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अपरोक्षानुभूति से विपरीत जीवन || (2018)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: अपरोक्षानुभूति में बताया गया है कि मैं सब गुणों, सब क्रियाओं के पार हूँ, मैं अमर और मुक्त हूँ। तो फिर जीवन में किए गए कार्यों के लिए मैं ज़िम्मेदार कैसे हुआ?

आचार्य प्रशांत: अपरोक्षानुभूति कह रही है कि “जीव अमर है और मुक्त है, जीव अकर्ता है, जीव अभोक्ता है”, तो अपरोक्षानुभूति को कोई कर्मफल भोगने भी नहीं पड़ते। अपरोक्षानुभूति को समझ में आया है, आदिशंकर को समझ में आया, कि तुम्हारी सत्यता यही है कि तुम अमर हो और मुक्त हो, तो आदिशंकर मुक्त हो गए कर्मफल से, जन्म-मरण के चक्र से। तुम अपनी बात करो न! क्यों ज़रूरत पड़ती है किसी आदिशंकर को तुम्हें समझाने की कि तुम अमर हो और मुक्त हो? तुमने तो कह दिया कि ग्रंथ कहता है (कि) मैं अमर हूँ और मुक्त हूँ। ग्रंथ क्यों कहता है तुमसे कि तुम अमर हो और मुक्त हो? और एक नहीं, हज़ार ग्रंथ बार-बार, बार-बार तुम्हारे सामने दोहराते हैं कि “याद करो! समझो! तुम अमर हो और मुक्त हो!” क्यों समझाते हैं? क्योंकि अपनी दृष्टि में न तुम अमर हो, न तुम मुक्त हो।

तुम्हें कोई परमात्मा द्वारा प्रदत्त थोड़े ही फल मिल रहे हैं! तुमने तो अपने-आप को जैसा माना है, उस मानने के फल मिल रहे हैं। उपनिषद् कहते हैं कि “जो बंधन के अभिमानी हैं वो बंधन भरा जीवन जीते हैं, और जो मुक्ति के अभिमानी हैं, उनका जीवन मुक्त रहता है।” तुमने माना क्या अपने-आप को? अपरोक्षानुभूति ग्रन्थ हो, आदिशंकर हों, कृष्ण हों, तमाम ऋषि हों, संत हों, गुरु हों; उन्होंने तो यत्नपूर्वक तुम्हें खूब समझाया है, कि “तुम अजर, अमर, मुक्त, निर्भय, उज्ज्वल आत्म-मात्र हो”, पर तुमने माना है क्या? उन्होंने समझाया, तुमने माना क्या?

तुम पूछ रहे हो, “जीवन में किए गए कार्यों के लिए मैं ज़िम्मेदार कैसे हुआ?” क्योंकि जो भी काम तुमने किया, वो तुमने अपने-आप को अमर और मुक्त जान कर थोड़े ही किया! शंकर तुम्हें जो समझा रहे हैं, अगर ये तुमने मान लिया होता, और मानने से तुम्हारे कर्म उद्भूत हुए होते, तो तुम्हें उन कर्मों की कोई ज़िम्मेदारी नहीं उठानी पड़ती, फल वहन नहीं करना पड़ता; आगे की चिंता, आशा नहीं भोगनी पड़ती। पर तुमने तो जो किया, अपने-आप को मर्त्य और बंध्य मान कर ही किया। अपनी दृष्टि में तो तुम अमर नहीं, मुक्त नहीं; मर्त्य भी हो और बंध्य भी हो। देखो न कैसे काम करते हो! कहते यही हो, कि “मैं अमर हूँ, ग्रंथ ने समझा दिया,” और बीवी-बच्चों से बोलते हो, “ये पैसा मेरे बाद तुम्हारे काम आएगा, ये इंश्योरेंस (बीमा) तुम्हें सहारा देगा” और यहाँ लिख रहे हो कि “आदिशंकर तो बता गए हैं मैं अमर हूँ।” तुमने कब जीवन ऐसा जिया जिसमें अमरता की खुशबू हो, मौत का खौफ़ न हो? और जब काम सारे मिटने के डर से प्रेरित हो कर करोगे, तो फिर उन कामों का अंजाम तो भोगना पड़ेगा न! काम कर ही इसीलिए रहे हो कि डरते हो – “मिट न जाऊँ! टूट न जाऊँ! क्षुद्र न हो जाऊँ! खंडित न हो जाऊँ!” इत्यादि। इसलिए तुम्हें अपने किए गए कामों की ज़िम्मेदारी लेनी पड़ती है।

