Acharya Prashant is dedicated to building a brighter future for you
Articles
जहाँ ज्ञान है, वहाँ विद्रोह भी होगा। (गुरु गोविन्द सिंह जी पर)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
30 min
152 reads

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, कल गुरु गोविन्द सिंह जी की जयन्ती है, तो हम उन्हें आदर्श रूप में कैसे स्थित करके अपने जीवन को बेहतर बना सकते हैं? जैसा कि आपने भी बोला है कि युवा के पास ऊर्जा तो है लेकिन सही आदर्श नहीं हैं, हमने आदर्श ग़लत लोगों को बना रखा है जो कि लगातार भोगवाद को प्रेरित करते हैं। तो हम अपने जीवन को बेहतर और ऊँचा कैसे कर सकते हैं, उत्कृष्टता कैसे पा सकते हैं जीवन में?

आचार्य प्रशांत: देखो, आन्तरिक जगत में ज्ञान और प्रेम से शुरुआत होती है। ठीक है? तो शुरुआत हम पाते हैं गुरु नानक देव जी के साथ, वहाँ हमको ज्ञान और प्रेम का बड़ा एक सुन्दर प्राकट्य देखने को मिलता है। पर ज्ञान और प्रेम, और निष्ठा और भक्ति, ये तो आन्तरिक होते हैं न। और यही तत्व जो आन्तरिक जगत में ज्ञान और प्रेम का नाम रखता है, ये बाहरी जगत में विद्रोह बनकर सामने आता है।

तत्व एक ही है। एक ही तत्व है, जब वो भीतर होता है तो हम उसे कभी बोध कह देते हैं और कभी प्रेम कह देते हैं। और जो भीतर बोध है, प्रेम है, वही जगत में, समाज में अन्याय-अनाचार के विरुद्ध विद्रोह बनकर सामने आता है।

तो वही तत्व आप पाते हो गुरु नानक देव जी में एक प्रकार से अभिव्यक्त होता हुआ और गुरु गोविन्द सिंह में बिलकुल दूसरे तरीक़े से अभिव्यक्त होता हुआ; तत्व एक ही है। और इसमें बड़ी गहरी सीख छुपी है — तुम्हारा ज्ञान, तुम्हारा प्रेम सब शून्य है, ढकोसला है, पाखंड है अगर वो विद्रोह नहीं कर सकता, अगर वो लड़ नहीं सकता।

गुरु गोविन्द सिंह जी का समय याद है न, उस समय पर कैसी सामाजिक और धार्मिक और राजनीतिक परिस्थितियाँ थीं? उस समय पर आवश्यक था कि ज्ञान विद्रोह बने, कि खालसा को खड़ा किया जाए। शुद्ध पुरुष — जो धर्म के क्षेत्र में कभी हार नहीं मानता, कभी पीछे नहीं हटता — खालसा। खालसा माने ‘शुद्ध’, ‘पूर्ण’।

तो अच्छे से इसको समझो!

‘भीतर बहुत समझ विकसित हो गयी है, भीतर तो हमारे बड़ी भक्ति है।’ ये दावे अक्सर झूठे हो सकते हैं क्योंकि कोई तरीक़ा नहीं है आपके भीतर क्या है, उसको नापने का। कोई भी बोल दे, ‘मुझसे बड़ा कोई ज्ञानी नहीं।’ चार किताबें पढ़कर बता दो ज्ञान, ‘मुझसे बड़ा कोई भक्त नहीं।’ भक्ति के नाम पर कुछ कर्मकांड करने लग जाओ।

पर सचमुच तुम्हारे भीतर वो जो तत्व है, वो जो सद्वस्तु है, वो कितनी प्रकट हो रही है ये तो इसी से पता चलेगा कि आप जगत में अपने कर्म में कितनी बुलन्दी से चमकते हो, शोषण और अधर्म के ख़िलाफ़ आप खड़े हो पाते हो कि नहीं।

उनके आसपास का जो इलाका था — पंजाब बड़ा विस्तृत क्षेत्र था, आज का जो पंजाब है इसको पंजाब मत मान लेना। जो पाकिस्तान का पंजाब का इलाका है वो तो था ही, साथ में जो पहाड़ी इलाका है हिमाचल का, ये भी पंजाब था, हरियाणा भी पंजाब था — तो ये जो पहाड़ी इलाका था, इस पर तमाम राजा लोग थे, वो हिन्दू राजा लोग थे, उन सबने घुटने टेक रखे थे और उन्होंने मुगलों के साथ कई तरह के समझौते कर लिये थे और सम्बन्ध बना लिये थे। राजनैतिक तल पर समझौते करे थे और पारिवारिक तल पर सम्बन्ध कर लिये थे।

ज़्यादातर सम्बन्ध ऐसे ही होते थे कि राजा अपनी बेटी किसी मुगल बादशाह को या उनके किसी दरबारी को या सेनापति को ब्याह में दे देता था। तो इससे उसको सुरक्षा का आश्वासन मिल जाता था, राजा को।

तो गुरु गोविन्द सिंह ने इन सब राजाओं से जाकर कहा, ‘ये तुम क्या कर रहे हो, ये तुम ठीक कर रहे हो? ये जो तुम कर रहे हो ये धर्म है?’ वो राजा लोग इतने डरे हुए थे और धर्म से इतने दूर हो चुके थे कि उनको बात ही नहीं समझ में आयी।

आपको पता है उन लोगों ने गुरु गोविन्द सिंह जी का विरोध भी किया और ये ही नहीं कि बस मौखिक विरोध, रणक्षेत्र में विरोध किया, लड़ाइयाँ लड़नी पड़ीं। जिनको वो बचाना चाहते थे उन्हीं से लड़ना पड़ा। उनका नाम ही यही है न, ‘चादरे हिन्द’ सुना है? हिन्द को बचाने के लिए कहते हैं कि आये थे वो। जिनको वो बचाना चाहते थे, उन्हें उन्हीं के ख़िलाफ़ लड़ाइयाँ लड़नी पड़ीं।

दिल्ली के ख़िलाफ़ वो लड़े, ये तो सब जानते हैं। पर पंजाब के ही वो सब लोग और वो सारी जनसंख्या जिसके लिए वो कवच की तरह, चादर की तरह खड़े हो रहे थे, वो भी उनके ख़िलाफ़ ही थी। उनके ख़िलाफ़ भी उन्हें युद्ध करना पड़ा और वो धर्मयुद्ध कहलाता है।

समझ में आ रही बात ये?

