अपरोक्ष ज्ञान - जीवनमुक्ति का आधार || तत्वबोध पर (2019)

यथा देहोऽहं पुरुषोऽहं ब्राह्मणोऽहं शूद्रोऽहमस्मीति दृढनिश्चयस्तथा नाहं ब्राह्मण: न शूद्र: न पुरुष:। किन्तु असंगः सच्चिदानन्दस्वरूप प्रकाशरूपः सर्वान्तर्यामी चिदाकाशरूपोऽस्मीति दृढनिश्चयरूपः अपरोक्षज्ञानवान् जीवन्मुक्तः॥
जिस तरह हम देह हैं, हम पुरुष हैं, हम ब्राह्मण हैं, हम शूद्र हैं, इस प्रकार का दृढ़ निश्चय होता है, वैसा ही दृढ़ निश्चय हम ब्राह्मण नहीं हैं, शूद्र नहीं हैं, पुरुष नहीं है, अपितु हम असंग, सच्चिदानंदस्वरूप, प्रकाशरूप, सर्व अंतर्यामी, चिदाकाशरूप हैं, इस प्रकार के दृढ़ निश्चयरुप अपरोक्ष ज्ञान से युक्त होता है, वह जीवनमुक्त है।
—तत्वबोध, श्लोक ३६.१
प्रश्नकर्ता: तत्वबोध में आदि शंकराचार्य जी अपरोक्ष ज्ञान की बात को जीवनमुक्त होने का आधार बता रहे हैं। कृपया इस दृढ़ निश्चय और अपरोक्ष ज्ञान के बारे में समझाएँ।
आचार्य प्रशांत: धारणाएँ तो मन रखता ही है। एक धारणा है कि, "मैं अमुक आयु का हूँ, अमुक लिंग का हूँ, अमुक वर्ण का हूँ", उसको अगर हटाना है तो कोई दूसरी धारणा चाहिए। साधारणतया दूसरी धारणा पहली धारणा की ही श्रेणी की, पहली धारणा के ही आयाम की, पहली धारणा जैसी ही होती है। वह पहली धारणा से भिन्न हो सकती है, विपरीत हो सकती है, परंतु होती साधारण धारणा के तल पर ही है।
तो इसीलिए इतना कहना काफ़ी नहीं होगा कि, "मैं किसी वर्ण का नहीं हूँ, ना ब्राह्मण हूँ, ना शूद्र हूँ, मैं किसी आयु का नहीं हूँ, मैं किसी लिंग का नहीं हूँ, मैं किसी कोटि का नहीं हूँ।" नकार की भाषा भर से काम नहीं चलेगा; मन को कुछ पकड़ने के लिए सार्थक विधायक चाहिए। पर हमने कहा कि मन को कुछ विधायक देने में ख़तरे भी होते हैं। ख़तरे ये होते हैं कि पकड़ने की आदत थी, पकड़ी हुई वस्तु छूट गई, पकड़ने को दूसरी वस्तु मिल गई; वस्तु तो छूटी, आदत नहीं छूटी, पकड़ने की आदत ज्यों-की-त्यों विद्यमान रही।