जिसने अपने-आप को कुछ भी जाना, उसे अब कर्तापन ग्रहण करना पड़ेगा; क्योंकि तुम अपने-आप को जो भी जान रहे हो, उससे संतुष्ट तो हो नहीं, तो फिर तुम कर्ता बनते हो। कर्ता काहे को बनते हो? ताकि जो गड़बड़ है, उसको ठीक कर सको; कर्ता बनने का और कोई कारण ही नहीं होता। जो अमर है, उसके पास अब कोई गड़बड़ तो शेष नहीं; वो क्या हो गया? वो अमर हो गया, पूर्ण हो गया, उच्चतम अभिलाषा पूरी हो गई। जो मुक्त है, उसके पास भी कोई खोट नहीं बची, कोई इच्छा नहीं बची, जो चाहा जा सकता था, उसमें स्थापित हो गए, मुक्ति ही मिल गई; तो अब उन्हें कर्ता बनना ही नहीं पड़ेगा, कर्ता बन कर करना क्या है! कर्ता तो वो बने जिसे कहीं पहुँचना हो, कहीं मरम्मत करनी हो, कहीं तोड़-फोड़ करनी हो, कुछ बदलना हो, कुछ रचना हो। जिसकी उलझन ही हल हो गई, जो मंज़िल पर पहुँच ही गया, वो काहे को अब कर्ता बन कर दौड़ लगाएगा?

तो जो अपूर्णता में जीता है, उसे कर्ता बनना पड़ेगा; कर्ता क्यों बनना पड़ेगा?

प्र: अपूर्णता दूर करने के लिए।

आचार्य: अपूर्णता दूर करने के लिए। कहीं कोई दाग लगा है, उस दाग को मिटाना है। कहीं कोई गड्ढा है, उस गड्ढे को भरना है। घर की एक मंज़िल अभी अधूरी है, उसको?

प्र: बनाना है।

आचार्य: तो आप कर्ता बने – “अब मैं करूँगा न भाई! मुझे ही तो अनुभव हो रही हैं ये सारी तकलीफ़ें, तो दूर कौन करेगा? मैं ही तो करूँगा।”

जिसे ही अस्तित्वगत तकलीफ़ें अनुभव हो रही हैं, उसे कर्ता बनना पड़ेगा। अब जो कर्ता बना, वो बन ही इसीलिए रहा है कि कुछ करे; और जो तुम करना चाहते हो वो सदा समय-सापेक्ष होता है, वो सदा समय लेता है, है न? तो तुम गड्ढा भरना चाहते हो, गड्ढा भरने में क्या लगेगा?

प्र: समय।

आचार्य: समय लगेगा।

तो कर्ता तुम बन गए, कि “गड्ढा भरना है!” अब गड्ढा भरने की प्रक्रिया समय लेगी, और तुम उम्मीद कर रहे हो कि जो प्रक्रिया शुरू हुई है वो कभी पूरी होगी; जब पूरी होगी तब तुम उसकी पूर्णता का अनुभव करना चाहते हो, रस लेना चाहते हो, इसीलिए तो कर्ता बने हो!

