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स्त्री नर्क का द्वार है? आचार्य प्रशांत, वेदांत पर (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मेरा प्रश्न है कि ‘प्रश्नोत्तरी श्री आदि शंकराचार्य रचित’ में बताया गया है कि स्त्री नरक का प्रधान द्वार है। नारी-रूपी पिशाचिनी से बचकर जो रह गया वह समझदार है। प्राणियों के लिए साँकल नारी ही है। तो मेरा प्रश्न ये है कि ये कितना सच है?

आचार्य प्रशांत: बिलकुल सच है। दोहराइए, क्या पढ़ा आपने।

प्र: ‘प्रश्नोत्तरी श्री आदि शंकराचार्य रचित’ में बताया गया है कि स्त्री नरक का प्रधान द्वार है। नारी-रूपी पिशाचिनी से जो बच कर रह गया, वह समझदार है और प्राणियों के लिए साँकल नारी ही है। ये सब बातें कितनी सच हैं?

आचार्य: एकदम ठीक बातें हैं। समझना पड़ेगा क्या कहा गया है।

देखो, पहले तल पर जो बात है वो समझो कि सत्य नहीं बोला जाता। इस श्लोक में या किसी भी श्लोक में सत्य नहीं बोला गया है। उपचार बोला जाता है, समाधान बोला जाता है। और जो समाधान बोला जाता है वो किसी व्यक्ति-विशेष की समस्या के संदर्भ में बोला जाता है।

तो पहले तुम्हें पूछना होगा कि ये जो बात है, ये कही किससे गई है। आचार्य शंकर किनसे बात कर रहे थे जब कह रहे हैं ‘नारी नर्क का द्वार है, तुम्हारा संकट यही है – नारी।‘ किससे बात कर रहे थे?

आचार्य शंकर की कितनी उम्र में मृत्यु हो गई थी? कितनी उम्र में? आप जानते हैं?

(श्रोताओं से पूछते हुए)

हाँ, लगभग बत्तीस के थे। भेद है पर ये मान लो, तीस मान लो, बत्तीस मान लो। तो उनके शिष्य किस उम्र के रहे होंगे जो उनके साथ-साथ चलते थे? किस उम्र के रहे होंगे? अब बात कुछ खुल रही है? किससे बोली गई है ये बात?

और ये जो २८-२८ साल वाले होते हैं, इनके मन की, शरीर की क्या गति होती है उस समय? उनसे बोली गई है। कल्पना करो न, अचार्य बैठकर कुछ बता रहे हैं और शिष्यों का मन नारी में लगा हुआ है। और वो तो देशभर में भ्रमण करते थे, दक्षिण से उत्तर तक आए, पूर्व में भी गए। अब भ्रमण कर रहे हैं तो सब तरह की जनता से संपर्क होता होगा, सामने पड़ते होंगे। और काम बहुत लंबा है, दूर तक जाना है, जल्दी में हैं। और काम होना इन शिष्यों के ही माध्यम से है। और ये सब क्या कर रहे हैं? ये वही कर रहे हैं जो इनसे इनकी उम्र करवा रही है। किसी गाँव से गुज़रे, वहाँ लड़कियाँ दिखती हैं, वो वहाँ बैठ गए जाकर के। आचार्य ढूँढ रहे हैं, ‘गए कहाँ?’

नहीं, ये ऐसा क्या बस मेरे ही साथ होता है? उनके साथ भी हुआ होगा कि ढूँढ रहे हैं कि ‘कहाँ है वो? वहाँ बैठा हुआ है।‘

(श्रोतगण हँसते हैं)

तो बड़ी कड़वी घुट्टी पिलानी पड़ती है, सीधे कह देना पड़ता है, 'नारी नर्क का द्वार है', उसके लिए जो नारी को वासना की दृष्टि से देखता हो।

नारी नर्क का द्वार है उसके लिए जो नारी को वासना की दृष्टि से देखे। नहीं तो जैसे कोई भी व्यक्ति है, वैसे ही एक महिला भी है।

फिर तुम महिला को देखो और तुम्हें व्यक्ति दिखाई ही ना दे, तुम्हें चेतना उसकी दिखाई ही ना दे, तुम्हें बस उसका शरीर दिखाई दे और शरीर में भी विशेषकर तुम्हें बस उसके जननांग दिखाई दें तो नर्क और क्या होता है? कि तुमने एक चेतना को बस माँस बना डाला, इसी को तो नर्क कहते हैं। और नर्क उस व्यक्ति में नहीं है जिसे नारी कहते हैं, नर्क तुम्हारी दृष्टि में है। नर्क तुम्हारी दृष्टि में है जो तुम्हें अपने ही जैसी चेतना नहीं दिखाई देती। तुम्हें बस हाड़-माँस दिखाई देता है, ये है नर्क।

