किसी भी धार्मिक त्योहार पर पशु को, जीव को क्षति पहुँचाना धर्म के बिल्कुल विरुद्ध है और देवी के महोत्सव पर तो ऐसा करना महोत्सव के प्राण खींच लेने जैसी बात है। देवी माने वो जो उनका संहार करती हैं जो प्रकृति के साथ हिंसा करते हैं और हम देवी के ही दिनों में प्रकृति के साथ हिंसा करते हैं। त्योहार आता इसलिए है कि आप वैसे न रहो जैसे आप रहते हो, कुछ ऊँचे उठ पाओ, लेकिन त्योहार के दिन तो हम अपनी रही-सही तमीज़ भी गायब कर देते हैं।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। आजकल नवरात्रों के दिन चल रहे हैं और देवी की पूजा हर दिन की जा रही है। अभी रिसेंटली मैंने पश्चिम बंगाल की खबर में ये पढ़ा कि वहाँ पर सेलिब्रेशन के लिए जो वहाँ के कैदी हैं उनके खाने में कुछ बदलाव किया गया है और चिकन-बिरयानी और मटन-बिरयानी को सर्व किया जा रहा है। तो मैं ये चीज़ समझ नहीं पा रही हूँ कि ये निर्दोष जानवरों की हत्या में क्या संबंध है। हम सेलिब्रेट कैसे कर सकते हैं जानवरों की हत्या करना।
आचार्य प्रशांत: हम हमेशा एक ही चीज़ सेलिब्रेट करते हैं व्यावहारिक तौर पर, आदर्श वगैरह छोड़ो, जो ज़मीनी सच्चाई है वो ये है कि हम जैसे हैं हम अपने वैसे ही होने को बड़ी भारी, बड़ी अच्छी, बड़ी सुंदर चीज़ मानकर सेलिब्रेट करते रहते हैं। त्योहार आता इसलिए है कि आप वैसे न रहो कम-से-कम कुछ दिन जैसे आप रहते हो, कुछ बेहतर हो जाओ, कुछ ऊँचे उठ पाओ। पर हम बड़े धुरंधर लोग हैं, हमारे लिए त्योहार का मतलब होता है मैं जैसा हूँ वैसा रहे-रहे ही मौज मार लूँगा, बल्कि मैं जैसा हूँ क्योंकि अब मौज मारने का लाइसेंस मिल गया है तो अपने ही और गिरे हुए चेहरों को अभिव्यक्त कर दूँगा।
कोई मैंने जटिल बात नहीं बोल दी। मतलब ये है कि साधारण दिनों में तो फिर भी हो सकता है कि हम थोड़े तमीज़ के लोग होते हों लेकिन जब त्योहार के दिन आ जाते हैं तो हम अपनी रही-सही तमीज़ भी गायब कर देते हैं। हमें अनुमति मिल गई है धार्मिक; हमारे अनुसार हमें धार्मिक अनुमति मिल गई है, मौज मारने की।