कर्ता तुम क्यों बने हो? कि शुरू में क्या है? गड़बड़ है, कुछ खोट है; और जब गड़बड़ है और खोट है तो तुम फिर कर्म का एक अभियान शुरू करोगे उस खोट को मिटाने के लिए, और फिर जब वो अभियान पूरा हो तो तुम चाहते हो कि तुम ‘देखो’ कि तुमने खोट मिटा दी। तुम किसी ऐसे अभियान पर तो चलोगे नहीं न, जिसको मंज़िल तक ना ले जा पाओ! तो जो कर्ता है, उसकी मजबूरी हो जाएगी कि उसे भोक्ता भी बनना पड़ेगा; वास्तव में भोगने के लिए ही तो कर रहा है। गड्ढा ख़राब लग रहा है, उसको भर रहे हो, इसीलिए तो कि एक दिन देखो कि गड्ढा भर गया। इसीलिए फिर शास्त्र समझाते हैं कि जो कर्ता है वो भोक्ता भी है। तुम कुछ भी भोग नहीं सकते अगर तुम उसके कर्ता नहीं थे। और अगर आज तुम कर्तृत्व ग्रहण कर रहे हो, तो याद रखना, भोग भी तुम्हें ग्रहण करना पड़ेगा। और कर्तृत्व वही ग्रहण करता है जिसको कहीं कुछ अपूर्णता, खोट, गड़बड़ दिखाई देती है। तो तुम्हें खोट दिखाई दी नहीं कि तुमने अपने लिए भविष्य का बंधन तैयार कर लिया; खोट है तो कर्ता है, कर्ता है तो काम है, काम है तो समय है, समय है तो भविष्य है, और भविष्य में फिर आगे बैठा हुआ है भोक्ता।

बात आ रही है समझ में?

अब दिखने में ये सारी बात सीधी है, कि “हाँ, ठीक है! गड़बड़ दिखी, काम किया, गड़बड़ मिटी, और फिर जब सब ठीक हो गया तो हमने उसका रसास्वादन लिया।” ऐसा होता नहीं भाई! पूछो “क्यों?” क्योंकि तुम्हें जो खोट दिख रही है, वो खोट वास्तव में है नहीं, तुमने ग़ौर से देखा ही नहीं और खोट के झाँसे में आ गए। जब खोट वास्तव में नहीं है तो तुम्हारा सारा कर्म जो है वो व्यर्थ जाना है। तुम ऐसा गड्ढा भर रहे हो जो है नहीं, तुमने जो सारी मेहनत करी वो क्या गई? व्यर्थ गई – पहली बात। पहली बात – मेहनत व्यर्थ गई, दूसरी बात – गड्ढा तो पहले से ही भरा हुआ था, पर फिर भी तुम्हें क्या लग रहा था? “खाली है।” तुम्हारी मेहनत के बाद भी गड्ढा तो भरा ही हुआ है, लेकिन यदि तुम्हें पहले ऐसा भ्रम हो रहा था कि गड्ढा खाली है, तो अभी-भी भ्रम ऐसा होगा कि गड्ढा मौजूद है। ल्यो, ये तो दो-चार तरफ़ से मार खायी! पहली बात तो गड्ढा था नहीं, उसको कल्पित किया। कल्पित किया तो क्या करी? मेहनत करी। मेहनत करी तो सोचा कि भरा हुआ गड्ढा पुनः भर गया, पर गड्ढा तो अभी-भी ठीक उतना ही भरा हुआ है जितना तुम्हारी मेहनत से पहले भरा हुआ था। और पहले तुम भरे हुए गड्ढे को गड्ढा समझ रहे थे, समतल स्थान को गड्ढा समझ रहे थे, तो अभी-भी तुम समतल स्थान को गड्ढा ही समझोगे। तो ये सारी मेहनत के बाद भी तुम भोगोगे क्या? वही अपूर्णता, जिस अपूर्णता से प्रेरित हो कर तुमने गड्ढा भरने की शुरुआत की थी।