तो वहाँ आप बहुत प्रदर्शन नहीं पाएँगे विद्वत्ता का, जब गुरु गोविन्द सिंह जी की बात आती है। गुरुग्रन्थ साहिब में उनका बस एक वक्तव्य है, हालाँकि अन्य कई उनकी रचनाएँ हैं। पर उनकी जो रचनाएँ थीं वो रणक्षेत्र में थीं ― ‘सन्त सिपाही’। श्लोक हमेशा कलम से नहीं लिखे जाते, कई बार तलवार से भी लिखे जाते हैं। उन्होंने तलवार से एक तक़रीर लिखी, एक तस्वीर खींची।

समझ में आ रही है बात ये?

धर्म के क्षेत्र में भरे पड़े हैं ऐसे लोग, मुँह चलाने वाले, कोने में बैठकर ध्यान करने वाले, एकान्त मनन और चिन्तन करने वाले। पर आज के समय में हमें चाहिए सक्रियता, आज के समय में हमें चाहिए जुझारूपन। तब अगर अत्याचार औरंगज़ेब इत्यादि कर रहे थे, तो आज कौन अत्याचार कर रहा है? अत्याचारी तो आज भी हैं।

आज कौनसा बड़े-से-बड़ा ख़तरा है धर्म के सामने? आज का बड़े-से-बड़ा ख़तरा है आदमी का अहंकार, अज्ञान — जिसने धर्म के क्षेत्र का ही बेड़ा ग़र्क़ कर दिया है और हमारी भोग की अदम्य कामना, जिसके मारे हम पूरी पृथ्वी को खाये जा रहे हैं। आज सूरमा चाहिए जो इन सब अत्याचारियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा सकें, हथियार उठा सकें। और हथियार हमेशा तलवार नहीं होती।

रणक्षेत्र आज भी है। और जो अपनेआप को ज्ञानी बोलते हों, धार्मिक, आध्यात्मिक बोलते हों, प्रेमी बोलते हों, भक्त बोलते हों, उन पर सबसे बड़ा दायित्व है कि वो मैदान में उतरें, बड़ी-से-बड़ी क़ीमत अदा करें — सिख गुरुओं ने जो बलिदान दिये हैं, उनसे तो आप परिचित ही हैं। चाहे वो साहबजादों की कुर्बानी हों, चाहे व्यक्तिगत तौर पर उन्होंने जितने कष्ट झेले, उन सब कुर्बानियों की आज भी बहुत ज़रूरत है, बस दुश्मन का नाम बदल गया है। और दुश्मन कोई व्यक्ति ही हो ये ज़रूरी नहीं होता न, दुश्मन कोई वृत्ति भी तो हो सकती है।

आज जो साधारण जनमानस, आम आदमी के भीतर जो भयानक भोगवृत्ति दहका दी गयी है वो इस युग का नर्क है, वही अत्याचारी है, वही हमारा रोग है, वही हमारा शोषक है। उसके ख़िलाफ़ लड़ना पड़ेगा।

समझ रहे हो बात को?

तो गुरु गोविन्द सिंह जी ने सिखों को एक ज़बरदस्त सक्रिय और लड़ाका बल में तब्दील कर दिया। और वो पूछा करते थे, कहते थे, ‘अगर तुमको सचमुच अमृत समझ में आया है तो तुम मेरे साथ क्यों नहीं हो?’ अमृत माने सत्य, अमृत माने आत्मा। बोलते थे, ‘अमृत अगर समझ में आया है तो मेरे साथ क्यों नहीं हो?’ और अगर मेरे साथ हो तो बड़ी-से-बड़ी क़ुर्बानी तुमको देनी पड़ेगी।’

वो इम्तेहान लेते थे, उनसे कोई मिलने आये तो कहते थे, ‘मेरे लिए ये चीज़ें मत लाया करो खाने-पीने वगैरह की’ — जो आमतौर पर हम साधारणतया धर्म में या अध्यात्म में, भक्ति में लाते हैं न कि कोई कपड़ा लेकर जा रहा है, कोई खाना-पीना लेकर जा रहा है — बोलते थे, ‘ये सब मत लाया करो, हथियार लाया करो! मुझे हथियार चाहिए, मुझे तुम्हारी शुभेच्छाएँ नहीं चाहिए, मुझे हथियार दो।’

लोग कहते थे, ‘पर आप गुरु हैं, आप तो आध्यात्मिक गुरु हैं, आप हथियार?’ बोले, ‘हथियार दिया करो।’ पंच प्यारों का याद है न? उन्होंने उनसे ये नहीं कहा था, ‘बताओ कितने श्लोक याद हैं, बताओ कितने श्लोक तुम्हें पता हैं, बताओ’ नहीं श्लोक नहीं। बोले, ‘कुर्बानी दे सकते हो? दे सकते हो तो मेरे साथ के हो, नहीं तो कुछ नहीं।’ तो आज सूरमा चाहिए जो अपनी कुर्बानी दे सके।