द्वार तो दिख रहा है क्योंकि उन्होंने कह दिया, ‘नारी नर्क का द्वार है।‘ लेकिन उस द्वार में प्रवेश कौन कर रहा है ये भी तो पूछ लो। अगर नारी द्वार है तो नारी स्वयं तो प्रवेश कर नहीं रही होगी, वो तो द्वार बन गई। नारी तो द्वार बनकर खड़ी हो गई है, अब ख़ुद तो घुसेगी नहीं नर्क में। तो फिर नर्क में घुस कौन रहे हैं सब? ये नर घुस रहे हैं। तो ये सब नर जो नर्क में घुसने को बड़े आतुर हैं, इनको संबोधित करके कहा गया है कि – पागलों, वो नर्क का द्वार है जहाँ प्रवेश के लिए मरे जा रहे हो। हर तरीके से अपना नुकसान कर रहे हो।

पहली बात, दुनिया की आधी आबादी महिलाओं की है। तुमने दुनिया की आधी आबादी से काट लिया अपने-आप को। अब उनसे ना तुम्हारी मित्रता हो सकती है, ना कोई सवस्थ सम्बन्ध हो सकता है, क्योंकि तुम्हें उनकी चेतना अब दिखाई ही नहीं देती, तुम्हें बस शरीर दिखाई देता है। शरीर से क्या सम्बन्ध बनेगा? शरीर से तो यही सम्बन्ध बनेगा, नोचने-खसोटने का। क्या तुम उनसे बैठकर वैचारिक तल पर कोई बात कर पाओगे? क्या तुम उनसे मित्रता का या बुद्धिमत्ता का कोई सम्बन्ध बना पाओगे? कोई सम्बन्ध नहीं बनेगा। जब भी उनकी ओर देखोगे, उनको भी जानवर बनाना चाहोगे और ख़ुद भी जानवर बनोगे। नर्क और क्या होता है? तो ये पहले तल की बात हुई।

अब इससे आगे की बात समझो। ये समझनी थोड़ी मुश्किल पड़ सकती है, ध्यान से सुनना। नारी, नारी के लिए भी नर्क का द्वार है। नारी माने क्या? आचार्य जहाँ से बोल रहे हैं, वहाँ पर नारी का अर्थ होता है प्रकृति। नारी का अर्थ होता है प्रकृति। आप अपने-आप को महिला कहती हैं न? आपकी चेतना पुरुष है, आपका शरीर नारी का है। नर है चेतना, नारी है शरीर। और चेतना सभी की नर होती है। महिला की चेतना भी नर है और पुरुष की चेतना भी नर है।

समझ में आ रही है बात?

और शरीर सभी का स्त्री का ही होता है। पुरुष का शरीर भी स्त्री का ही शरीर है। शरीर को ही स्त्री कहते हैं और चेतना को पुरुष कहते हैं। इसमें अटक तो नहीं रहे? पुरुष किसी व्यक्ति को नहीं कहते कि किसी लिंग विशेष को पुरुष कह दिया गया, ये अध्यात्म की भाषा नहीं है। अध्यात्म की भाषा और जनसामान्य की भाषा में अंतर है। यहाँ जितने लोग बैठे हैं वो नर भी हो सकते हैं, नारी भी। मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि यहाँ पाँच नारियाँ बैठी हैं, दो नर बैठे हैं। आप कुछ भी हो सकते हैं। आप इस वक़्त, कुछ लोग नर हैं, कुछ लोग नारी हैं।

जो चैतन्य हो करके उपस्थित हैं, वो सब नर हैं, भले ही लिंग से नारी हों। जो चैतन्य होकर यहाँ उपस्थित हैं, वो सब पुरुष हैं, भले ही देह से, शरीर से नारी हों। और जो भी लोग यहाँ बैठे हुए हैं, देहभाव में स्थापित, वो सब स्त्री हैं। भले वो देह से, लिंग से पुरुष हों। ये अध्यात्म की परिभाषा है। अध्यात्म आपका जो जन्मगत लिंग है उसको बहुत महत्त्व देता ही नहीं है। आपके कहे घर में लड़का हुआ है, अध्यात्म ऐसे नहीं देखता। ये आपका जीवन बताएगा कि लड़का हुआ है या लड़की हुई है। और पैदा तो सिर्फ़ लड़कियाँ होती हैं, लड़का बनना पड़ता है। जो लड़की पैदा हुई है वो भी लड़की है और जो लड़का पैदा हुआ है वो भी लड़की है, क्योंकि अभी उसमें चेतना तो है ही नहीं न। जब चेतना नहीं है तो तुम पुरुष कैसे हो गए? ये सांख्ययोग से आती है परिभाषा, पुरुष की और प्रकृति की।