ये तो बड़ी चोट पड़ी! पहली बात तो भ्रम हुआ, नाहक का दुःख लिया; माना कि जीवन में कुछ क्या है? खाली है, अपूर्ण है। फिर उस चीज़ को मिटाने के लिए मेहनत भी खूब लगाई, भविष्य खड़ा करा। और भविष्य में जब आगे पहुँचे और सोचा कि “अब इतनी मेहनत कर ली है भाई, अब ज़रा रस भोगेंगे”, तो रस भोगने की जगह क्या भोगा? वही दुःख जिस दुःख से प्रेरित हो कर शुरुआत करी थी, क्योंकि गड्ढा पहले से ज़्यादा तो नहीं भर गया न! समतल स्थान पहले से ज़्यादा तो नहीं समतल हो गया न! पूर्ण पहले से ज़्यादा तो पूर्ण नहीं हो सकता न! तुम्हें जब पहले पूर्ण में खोट दिख गई, तो अब तो खोट और ज़्यादा दिखेगी, क्योंकि अब तो तुम्हारे पास ये तर्क भी है कि “देखो, खोट थी ज़रूर, उसी को भरने के लिए तो मेहनत करी!” जो आँखें एक बार देख रही थीं पूर्ण में खोट, वो पूर्ण में खोट निकालते-निकालते तो अब और ज़्यादा खोट निकालने की अभ्यस्त हो गईं हैं, वो पुनः खोट निकालेंगी और पुनः तुम अपने-आप को अपूर्णता में ही जीता पाओगे। अब अगर ज़रा-सी सद्बुद्धि होगी तो चेत जाओगे, कहोगे, “ये तो काम ठीक नहीं हुआ! ये तो ज़बरदस्ती का झंझट!” और अगर सद्बुद्धि नहीं होगी, पौरुष ज़रा ज़्यादा होगा, तो फिर क्या करोगे? और मेहनत करोगे, कहोगे, “पहले जो किया, लगता है कि नाकाफ़ी था” ये नहीं मानोगे कि बेवकूफ़ी में किया, कहोगे, “किया तो ठीक, कम किया! तो आओ, अब ज़रा ज़्यादा मेहनत करें” अब पहले से दूनी मेहनत करोगे – “ज़ोर लगा कर हईशा!” और दूनी मेहनत के बाद फिर क्या पाओगे? “हैं! खोट तो क़ायम है!”

अहंकार तुम्हें तुम्हारे ऊपर शक़ करने देगा नहीं, क्योंकि भाई, तुम तो होशियार हो, तुम तो चतुर हो, खिलाड़ी हो! तुम ये कैसे स्वीकार कर लोगे कि तुम्हारी दृष्टि में ही पागलपन है? गड्ढा नहीं है, तुम्हारी आँख का धोखा है, ये कैसे स्वीकार कर लोगे? तुम कहोगे, “अरे यार! लगता है दुनिया दुश्मन बनी बैठी है, खतरे-झमेले हज़ार हैं। और मेहनत करनी पड़ेगी, एक दूकान और खड़ी करनी पड़ेगी, एक डिग्री और लेनी पड़ेगी; ज़रा और सामाजिक होना पड़ेगा, और पैसा जुगाड़ना पड़ेगा। जो कुछ भी कर रहे हैं, उसे और ज़्यादा करना पड़ेगा।” तो अब ये देख लो क्या हो रहा है! बेवकूफ़ी कर रहे हो और उसी को कह रहे हो कि अब और ज़्यादा करना पड़ेगा। ऐसे आम-आदमी जीता है, उसकी यात्रा एक बेवकूफ़ी से दूसरी बेवकूफ़ी तक होती है, और बेवकूफ़ी की श्रृंखला में हर कड़ी पिछली से ज़्यादा बेवकूफ़ होती है। बेवकूफ़ी की उसकी यात्रा एक उत्तरोत्तर ढलान की यात्रा है; पहली बात तो वो नीचे गिरता जाता है, और दूसरी बात, और ज़्यादा गति से नीचे गिरता जाता है। पाँच-सौ फीट से कोई पत्थर नीचे फेंका जाए तो उसके बारे में दो बातें हैं – समय बीतने के साथ वो और नीचे गिरेगा, और समय बीतने के साथ नीचे गिरने की उसकी गति भी और बढ़ेगी – ये संसारी आदमी की यात्रा है। इसका नतीजा ये होता है कि उसकी सबसे गर्हित स्थिति और नीचे गिरने की उसकी सर्वाधिक गति किस क्षण पर होगी? जब वो बिलकुल ज़मीन से टकराने ही वाला होगा। इसीलिए हमारे जीवन में भी सबसे हमारी गर्हित स्थिति हमारे बुढ़ापे में होती है; और मृत्यु के ठीक पहले तो हम बिलकुल ही पाताल-वासी हो जाते हैं, इतना गिर जाते हैं।