अध्यात्म जो खुलकर गरजने से डरता है वो अध्यात्म नहीं है, पाखंड है। पाखंड बस यही नहीं होता कि चोरी-छुपे भोग कर लिया तो इसको पाखंड बोल दिया। जो तुम दावा करते हो कि समझ गये उसको समझकर के न जीना सबसे बड़ा पाखंड है, जो तुम जानते हो कि सच है, उसको जानकर के भी कह न पाना सबसे बड़ा पाखंड है।

जहाँ आवाज़ उठनी चाहिए, वहाँ आवाज़ को दबा देना सबसे बड़ा पाखंड है। जहाँ धर्मयुद्ध लड़ा जा रहा हो, वहाँ पर जाकर कोने में किनारे पर हाशिये पर बैठ जाना और वहाँ से दर्शक, प्रेक्षक की भाँति बस घूरना कि बढ़िया लड़ाई चल रही है, हम तो साहब दर्शक हैं — ये सबसे बड़ा पाखंड है।

समझ रहे हो बात को?

और हम अपनी कायरता वगैरह छुपाने के लिए न, कायरता को बड़े मीठे-मीठे नाम दे देते हैं। जिनकी मैदान में कूदने की हिम्मत नहीं होती वो बोल देते हैं, ‘हम मैदान में क्या कूदें, हम तो साक्षी हैं। जो मैदान में कूदता है, वो तो आसक्त हो गया न, वो तो लिप्त हो गया। हम तो अनासक्त, निर्लिप्त, निष्पक्ष द्रष्टा मात्र हैं।’ ये बन्द करो बेईमानियाँ!

जो क़ीमत अदा करनी पड़े, करो! और अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध को प्रतिक्रिया नहीं बोलते, न हिंसा बोलते हैं। सच के लिए भिड़ जाने को हिंसा नहीं बोलते, न झूठी परम्पराओं और पूर्वाग्रहों और मान्यताओं के विरुद्ध आवाज़ उठाने को अमर्यादा बोलते हैं। नहीं, ये अमर्यादा या बदतमीज़ी की बात नहीं है। ‘झूठ के ख़िलाफ़ हम बोलेंगे, खुलकर बोलेंगे, इसमें मर्यादाहीनता क्या है?’ जो चीज़ झूठी है उसका सम्मान करने को मर्यादा थोड़े ही बोलते हैं, या बोलते हैं?

प्र: नहीं बोलते हैं।

आचार्य: तो ये सब हमें गुरु गोविन्द सिंह जी ने सिखाया। उन्होंने धर्म को एक नया आयाम दे दिया, तलवार का आयाम। ये नहीं कि उन्होंने कहा कि जो ज्ञान का आयाम है उसको छोड़ देना है, नहीं! ज्ञान का आयाम तो रहेगा, प्रेम का आयाम तो रहेगा, लेकिन साथ-ही-साथ सक्रियता, सशक्त सक्रियता का आयाम भी होना चाहिए। जहाँ बस बोल-बातचीत मात्र है और संघर्ष नहीं, वो फिर धर्म नहीं है, पाखंड है।

अरे! ये मैं कैसे भूल सकता हूँ। कैसे भूल सकता हूँ, इस पर तो हमने सत्र करा है कई बार और पूरी-पूरी चर्चा करी है ―

देह शिवा बर मोहे इहै शुभ करमन ते कबहूँ न टरों।

~ स्वैया 231, चण्डी दी वार, श्री दशम् ग्रन्थ साहिब

ये है! ये सिखाया है हमें गुरु गोविन्द साहब ने। वरदान माँग रहे हैं। हाँ, शिवा; शिव नहीं है, शिवा ― शिवा माने ‘काली’। लोग सोचते हैं जैसे अँग्रेज़ी में शिव को शिवा बोल देते हैं न, तो सोचते हैं कि ये शिव से स्तुति करी, शिव से नहीं है, शिवा से स्तुति है। वो चंडी उपासक थे, वो देवी उपासक थे, शक्ति के उपासक थे। और ये बात बिलकुल समझ में आती है न कि गुरु गोविन्द सिंह साहब तो शक्ति के ही तो उपासक रहे होंगे, और क्या!

“देह शिवा बर मोहे इहै, शुभ करमन ते कबहूँ न टरों।”

ये ही वरदान दे दो। क्योंकि ये जो देह है न, ये अपने भीतर बड़ी वृत्तियाँ रखती है — टाल-मटोल की, कुतर्क की, आलस की, डर की — और ये सब वृत्तियाँ कहती हैं, ‘टर जाओ।’ टरना माने हटना, पीछे हटना।

ये देह ही मनुष्य को सच्चाई की जगह प्रकृति के रास्ते पर धकेलना चाहती है। तो गुरु साहब प्रार्थना कर रहे हैं, जो सही है — सच ही तो शुभ होता है, शुभ कर्म माने सत्योन्मुखी कर्म — उससे कभी हटूँ नहीं। इस पर हमने बड़े विस्तार से चर्चा करी थी कई साल पहले, केसरी फ़िल्म आयी थी उन दिनों में, उसकी रिकॉर्डिंग भी है वो सब।

“न डरौं अरि सों जब जाइ लड़ौं निश्चय कर अपनी जीत करौं।”

'अरि' माने दुश्मन, रिपु। जब संघर्ष का क्षण आये, जब ये हो जाए कि अब साहब जान रह भी सकती है, जा भी सकती, भरोसा कुछ नहीं, तो मेरा निश्चय अडिग रहे। ये श्री दशम् ग्रन्थ साहिब से है — 'चंडी दी वार'। सुन्दर है!