पुरुष कौन है? ये 'पुर' है।

(अपने सिर के चारों ओर हाथ घुमाते हुए अर्थात् शरीर को दर्शाते हुए)

'पुर' माने क्या होता है? एक नगर, शहर, ये पुर है। शरीर को कहते हैं 'पुर'। ये (शरीर की ओर संकेत) 'पुर' है और उस 'पुर' के भीतर जो बैठा हुआ है, उसको कहते हैं 'पुरुष'। तो आप महिला भी हैं तो ये क्या है? ये 'पुर' है और भीतर जो चेतना बैठी है उसे कहते हैं 'पुरुष'।

लेकिन हम ले लेते हैं बिलकुल देह केंद्रित परिभाषा। हम कहते हैं – जिसका लिंग पुरुष का है, वह पुरुष हो गया। जैसा शौचालयों में होता है न। तो हमारी शौचालय वाली परिभाषा है कि जिसका लिंग पुरुष का है जी इधर आ जाइए, जिसका लिंग स्त्री का है वो इधर आ जाइए। अध्यात्म में शौचालय वाली परिभाषा नहीं चलती। वहाँ थोड़ी ऊँची बात है।

तो जब कहा जा रहा है नारी नर्क का द्वार है इसका अर्थ क्या हुआ? इसका अर्थ हुआ कि अगर देह-केंद्रित होकर जिओगे तो ये जीवन ही नर्क है।

पुरुष को तो अपनी देह से बचना ही है, स्त्री को और ज़्यादा बचाना है अपनी देह से। पुरुष को तो अपनी देह से बचना ही है, स्त्री को और ज़्यादा बचना है अपनी देह से क्योंकि देह नर्क का द्वार है। जब कहा जा रहा है, 'नारी नर्क का द्वार है' उसको ऐसे पढ़ना है – देह नर्क का द्वार है। पुरुष की भी देह नर्क का द्वार है और स्त्री की भी देह नर्क का द्वार है।

जितना ज़्यादा आपके मन में आपकी देह घूम रही है, उतना ज़्यादा आपके मन में दूसरों की देह भी घूमेगी। ये सीधा-सा नियम है। आप अगर अपनी देह पर खूब समय लगाते हैं, सजते हैं, सँवरते हैं, ये करते हैं, वो करते हैं, तो उतना ही ज़्यादा आपका ध्यान दूसरों के जिस्म पर भी है।

हालाँकि, इसका विपरीत सत्य नहीं होता। आप कहें कि कोई अपनी देह पर ध्यान नहीं देता तो क्या यह निश्चित है कि वो दूसरों की देह पर भी ध्यान नहीं देता? नहीं, ऐसा भी कोई नियम नहीं है। लेकिन ये पक्का है कि अगर आप देह-केंद्रित जीवन जी रहे हैं अपने लिए, तो दूसरे भी आपके लिए देह मात्र हैं, सिर्फ़ देह हैं।

देह नर्क का द्वार है, तुमने अपने लिए चेतना के दरवाज़े बंद कर लिये; देह भर हो तुम। जैसे कोई जानवर होता है वो देह भर होता है।

आपके लिए मैं यहाँ बैठा हूँ, आपके लिए मैं कुछ होऊँगा। अभी यहाँ पर एक भेड़िया आ जाए, एक बाघ आ जाए, जो स्वयं सिर्फ़ देह बनकर जीता है। उसके लिए मैं क्या हूँ? देह हूँ। आपको क्या मिल जाएगा आप मेरा माँस खा लें तो? कत्ल कर दीजिए, माँस पकाकर खा जाइए, क्या मिल जाएगा? कुछ नहीं मिला न? अवसर ख़राब कर दिया न? इसलिए देह नर्क का द्वार है।

क्या-क्या संभव था उस व्यक्ति से और तुमने उससे कुल लिया क्या? सिर्फ़ देह ली। किसी भी व्यक्ति में अनंत संभावना होती है आत्मिक ऊँचाई की, और तुमने उससे लिया क्या? सिर्फ़ देह ली। और नर्क किसको कहते हैं? स्वर्ग की सारी संभावना से हाथ धो बैठे। और नर्क किसको कहते हैं?