एक ग़लत जीवन जिया है, एक ऐसा जीवन जिया है जिसमें तुम लगातार भूल-पर-भूल करते गए हो, और हर भूल पिछली भूल से ज़्यादा बड़ी भूल है। तो नतीजा क्या निकलेगा? बात सीधी है – जब तुम मृत्यु के सामने खड़े होओगे तो तुम अपनी चेतना की निकृष्टतम अवस्था में होओगे; और उस कारण फिर तुम इस जीवन-खण्ड की सबसे बड़ी भूल करते हो। जानते हो कौन-सी सबसे बड़ी भूल है? तुम मान लेते हो तुम मर गए। चूँकि तथाकथित मरते हुए आदमी ने लगातार एक ग़लत जीवन जिया होता है, इसीलिए जब मृत्यु का क्षण आता है तो वो मान ही लेता है कि “मैं मरा!” वो तो जीवन-भर यही चिल्लाता रहा है, क्या? “अरे, मैं मरा! अरे, मैं मरा!” उसका जीवन ही भय पर आश्रित रहा है। इसीलिए फिर उसकी मृत्यु हो जाती है। मृत्यु से शुरुआत करोगे तो पहुँचोगे कहाँ तक? मृत्यु तक ही तो पहुँचोगे! शुरुआत ही तुमने इस भय से करी कि “न जाने कब मिट जाऊँ!” नतीजा ये होता है कि अंततः कोई ऐसी घटना घटती है कि तुम्हें पक्का यकीन आ जाता है कि तुम अब नहीं हो।

न बताएँ शंकर, तो तुम्हारा जीवन कभी गवाही देगा कि तुम अमर, अमिट, मुक्त हो? ये तो संयोग की बात है शंकर मिल गए, और उन्होंने कोई ऐसी बात बोल दी जो तुम्हारे शब्दकोश के ही बाहर की है। बताना थोड़ा, चुनौती दे रहा हूँ! जिनकी संगत में जीते हो, उसमें से कितने लोग तुम्हें बताने आते हैं कि “तुम अमर हो”? बोलो, जल्दी बताओ! आदिशंकर तो दुर्घटना हो गए हैं तुम्हारे साथ, उनको तो घटना नहीं था, ये तो दैवीय संयोग है कि राह चलते मिल गए तुमको। उनका तुमने चुनाव नहीं किया, उन्होंने तो तुम्हें पछिया कर पकड़ा है। तुम्हारा तो बस चलता तो छुड़ाए भग भी लेते, कि “कौन ये, सर घुटा कर के, डंडा ले कर के न जाने कैसे शब्दों में बात करता है! कभी बोलता है 'अपरोक्षानुभूति।' ‘अपरोक्ष’ क्यों बोल रहे हो भाई? ‘प्रत्यक्ष’ ही बोल दो। क्लिष्ट भाषा, ‘अपरोक्ष’। ‘प्रत्यक्ष’ काहे नहीं? 'विवेक-चूड़ामणि!' चूड़ामणि तो दूर की बात है, यहाँ विवेक ही नहीं है! एक ही चूड़ामणि हम जानते हैं – बीवी कंगन मँगाती है। यहाँ ‘विवेक चूड़ामणि!’ ये वाली चूड़ामणि ला कर किसी को दी और कहा – आपको उपहार में हम विवेक की चूड़ामणि दे रहे हैं, तो मारेगा और! कहेगा – असली चूड़ामणि ले कर आओ।” 'चूड़ामणि' समझते हो न? गहना।