अरु सिख हों आपने ही मन कौ इह लालच हउ गुन तउ उचरों।

मेरा मन शिष्य बन जाए, मेरा मन ये सीख जाए। यही लालच करे ― कामना के लिए कह रहे हैं, मन में कामनाएँ तो होती हैं — कह रहे हैं, मेरे मन में यही रहे, “लालच हउ गुन तउ उचरों।” ‘तउ’ माने आपके, तव। मम्-तव वैसे। आपके ही गुणों को वो याद करे। माने अपने अहंकार को, अपनी सत्ता को मैं बहुत स्मरण में न रखूँ, मैं आपको स्मरण में रखूँ ― शक्ति, देवी, सच्चाई — मैं आपको याद रखूँ। कब? जब रणक्षेत्र में उतरूँ। और रणक्षेत्र तो उनका पूरा जीवन ही था, हम सबका ही पूरा जीवन है।

जब आव की अउध निदान बनै अति ही रन मै तब जूझ मरों।

और जब जाने की अवधि, जो क्षण आये तो मैं रण में ही ― इससे अच्छा अन्त मेरी जीवन यात्रा का नहीं हो सकता कि रणक्षेत्र में ही मैं आख़िरी साँस ले लूँ, जूझते हुए ही। ये हैं गुरु गोविन्द साहब। शक्ति, बल, सच्चाई, जो आज हम सबको चाहिए, राष्ट्र को भी चाहिए, विश्व को भी चाहिए। क्योंकि आज के समय सुविधाएँ ही इतनी बढ़ गयी हैं कि जूझ पड़ना बड़ी महँगी बात हो गयी है।

लगता है, ‘सब ठीक ही तो चल रहा है, क्या करना है! और करे तो कोई और करे, हम काहे को जूझ मरें!’ सबकुछ तो अच्छा चल रहा है, भोग की सारी वस्तुएँ उपलब्ध हैं। और ऐसा लगता है कि अधिकार आदि भी मिले हुए हैं सामाजिक, राजनैतिक तल पर। तो क्या आवश्यकता है घोर संघर्ष की। आज ज़्यादा आवश्यकता है।

बीस वर्ष की आयु में ये शबद कहा गया था, अब बताओ क्या करना है? क्या आयु? बीस वर्ष! बीस वर्ष की उम्र में वो कह रहे हैं कि जूझ मरूँ। “देह शिवा बर मोहि इहै”, मैं जूझ मरूँ। और नहीं मैं कुछ माँग रहा, जीवन नहीं माँग रहा, सही मृत्यु माँग रहा हूँ।

सात वर्ष की आयु में ही भाषाएँ सीख ली थीं, गुरुमुखी भी सीख ली थी और आदि ग्रन्थ पढ़ने लगे थे। कहते हैं, याद ही कर लिया था। ब्रज, फ़ारसी, संस्कृत में निपुणता हासिल कर ली थी और ज़रूरत नहीं कहने की कि शस्त्रकला भी, और ये सब बिलकुल कम उम्र में ही हासिल कर ली थी। क्योंकि पिता कौन थे?

श्रोता: गुरु तेग बहादुर साहब।

आचार्य: अब सबको नहीं मिलेंगे गुरु तेग बहादुर जैसे पिता। पर नहीं भी मिले हों तो हमारे पास सन्तों के, गुरुओं के वचन तो हैं न? हम उनको पिता समान मान सकते हैं, हम उनसे सीख सकते हैं।

तो औरंगज़ेब ने कहा, ‘इस्लाम क़ुबूल लो।’ जवाब क्या दिया था? ‘शीश कटे तो कटे, केश नहीं कटेंगे।’ केश धर्म का प्रतीक है न! पाँच 'ककार' दिये थे, उसमें केश भी है। बात केश की नहीं है, बात धर्म की है। 'शीश कट सकता है, केश नहीं कटेंगे। जान दे देंगे, धर्म नहीं छोड़ेंगे।’

और धार्मिकता यहीं पर आकर के परखी और पहचानी जाती है कि जान देने को तैयार हो धर्म के लिए कि नहीं। और धर्म माने यही नहीं कि मेरी जो मान्यताएँ हैं और मैंने जो अपनी पारम्परिक पहचान बना ली, उसको धर्म नहीं बोलते। सत्य मात्र के लिए जीने और मरने को धर्म बोलते हैं, उसके अलावा धर्म कुछ नहीं होता।

कोई नाम पकड़ लिया, इसको धर्म नहीं बोलते कि मैं फ़लानी परम्परा से हूँ, समुदाय से हूँ, सम्प्रदाय से हूँ तो मैं इस धर्म का हो गया। वो नहीं धर्म होता, वो तो ऐसे ही है।

तो छोटी उम्र में ही उन्होंने गुरुगद्दी को सम्भाला था। क्यों सम्भाला था?

श्रोता: उनके पिता की मृत्यु हो गयी थी।

आचार्य: और कैसे हुई थी मृत्यु?