तो ये एक बड़ा मुद्दा रहा है और बार-बार कहा गया है कि जो पुरानी बातें हैं उनमें मीसोजीनी (स्री जाति से द्वेष) है, स्त्री विरोधी हैं इत्यादि-इत्यादि। धर्म को ही, संपूर्ण धर्म को ही कह दिया गया है कि वो स्त्री विरोधी है। ये वही कह सकते हैं जो मनुष्यों को स्त्री और पुरुष में देखते हों। और आप किसी को देखें और आपको पहला ख्याल यही आए कि ये स्त्री है या पुरुष, तो सबसे पहले तो समस्या आपके खोपड़े में है।

आप व्यक्ति को देख रहे हैं, आपको व्यक्ति नहीं दिखाई दे रहा, आपको वो लिंग दिखाई दे रहा है। अगर मैं कहूँ कि धर्म स्त्री-विरोधी है, तो इसमें मैंने चेतना की तो बात कहीं करी ही नहीं।

मैं कह रहा हूँ, दो तरह के लोग होते हैं, दो वर्ग होते हैं और इस तरह की बातों में अक्सर वर्ग-संघर्ष ये शब्द खूब आता है, वर्ग-संघर्ष। तो अब ये भी दो वर्ग हैं, एक वर्ग स्त्रियों का, एक पुरुषों का। और जो धर्म है, वो स्त्रियों का शोषण कर रहा है, वो पुरुषों की हिमाक़त, वकालत कर रहा है।

समझ रहे हैं?

अध्यात्म ऐसे नहीं देखता कि नर है या नारी है। अध्यात्म को आपकी देह से नहीं सम्बन्ध है, आपकी उम्र से नहीं सम्बन्ध है। अध्यात्म को किससे सम्बन्ध है? उससे जो चीज़ वाकई महत्वपूर्ण है आपके लिए – चेतना आपकी।

चेतना दोनों में है और शरीर दोनों का अलग-अलग है। और चूँकि शरीर दोनों का अलग-अलग है इसीलिए दोनों की चेतना के सामने चुनौतियाँ भी थोड़ी अलग-अलग हैं, क्योंकि शरीर भी थोड़ा ही अलग-अलग है।

स्त्री के सामने एक तरह की चुनौतियाँ होती हैं, पुरुष के सामने दूसरी तरह की चुनौतियाँ होती हैं। लेकिन कुल मिलाकर के दोनों की चुनौती यही है कि देह के पार जाना है – स्त्री को स्त्री की देह के, पुरुष को पुरुष की देह के।

स्त्रियों के लिए चुनौती थोड़ी ज़्यादा बड़ी तब हो जाती है जब ये समाज उनको समझा देता है कि तुम्हारी देह तुम्हारा बंधन नहीं है, तुम्हारी संपत्ति है। ये देह तुम्हारा बंधन नहीं है, ये देह तुम्हारा ऐसेट (संपत्ति) है, तुम्हारा हथियार है। आपकी देह ना आपका हथियार है, ना आपकी संपत्ति है, ना आपकी पहचान है।

जब मैंने कहा, समाज ने ऐसा समझा दिया है महिलाओं को, तो समाज से मेरा आशय है पुरुष-प्रधान समाज। एक कामुक पुरुष का तो स्वार्थ इसी में होगा न जो कि वो महिला को बोल दे कि तुम सजो-सँवरों, ताकि तुम हमारे सामने अधिक-से-अधिक कामोत्तेजक रूप में आ सको। आपको दिख नहीं रहा है आपके मन के साथ खिलवाड़ किया गया है?

एक कामुक पुरुष का, जो आपको अपनी वासना का शिकार बनाए रखना चाहता है, उसका स्वार्थ तो इसी में होगा न कि स्त्रियों को शिक्षा ही यह दी जाए कि ‘तुम्हारी जगह तो घर में ही है’? ‘घर में बंद रहो, ताकि हम जब भी घर वापस आएँ तो आसानी से तुम्हारा शिकार कर सकें।‘ कि ‘बल सारा हमारे पास रहे और तुमको हम घोषित कर दें कि ये तो गृहस्वामिनी है।‘ गृहस्वामिनी कैसे हो गई? घर तुम्हारा है, वो स्वामिनी कैसे हो गई भाई? पैसा तुम्हारा है, वो स्वामिनी कैसे हो गई भाई? क्यों झूठ-मूठ फरेब करते हो उसके साथ? सिर्फ़ इसलिए कि तुम्हें उसका शिकार करना है रोज़।

समझ में आ रही है बात?

