आत्मा को जानना है? || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश में (2022)

आत्मा को आत्मा के द्वारा ही जाना जा सकता है।
~ विवेक चूड़ामणि, आदि शंकराचार्य
प्रश्नकर्ता: मेरा प्रश्न तो कम है, मेरी जिज्ञासा है। अभी सुबह जब मैं गया था तपोवन घाट पर, तो विवेक चूड़ामणि पढ़ रहा था उस समय। उसमे ये दिया हुआ है स्पष्ट तरीक़े से कि 'आत्मा को केवल आत्मा के द्वारा ही जाना जा सकता है।' तो इसका आशय क्या है? किसलिए है ये?
और उसमें ये भी स्पष्ट लिखा है कि वेदों के अध्ययन के द्वारा भी हम आत्मा को नहीं जान सकते। और स्वयं के द्वारा भी नहीं जान सकते। हम शरीर के द्वारा भी नहीं जान सकते, इन्द्रियों के द्वारा भी नहीं जान सकते। उसमें स्पष्ट ये लिखा है कि 'आत्मा के द्वारा ही आत्मा को जाना जा सकता है।' तो इसका आशय क्या है?
आचार्य प्रशांत: इसका आशय यह है कि आत्मा की बात करना छोड़ दो। क्योंकि तुम तो आत्मा हो नहीं। आत्मा को छोड़ दो, माया को जानो। आत्मा को तो आत्मा ही जान पाएगी। जो जिस तल का होता है, उसी तल पर जो कुछ है उसको जान सकता है।
एक इमारत की पाँचवीं मंज़िल पर हो तुम, सातवीं मंज़िल पर क्या चल रहा है, जान सकते हो क्या? लेकिन मैं तुमसे पूछूँ कि 'तुम्हारे तल पर क्या चल रहा है?' ये तुम मुझे बता दोगे। तुम कहोगे, 'फलाने कमरे में प्रिंटर रखा हुआ है, वहाँ प्रिंटआउट निकल रहे हैं। एक कमरे में कोई किसी से फ़ोन पर बात कर रहा है। कहीं कोई मीटिंग हो रही है।' ये तुम मुझे बता दोगे; है न? मैं पूछूँ, 'बताओ सातवें तल पर क्या हो रहा है', बता पाओगे?