ये तो तुमको यूँ ही मिल गए, तुम मुझे ये बताओ तुमने चुना किनको है अपने जीवन में? और अब तुम्हें खौफ़नाक बात बताता हूँ – तुमने न सिर्फ़ उनको चुना है जो तुम्हें दिन-रात ये बताते हैं कि तुम मृत्युधर्मा हो। जो तुमसे जितना ज़्यादा प्यार करते हैं, तथाकथित प्यार, वो तुम्हें उतना ज़्यादा बताते हैं कि तुम मरने ही वाले हो। जो आदमी तुम पर प्रेम का जितना दावा करता है, वो तुम्हें मृत्यु की उतनी याद दिलाता है; पूछो “क्यों?” क्योंकि तुम्हारा प्रेम शरीर का प्रेम है, और शरीर को तो नष्ट होना है, इसमें कोई शक़ नहीं। जिसको तुम अपना प्रेमी कहते हो, तुम्हारे शरीर से जुड़ा है, वो बार-बार आएगा – “तबीयत ठीक है तुम्हारी? लो ये खा लो! लो ये पी लो! दवाई ली तुमने? चलो अस्पताल चलो!” वो बार-बार तुमको क्या जता रहा है? “अमर हो तुम”, ये जता रहा है? “तुम मरोगे,” ये जताने में सबसे अग्रणी रहते हैं तुम्हारे प्रियजन, तुम्हारे दोस्त-यार। उन्हें सबसे ज़्यादा चिंता इसी की है, “तुम्हारे भीतर भूसा भरा हो, पर जिए जाओ”, ये उनका कथन है। तुम्हारे भीतर चाहे भूस भर जाए, पर शरीर चलता-फिरता रहे; तुम्हारी आत्मा पुष्पित हो, इससे उनका कोई लेना-देना नहीं। तुम्हारे जीवन में गुणवत्ता कितनी है, तुम्हारे दिल में सुकून कितना है, ये वो पूछने नहीं आएँगे। वो एक चीज़ ज़रूर पूछेंगे लेकिन – “तुम्हारी देह ठीक चल रही है?”

देखा है कभी, घर जाते हो, सबसे पहले, “बेटा! खाना मिलता है कि नहीं मिलता है?” पूछा करो, “मैं मुँह हूँ बस? दाँत हूँ? ज़बान हूँ? आँत हूँ? गुदा हूँ?” पर उनका इतने से ही आशय है बस, कि “खा लिया कि नहीं खा लिया?” इसी में – “खा लो; खा लो! नहा लो! कपड़े ठीक पहना करो! मुँह धोया है या नहीं धोया है?” अब ऐसे सवाल अगर मैं पूछने लगूँ तुमसे सत्र में, तो क्या होगा, बताओ? और तुम तो इन्हीं सवालों के बीच में जी रहे हो, ऐसी संगत कर रखी है तुमने। जिनके साथ जी रहे हो, उन्हें मतलब ही इन्हीं बातों से है – “नहाए कि नहीं नहाए? दाढ़ी क्यों बढ़ा रखी है?” माता जी मिलीं, मैंने पूछा, “बच्चा कैसा है?” बोलीं, “बहुत अच्छा है, आठ किलो का हो गया है।” मैंने कहा, “तुम किसकी बात कर रही हो? आम की, तरबूज की, कूड़े की, ईंट की, डंबल की?” पर उन्हें बस इस बात से मतलब है – “आठ किलो का हो गया, और डॉक्टर कहता है कि इस उमर में आठ किलो बहुत स्वस्थ वज़न है!” – शरीर ठीक चलना चाहिए।

ये जो तुमको दिन-रात मृत्यु का एहसास करा रहे हैं, इनके होते हुए तुम कभी अपने-आप को अमर मानने वाले हो? और मैं दोष उनको भी नहीं देता, ये मुर्गी और अंडे वाली कहानी है। चूँकि तुम अपने-आप को देह मानते थे, इसीलिए तुमने लोग भी ऐसे ही इकट्ठा किए अपने चारों ओर। तुम अपने-आप को देह ना मानते होते, तो तुम ऐसे लोग इकट्ठा क्यों करते जो तुमसे देह का ही नाता रखते हैं? और चूँकि तुमने ऐसे लोग इकट्ठा कर लिए हैं, तो वो तुम्हें और ज़्यादा जताते हैं कि तुम देह हो। अब कौन पहले आया? मुर्गी? अंडा? हमें नहीं पता! हमें ये पता है कि तुम फँस चुके हो।