शरीर आपकी पूंजी नहीं है, शरीर आपकी नियती नहीं है। शरीर को ना तो संपत्ति मानना है, ना हथियार। और ये खूब हुआ है। अतीत में ऐसा था कि आपसे कहा गया था, 'शरीर आपकी संपत्ति है, जिसको आपको सहेज कर रखना है।'

‘तुम्हारा शरीर ऐसी चीज़ है जिसको बचाकर रखो। ये एक विशेष संपत्ति है जिसपर एक व्यक्ति विशेष का ही अधिकार होगा’, ऐसी धारणा चलती थी। और अब दूसरी धारणा है, आधुनिक, कि ‘तुम्हारा शरीर तुम्हारा हथियार है जिससे तुम्हें शिकार करना है’, क्योंकि भई ज़माना फेमिनिज़म का है न? ‘पुरुष ने आज तक शिकार किया है, अब हम भी शिकार करेंगी, हम स्त्रियाँ भी शिकार करेंगी।‘ कैसे शिकार करेंगी? (व्यंग करते हुए) ये जिस्म थोड़े ही है, ये हथियार है। इसका इस्तेमाल करके हम भी शिकार करेंगे। और शिकार हो भी जाता है। क्योंकि कामुक पुरुष कमज़ोर हो जाता है। जो भी कामना में है, वो कमजोर हो जाएगा, उसका शिकार आसानी से हो जाएगा।

स्त्रियों को ये बात पता है कि ये सामने जो खड़ा हुआ है, ये बहुत कमज़ोर है। इसकी तो टाँगें काँप रही हैं। ज़रा-सा हथियार का इस्तेमाल करना है, ये अभी गिर जाएगा। लोटने लगेगा ज़मीन में, कुत्ते की तरह जीभ निकालकर। और पुरुष को कुत्ता बनाना बहुत आसान है, लेकिन उसको कुत्ता बना कर आपको क्या मिल जाएगा? वो तो है ही कुत्ता। आपको क्या मिल गया?

तो संपत्ति की तरह तो नहीं ही, हथियार की तरह भी जिस्म का इस्तेमाल मत करिए। व्यर्थ की चीज़ है, उसको वेपोनाइज (हथियार बनाकर के) करके आपको कुछ नहीं मिलने वाला। अगर वो आपका वेपन (हथियार) बन गया तो उसके पार कैसे जाएँगे? क्योंकि वेपन भी तो बड़ी कीमती चीज़ होता है न? अस्त्र को कैसे छोड़ दोगे? अपनी बंदूक को कोई छोड़ सकता है? नहीं छोड़ पाओगे।

आ रही है बात समझ में?

पुराने बंधन जितने बुरे थे स्त्रियों के लिए, आधुनिक उन्मुक्तता कहीं ज़्यादा बुरी है उससे। और ये बड़ा अजीब हुआ है। आसमान से गिरे, खजूर में अटके। पहले ये था कि बंधन-ही-बंधन थे, वो समस्या थी। अब एक झूठी आज़ादी है, वो समस्या है।

अब मेरे देखे ये झूठी आज़ादी बिलकुल बराबर की समस्या है। जैसे बंधन समस्या थे, ये आज़ादी और बड़ी समस्या है। क्योंकि, कारण बता देता हूँ, क्योंकि ये आज़ादी, जो झूठी आज़ादी है, वो आपको ये भ्रम दे रही है कि आप आज़ाद हैं।

आज की बहुत सारी महिलाओं को ये लग गया है, 'हम आजाद हैं'। जबकि वो आज़ाद हैं नहीं। वो बराबर अभी भी बंधन में हैं। पहले कम-से-कम बंधन में थीं तो उन्हें पता था कि बंधन है, अब लगता है आज़ादी है। ये आज़ादी और गहरा बंधन है। आपको ना तो पुराने ढर्रों पर चलना है, ना इस कोरे, झूठे, उदारवाद पर।

अध्यात्म बिलकुल अलग चीज़ है। आत्मज्ञान बिलकुल अलग चीज़ है। ना वो कन्ज़र्वेटिव (अपरिवर्तनवादी) है, ना लिबरल (उदारवादी) है। वो कुछ और ही है।

तो गंदे आदमी नहीं थे आचार्य शंकर, कि छी-छी, थू-थू कर दिया, ‘देखो कैसी गन्दी बात बोली हम महिलाओं के लिए।‘

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