श्रोता: धर्म की रक्षा में।

आचार्य: हाँ, तो बहुत छोटी उम्र में वो देख रहे हैं कि ऐसे ऊँचे ऐसे विद्वान पिता और वो शहीद हो गये धर्म के लिए। और कहानियाँ हैं जिनका सार ये है कि देख रहे थे कि आम आदमी कितना कमज़ोर है और संघर्ष से, विद्रोह से उठ खड़े होने से कितना घबराता है। तो बोले, ‘इन पर कैसे ज्ञान फलित होगा, इन पर कैसे आदिग्रन्थ सफल होगा, जब इनके भीतर इतना डर भरा हुआ है।’

जो डरा हुआ है वो सच को समझना तो छोड़ दो, सुनेगा भी कैसे? बोले, ‘इनके लिए तो अभी ज़रूरी ये है कि अभी इन्हें ललकारना सिखाया जाए, खड़े होना सिखाया जाए।’ कितनी सुन्दर बात है, ‘तुम शस्त्र से लड़कर नहीं जीतोगे, तुम आत्मबल से लड़कर जीतोगे।’

शस्त्र बाद में आता है, पहले भीतर का बल आता है। और भीतर का बल, क्या आपको कहते हैं उपनिषद्, कहाँ से आता है? आत्मा से आता है। आत्मा ही बल है। और जिसके पास बल नहीं है तो “नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः।” बोले, ‘आत्मा ही तुम्हें जीवन संघर्ष में विजयी बनाएगी।’

इन शब्दों में गुरु साहब का कथन नहीं है, पर बात वही है, पीछे जाकर अगर समझोगे तो। शस्त्र बाद में आता है आत्मबल पहले आता है। आत्मबल है तो वो शस्त्र भी काम आएगा।

खालसा पन्थ के पहले पाँच लोग कौन थे अभी उल्लेख हमने किया ही — जो सिर कटाने को तैयार, सो खालसा, पाँच लोग। यही परीक्षा ली थी — ‘सिर कटेगा!’

‘ठीक है, कोई बात नहीं। जाओ! तुम भी कटाकर आओ।’

जीवन काल, कितने वर्ष जिये? इकतालीस, बस। ये हमारा दुर्भाग्य रहा है कि बहुत सारे हमारे महापुरुष जो संघर्ष उन्होंने हमारे लिए लड़े, वो स्वयं उस संघर्ष में अपनी आहुति दे देते हैं।

दर्जनों से अधिक उन्होंने लड़ाइयाँ लड़ीं और सारी लड़ाइयाँ उन्होंने ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ मुगलों से लड़ीं। बहुत सारी तो, मैंने कहा, उन्हें संघर्ष उनसे करना पड़ा जिनको वो बचाना चाहते थे। चारों बेटे खोये, अपनी माता को खोया, अन्य सम्बन्धियों को खोया। और ये सब होने के बाद भी कई वृतान्त हैं, जहाँ वो कहते हैं कि मैं तुमको व्यर्थ ही लड़ना नहीं सिखा रहा हूँ, जब और कोई तरीक़ा न बचे, तब शस्त्र उठेगा। लेकिन ये नहीं होना चाहिए कि तुम कायर हो गये।

पंज प्यारों का नाम लिखिएगा आप सब लोग आज, कौन थे, कहाँ से थे। अभी हम ये सब तो बात भी नहीं कर रहे हैं कि जाति प्रथा को कैसे तोड़ा उन्होंने, अन्धविश्वास को कैसे चुनौती दी। जो आसपास के राजा लोग उनसे ख़फ़ा हुए थे उसमें एक कारण ये भी था कि देखो, इन्होंने तो जो तथाकथित निचली जातियाँ हैं, उनके लोगों को भी इकट्ठा कर दिया है और उनको व्यवस्थित, ऑर्गेनाइज़ कर दिया है और उनके हाथों में हथियार दे दिये हैं और वो लोग अब अन्याय और अधर्म के ख़िलाफ़ खड़े हो रहे हैं।

तो जो सामाजिक पक्ष है, जो समाज सुधार का पक्ष है गुरु गोविन्द सिंह जी का, उस पर भी विचार करिएगा। और अच्छा हुआ ये प्रश्न पूछ लिया।

प्र२: औरंगज़ेब को उन्होंने ज़फरनामा लिखा था, जिसमें उन्होंने ग़लतियाँ भी बतायी थीं, मोस्टली (अधिकांश) ग़लतियाँ ही बतायी थीं और कुछ औरंगज़ेब के एस्पेक्ट (पहलू) थे लाइफ़ के, जो ठीक थे कहीं-कहीं पर, तो उन्होंने वो पूरा एक मोटा सा पत्र जैसा लिखा था।

आचार्य: ये देखना पड़ेगा। देखो इसी को और डालो पूरा कम्यूनिटी पर।

प्र३: प्रणाम सर, मुझे याद आ रहा है कि गुरु गोविंद सिंह जी के बारे में मेरे स्कूल में मैंने ये भी पढ़ा था कि वे एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने अपने तीन पीढ़ी को इंस्पायर (प्रेरित) किया था देश के लिए शहीद होने के लिए। उनके पिताजी शायद मानसिक रूप से थोड़े चूक रहे थे जब शहादत के लिए तो उन्होंने उन्हें भी कुछ ऐसे शब्द कहे थे जिससे वो इंस्पायर हुए थे।

आचार्य: बहुत छोटे थे।

प्र४: सर, मेरा प्रश्न है कि उन पाँच ककारों का आज की समय में क्या सिग्निफ़िकेंस (महत्व) है?

आचार्य: देखो, उस समय बहुत था। उस समय में बहुत था। कारण समझो! उस समय की परिस्थितियों में प्रवेश करो थोड़ा। मुगल सल्तनत अपने पूरे रुआब पर थी। बाबर, हुमायूॅं, अकबर इन सबके बाद जो सबसे बड़ा साम्राज्य हो गया था, वो तो औरंगज़ेब का ही था। औरंगज़ेब के बाद फिर वो सिमटता चला गया, सत्रह-सौ-आठ में औरंगज़ेब की मृत्यु हुई और उसके बाद तो फिर सत्रह-सौ-सत्तावन में प्लासी ही हो गया था, वो तब तक बड़ा भारी, मोटा साम्राज्य हो गया था।

