होता है और क्यों होता है और इसका हम किस तरीके से इसके ऊपर सर हम चेंज ला सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: हम जो भी हैं जैसे भी हैं वो हमारी गतिविधि के हर क्षेत्र में दिखाई देगा ना। तो हम धर्म का क्षेत्र कह देते हैं ऊँचे से ऊँचा है। फिर व्यापार का क्षेत्र कह देते हैं कि बाहर की दिशा देखता है। फिर एक क्षेत्र होता है हमारी व्यक्तिगत गतिविधियों का जिसको हम कहते हैं साधारण ज़िन्दगी। लेकिन हम जैसे धर्म के क्षेत्र में होते हैं, वैसे ही ज़िन्दगी के सभी छोटे-छोटे छोटे-छोटे क्षेत्रों में होते हैं। तो, हम कहीं भी क्या कर रहे हैं, उससे ये भी पता चल जाएगा कि धर्म में भी जो गड़बड़ हुई है, वह क्यों हुई।




