प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कृपया मन और बुद्धि के सम्बन्ध पर प्रकाश डालने की कृपा करें। क्या बुद्धि मन को सही विकल्प चुनने हेतु दी गई है?
आचार्य प्रशांत: मन है अहम् की गति। अहम् एक तड़प है, वो शांत नहीं बैठ सकती। उसे नाचना है, और उसका ये नृत्य कोई सुंदर कलात्मक नृत्य नहीं है, उसका यह नृत्य विरह का, तड़प का नृत्य होता है।
मन क्या है?
कि जैसे कोई व्यक्ति दस तेज़ रोशनियों के नीचे नाचता हो, तड़पकर इधर-उधर भागता हो, और तुम उसकी छायाओं को देखो। गति तो है उसमें, पर सार्थकता कुछ नहीं। वो हर समय चलनशील तो दिखाई देगा, पर पहुँचता वो कहीं नहीं है। उसको बस एक बात पता है कि वो जहाँ भी है और जैसा भी है, ठीक नहीं है। कहाँ होना है उसे, इसकी उसको कोई सूचना नहीं है। हाँ, एक बात पक्की है, जहाँ है, वहाँ संतुष्ट नहीं है; नतीजा – निरंतर गतिशीलता।
जहाँ भी है, उसे वहीं से हटना है। किधर को हटना है? किधर को भी हटना है। संयोगवश जो कुछ भी प्रतीत हो जाए, जो कुछ भी सामने आ जाए, जो भी राह दिखाई दे जाए, जो भी संयोग या मौक़ा उपलब्ध हो जाए, उधर को ही गति करने लग जाओ। कोई तीर-तुक्का नहीं, कोई आयोजन नहीं, कोई संरचना, कोई योजना नहीं, बस गति करनी है, एक छटपटाती हुई विक्षिप्त गति - ये मन है।
बुद्धि क्या है?
बुद्धि है उस गति को सार्थकता दे देना, प्रयोजन दे देना, उद्देश्य दे देना। बुद्धि है मन की गति को एक सार्थक मंज़िल दे देना। चल तो रहे ही हो, चलो उधर को चलते हैं। अगर रुक सकते तुम, तो अब तक रुक गए होते। अभी भी अगर रुक सकते हो, तो जहाँ हो, वहीं रुक जाओ। पर ऐसे तो तुम हो नहीं कि जहाँ हो, वहीं रुक सको। तुम तो चलोगे, क्योंकि चंचलता तुम्हारा नाम है, क्योंकि चलनशीलता तुम्हारी प्रकृति है। तुम्हें तो निरंतर कम्पन करना-ही-करना है। तो ऐसा करते हैं कि किसी ऐसी दिशा चलते हैं जहाँ अंततः तुम्हारा ये हिलना-डुलना, कम्पन करना शांत हो सके। ये बुद्धि है।