और उस समय ऐसे लोगों का खड़ा होना — हर तरह के शोषण, अत्याचार, सामाजिक अत्याचार भी था और धार्मिक अत्याचार भी था। सामाजिक ये था कि प्रजा का आर्थिक शोषण भी हो रहा है और प्रजा के जो साधारण हक़ होते हैं, उनको वो नहीं दिये जा रहे। धार्मिक ये था कि इस्लाम क़ुबूलो — उसके ख़िलाफ़ इन मुट्ठी भर लोगों का खड़े हो जाना बड़ी ज़बरदस्त बात थी। ऐसे में जो लोग पहले-पहल खड़े होते हैं न, उनके सामने कुछ सवाल होते हैं।

एक सवाल ये होता है कि जब कोई नहीं खड़ा हो रहा है इतनी भारी सल्तनत के ख़िलाफ़, तो हम ही क्यों खड़े हैं। हम ही क्यों खड़े हैं? हम अकेले हैं, इतने सारे तो हमारे विरोधी हैं, ये बड़ी-बड़ी सेनाएँ आती हैं और हम मुट्ठी भर लोग हैं। और दूसरा ये होता है कि अगर इतना ख़तरा है हमें, तो हम थोड़ा दबकर और डरकर और चुप ही होकर क्यों न रहें। उसका जो मनोवैज्ञानिक पक्ष है वो समझो। गुरु गोविन्द सिंह साहब ने कहा, ‘दहाड़ो! खुलकर सामने आओ।’

ये जो केश हैं, ये दहाड़ है, उद्घोषणा है। अब तुम छिप नहीं सकते। तुम छिप भी नहीं रहे हो और तुम अपने संख्या बल का अपने दुश्मनों को भारी एहसास भी करा रहे हो। क्योंकि जहाँ केश हैं, फिर वहाँ पर पगड़ी भी है, और तुम शान के साथ खड़े हो गये हो पगड़ी धारण करके।

तुम अकेले भी नहीं हो और हमने तुमको चुप भी नहीं रहने दिया है। देखो, कितने सारे हो गये हो। और आप ग़ौर करिएगा, चालीस-पचास लोग हों, उसमें पगड़ी वाले अगर तीन-चार भी हों तो आपकी नज़र पहले पगड़ियों पर जाएगी। कुछ तो उससे कद बढ़ जाता है, कुछ उसका अपना सौन्दर्य होता है, शान होती है। अलग दिखाई देते हैं, आप छुप नहीं सकते अब। और अपने होने की घोषणा करने का अब जो भी नतीजा आएगा, वो झेलो! झेलो, जो भी हो गया है। ये बड़ी बात है कि सिर पर रखकर चलो अपनी असली पहचान।

समझ में आ रही है बात?

यही चीज़ें आप फिर कड़े से भी जोड़ सकते हो, कंघा तो आप समझ ही रहे हो, अब केश है तो। कड़े से भी जोड़ सकते हो, कृपाण से भी जोड़ सकते हो। तो ऐसे करके — पर जो सबसे ज़्यादा महत्व है, वो पगड़ी का होता है, केशों का होता है। डिक्लियर, डिक्लियर विथ अ प्लॉम्प (दृढ़ता से घोषित किया गया), ये है भाव उसमें। क्योंकि बहुत एक छोटी सेना थी उनकी, समझो! ये तो मत पूछो कि मुगलों, औरंगज़ेब से कितनी छोटी थी। जो उधर पहाड़ के, हिमाचल वगैरह के जो राजा थे — आज का हिमाचल क्षेत्र है, तब हिमाचल नहीं बोलते थे — जो उधर के राजा थे न, उनसे भी छोटी थी सेना।

और कोई बहुत समृद्ध सेना उनकी नहीं थी। ऐसा थोड़े ही है कि जो समाज के सबसे उच्च शिक्षित लोग थे, वो उनके पास आ रहे थे, या जो समाज के सबसे दबंग लोग थे, या जो सबसे धनी लोग थे वो लोग उनके पास आ रहे थे। जब भी कोई नया धार्मिक केन्द्र शुरू होता है न, एक नयी धारा फूटती है, तो आरम्भ में उसमें जो दमित लोग होते हैं, जिनके साथ समाज ने अन्याय किया होता है, जिनके पास धन, शक्ति, सामर्थ्य नहीं होता, पहले वही लोग आते हैं।

गुरु साहब के पास भी पहले ज़्यादा वही लोग आये थे। तो अब ऐसे लोगों को लेना और उनको आत्मविश्वास दिलाना और उनको एक लड़ाका सेना, एक फ़ाइटिंग फ़ोर्स में तब्दील कर देना, इसके लिए ज़रूरी था कि उनको एक बड़ी गौरव भरी पहचान दी जाए। वो गौरव भरी पहचान दी गयी — रखो, ये है! हाथ दिखेगा तो कड़ा दिखेगा। हाथ कटे तो कटे, कड़ा नही उतरेगा। और सिर कटे तो कटे, पगड़ी नहीं उतरेगी। सबको बता दो, सबको जता दो। काँप जाएँ दुश्मन, खुली उद्घोषणा है। जो भीतर से हो, वो बाहर भी तो प्रकट हो और गरजकर प्रकट हो, ये बात थी।

आज भी वो ज़रूरी है भाई। मैं उसको बहुत हल्के तरीक़े से आपसे पाँच-सात साल पहले से कैसे बोल रहा हूँ? “पाओ और गाओ।” जो हो, उसको छुपाकर रखोगे तो जो मिला है, वो गँवा दोगे। जो मिल रहा है, अगर उसको एक राज़ की तरह गुप्त रखोगे, तो फिर वो गुप्त ही हो जाएगा, लुप्त हो जाएगा।

जो पाया है, उसको जीना शुरू करो। ज्ञान दहाड़ता है, शर्म से छुपा नहीं रहता कहीं पर कि छुपे हैं। ज्ञान बहुत है, पर छुप-छुपकर हम जी रहे हैं और बोलेंगे नहीं, अपनी पहचान सामने नहीं लाएँगे, एनॉनिमस (अज्ञात) रहेंगे एनॉनिमस।

कम्यूनिटी (समुदाय) पर भी तो बहुत लोग न अपना नाम लिखते हैं, न अपनी तस्वीरें लगाते हैं। अब समझ में आ रहा है क्यों आवश्यक था कहना शिष्यों को — सिख माने शिष्य — क्यों आवश्यक था सिखों को कहना कि तुम सामने आओ? तुम कहीं भी रहो पता चलना चाहिए कि तुम शिष्य हो। तुम कहीं भी हो पता चलना चाहिए कि शिष्य हो। क्योंकि जैसे आप तो क्या करते हो? सामने नहीं आएँगे।

आदमी तो वही है और आदमी का मनोविज्ञान भी पूरा वही है। शताब्दियाँ बीतती रहती हैं, हम थोड़े ही बदलते हैं। किसी को अपनी बात पूछनी होती है तो बोलता है, ‘ये मेरे एक दोस्त का प्रश्न है।’ तो अपने दोस्त को ही ले आते, दोस्त क्यों नहीं आ रहा सामने, हमने तो कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाया?

कोई अपने नाम से पूछ लेता है तो फिर बाद में कहता है कि वो मेरा मुँह छुपा देना, वीडियो में नहीं आना चाहिए मुँह। हम डरते हैं।

हम अपने पापों पर कम लज्जित होते हैं, हम सबसे ज़्यादा लज्जित अपनी सच्चाई पर होते हैं।

जो पाप हमने कर रखे होते हैं उनको तो हम फिर भी खुलेआम दर्शाते फिरते हैं, ‘लो, ये मेरा पाप, ये मेरा पाप।’ लेकिन कहीं धोखे से, भूले-भटके सच आ जाए आपकी ज़िन्दगी में, तो आपको इतनी शर्म आती है कि पूछो मत।

प्र५: सर, अभी आपने बोला, ‘ज्ञान दहाड़ता है।’ लेकिन सत्र में एक पॉइंट आया था — “अधजल गगरी छलकत जाए।” तो हम तो अभी ज़ीरो पर हैं।

आचार्य: छलको मत, पर कम-से-कम शर्म के मारे चुप भी मत हो जाओ। और अधजल गगरी, तो तुम्हारी गगरी भरेगी कब? ज्ञान कभी पूर्ण तो होता नहीं। ये तो अपनेआप को बड़ी सुविधा दे दी कि जब भी कभी संघर्ष का क्षण आये तो कह दो, ‘मैं तो अधजल हूँ।’ मालूम है न जब फ़ौज के लिए भर्ती होती है तो बहुत सारे यही बोलकर बच जाते हैं कि मैं तो बीमार हूँ, मेरी सेहत अभी आधी है, माने मैं अधजल हूँ।

तो अपनेआप को आधा-अधूरा कहना, कमज़ोर कहना या बीमार कहना बड़े काम की, बड़े उपयोग की, बड़े स्वार्थ की बात होती है; मज़ा आ जाता है बिलकुल।

‘भाई, जो हट्टे-कट्टे हों और जो स्वस्थ हों, वो जाकर के संघर्ष करें, मैं तो अधजल हूँ। मैं तो अस्वस्थ हूँ, मैं अभी पूरा नहीं हुआ हूँ। तो मैं थोड़े ही संघर्ष करूँगा, मैं तो बीमार हूँ। मैं तो अभी पूरा नहीं हुआ, मैं तो अभी पका नहीं, मैं तो अभी पका नहीं। जाओ माली, फूलों को तोड़ो, मैं तो अभी कली हूँ। मुझे मत तोड़ना, मैं तो अभी कली हूँ।’

अरे! सत्तर साल की कली, झूठ बोलती रही, इसीलिए तो नहीं खिली। और जो खिल जाते हैं उनका क्या? ‘पुष्प की अभिलाषा’ है कविता, बड़ी सुन्दर है। खिला हुआ पुष्प कहता है, “मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर देना फेंक, मातृभूमि पर शीश चढ़ाने, जिस पथ जाते वीर अनेक।” और जो खिल जाते हैं वो तो प्रार्थना करके कहते हैं, ‘हमें तोड़ो।’ और जो नहीं खिले होते, वो कहते हैं, ‘अभी तो मेरा समय नहीं आया, अभी मेरा ज्ञान पूरा नहीं हुआ, अभी मेरा स्वास्थ्य पूरा नहीं हुआ, अभी मेरा बल पूरा नहीं हुआ, अभी मुझे और समय दो न!’

तो लिये रहो समय। क्या करोगे ऐसी कली का जो फूल कभी बनी नहीं, बस झड़ गयी? फूल भी वही कली बन पाती है जो टूटने को तैयार होती है। जो टूटने को तैयार नहीं हो, वो कली फूल कभी नहीं बनेगी। जानते हो, भाषा में भी यही बोलते हैं — कली का चटकना। कहते हैं कि अगर बहुत शान्ति हो, निस्तब्धता हो, तो कलियों के चटकने की आवाज़ भी सुनाई देती है। कली जब चटकती है, तभी फूल बनती है। आप चटकने को राज़ी ही नहीं हो रहे कि हाय! हाय! दर्द होता है, बहाने और बनाते हो, तो फूल कैसे बनोगे? फूलने से फूल नहीं बनते।

प्र६: प्रणाम आचार्य जी, सामान्यतः लोग गुरुनानक देव और गुरु गोविंद सिंह के व्यक्तित्व में और उनके कर्मों में बहुत अन्तर महसूस करते हैं। और ऐसा ही अन्तर हमें गौतम बुद्ध और श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व और कर्मों में महसूस होता है, लेकिन जब मूल में जाते हैं तो एक ही स्त्रोत दिखाई देता है। पर हम आज के समय पर, अभी निर्धारित कैसे करें कि ऐसा जीवन आदर्शवादी जीवन है। ऐसा जीवन धर्मसम्मत जीवन है?

आचार्य: देखिए, इसकी हमने आज बात करी है न। वही तत्व है, मन में जब वो रहता है तो कभी आप ज्ञानमार्गी कहलाते हो, कभी प्रेममार्गी कहलाते हो, निर्भर करता है कि कैसे आपने अभिव्यक्त किया है। लेकिन वही तत्व जब जगत से आपके सम्बन्धों में दिखाई देता है, तो उसमें संघर्ष तो होगा ही। ठीक वैसे जैसे आप भीतर अपने अज्ञान के विरुद्ध संघर्ष करते हो न, तो आप ज्ञानमार्गी हो। भीतर आप अपनी ढिठाई और अपनी अकड़ के विरुद्ध संघर्ष करते हो न, तो आप प्रेममार्गी हो। वैसे ही बाहर भी सच्चाई का मतलब संघर्ष ही होता है। इसमें लोगों को ताज्जुब कहाँ पर आ जाता है, मुझे ये ताज्जुब है!

जो भीतर योद्धा है, वो बाहर युद्ध क्यों नहीं करेगा भाई? ज्ञानी होने का अर्थ ही होता है — भीतर का योद्धा होना। और जो भीतर का योद्धा है, जब ज़रूरत पड़ेगी, सामाजिक माहौल इस तरह का होगा, विषम, तो बाहर भी युद्ध करेगा न, या ज्ञान लेकर के बस बैठे रहोगे? बाहर कुछ भी चलता रहे कोई प्रतिसाद नहीं होगा, फिर सम्यक कर्म का क्या अर्थ है?

फिर हम क्यों बोलते हैं कि गीता के अध्याय दो से अध्याय तीन फलित होता है? फिर हम क्यों कहते हैं कि ज्ञानयोग जहाँ होगा, वहाँ कर्मयोग को होना पड़ेगा? ज्ञानयोग पहले आया, कर्मयोग बाद में आया। वैसे ही आप फिर सम्बन्ध देखते हो गुरु नानक देव में और गुरु गोविंद सिंह जी में। जहाँ ज्ञान होगा, जहाँ भीतरी सच्चाई होगी, वहाँ बाहरी संघर्ष आएगा-ही-आएगा।

भीतर के अन्धेरे से लड़ोगे और बाहर के अन्धेरे से नहीं लड़ोगे, ऐसा कैसे करोगे? और ऐसा अगर करोगे तो फिर तुम पाखंडी हो न। अभी हमने बात करी तो। कोई कहे कि मैं तो बस भीतर-भीतर जूझता हूँ और बाहर घुटने टेकता हूँ, ऐसे आदमी को क्या कहोगे? ये सच्चा आदमी हुआ क्या?

प्र७: तो आचार्य जी, ये कहना सही होगा कि गुरुनानक देव जी का जो आध्यात्मिक विरोध था संसार में भी, वो पाखंड को एक तरह से तोड़ना, ध्वस्त करना — जैसे उनकी कथाएँ थी कि हरिद्वार में वो जाकर वेस्ट की तरफ़ पानी फेंक रहे हैं?

आचार्य: वो सारी ही कथाएँ देखो संघर्ष की ही तो हैं न। चाहे वो गंगा से सम्बन्धित हों, चाहे काबा से सम्बन्धित हों, वो कर क्या रहे हैं? संघर्ष ही तो कर रहे हैं न। बस वो उस समय पर हमें सशस्त्र संघर्ष के रूप में नहीं दिख रहा है। लेकिन फिर सामाजिक परिस्थितियाँ बदलती हैं, पहले दस गुरु के बीच में गंगा में काफ़ी पानी बहा; परिस्थितियाँ बदली हैं भाई।

औरंगज़ेब से पहले के जितने मुगल थे, वो उतने कट्टर नहीं थे, चीज़ें बदलीं। तो उन बदली हुई परिस्थितियों में फिर सत्य संघर्ष के रूप में सामने आता है — “देह शिवा बर मोहे इहे।”

प्र८: जो पाँच ककार बोलते हैं, ये मुगल की वजह से आया, गुरुनानक साहब ने नहीं दिये थे?

आचार्य: समय-समय पर समयानुसार अभिव्यक्ति दी जाती है। जो चीज़ एक समय पर ज़रूरी होती है, वो दूसरे समय पर ज़रूरी नहीं होती है। सत्य के दो पहलू होते हैं — एक होता है काल निरपेक्ष, एक काल सापेक्ष। जो काल निरपेक्ष है उसी को अकाल बोलते हैं। ठीक है? और एक होता है कि कालानुसार अकाल अपनेआप को अभिव्यक्त करता है। जो अकाल है, वो काल के अनुसार अपनेआप को अभिव्यक्त भी करता है।

तो कुछ बातें ऐसी होती हैं जो सब समय पर लागू होंगी, वो बातें कालातीत हैं, अकाल हैं वो बातें। समय बदलता रहे, वो बातें हमेशा सच रहेंगी। लेकिन जो कर्म करे जाते हैं वो कालानुसार करे जाते हैं, वो काल सापेक्ष कर्म होते हैं।

Have you benefited from Acharya Prashant's teachings?
Only through your contribution will this mission move forward.
Donate to spread the light
View All Articles
AP Sign
Namaste 🙏🏼
How can we help?
Help