अब एक तरफ़ बेचारे शंकराचार्य हैं; एक, और वो तुमसे शालीनता से, चुप-चाप, लिखित में कह रहे हैं कि “तुम अमर हो! अनंत हो! असीम हो! अखंड हो! अविनाशी!” और दूसरी ओर सारा ज़माना है; ये तो पहली बात। दूसरी बात – जनतंत्र में तुम्हारा विश्वास है; तुम गिनती गिनोगे, तुम गिनोगे कि ‘कितने लोग क्या कह रहे हैं?’ शंकराचार्य तो अकेले हैं। हद-से-हद अगर तुम उनका कुनबा बनाओगे भी, तो वो दो-चार, दस-पाँच, बीस, चालीस लोगों का निकलेगा। और विपक्ष में कितने खड़े हैं? अरे, करोड़ों! आज तक जितने जन्मे, मरे, सब विपक्ष में ही खड़े हैं। तो पहली बात तो ये बड़ा बेमेल संतुलन है, एक पलड़ा करोड़ों गुना ज़्यादा भारी है। और दूसरी बात, तुम अगर चुनने जा रहे हो शंकर में और संसार में, तो तुम पहले ही पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो। एक बात तो ये कि शंकरों की तादाद बहुत कम है, और दूसरी बात ये कि तुमने पहले ही मन बना रखा है कि तुम्हें किसकी सुननी है, तुम पहले ही पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो। तो बोलते रहें शंकर कुछ भी, तुम्हें तो पता ही है तुम्हें किसकी सुननी है।

एक छोटी-सी बात है – जिन्हें तुम अपना प्रियजन, स्वजन कहते हो, वो डूब रहे हों, और दूसरी ओर शंकर हों, तो किसको बचाने जाओगे? किसको?

प्र: प्रियजन।

आचार्य: तो इसी से स्पष्ट हो जाता है कि तुम कीमत किसको देते हो। तुमने तो पहले ही तय कर रखा है कि कौन ज़्यादा कीमती है। जब वही ज़्यादा कीमती हैं जो दिन-रात तुममें मौत का खौफ़ बैठा रहे हैं, तो अब तुम्हें ताज्जुब क्यों होता है कि तुम जो करते हो खौफ़ के अधीन हो कर करते हो?

एक बचपन में कहानी चलती थी। किसी वेद-पुराण की कहानी नहीं है, वो नैतिकता के उर्वर ठेकेदारों के मन की कहानी है, वहाँ से बड़ी कहानियाँ निकलती हैं। एक कहानी थी कि “बताओ! एक नाव में तुम्हारी माँ और बीवी दोनों बैठे हैं, और नाव में छेद हो गया। एक को ही बचा सकते हो, किसको बचाओगे?” छोटे लड़के बोलते थे, “मम्मी।” बड़े लड़के उलझन में पड़ जाते थे। अब उन्हें पता है वो बचाएँगे किसको, पर आस-पास देखते थे और वो भी बोलते थे, “मम्मी।” पर ऐसी कोई कहानी हमने पढ़ी नहीं, जिसमें चुनाव करना हो कि गुरु बैठा है और बाप बैठा है तो किसको बचाओगे। क्योंकि यहाँ पर तो मुकाबला शुरू होने ही नहीं पाएगा, शुरू होने से पहले ही निर्णय हो चुका है, तुम्हें पक्ष पता है किसका लेना है। तुम देख रहे हो, चुनाव भी करते हो तो कहाँ और कहाँ करते हो? तुम्हारे सामने जो प्रश्न प्रासंगिक हैं, वो क्या हैं? कि चुनना है तो या तो माँ को चुन लो, नहीं तो बीवी को चुन लो। जिन्होंने तुम्हें चुनने की सुविधा भी दी, उन्होंने चुनने में इससे ज़्यादा छूट नहीं दी है तुमको। उन्होंने कहा है, “बेटा, फँसना तो है ही! या तो इधर फँसो या उधर फँसो; या तो अम्मा, नहीं तो ‘नागम्मा’।” तीसरा उन्होंने कोई विकल्प छोड़ा नहीं है तुम्हारे पास, ऐसी तुम्हारी संगत है; ऐसी तुमने अपनी संगत खड़ी करी है।

लगातार, लगातार, लगातार तुम्हें यही जताया जा रहा है कि “देह-भर हो तुम! देह-भर हो तुम!” तुम्हारे भीतर भ्रम भरे रहें, किसी को कोई फ़र्क पड़ रहा है? पर तुम्हें एक-सौ-एक बुखार हो जाए, साधारण बुखार, शोर मच जाता है! घर फ़ोन करते हो, तुरंत उधर से पूछा जाता है कि “बेटा, तेरे मन में कोई भ्रम तो नहीं न, तेरी मनसा पर कोई दाग तो नहीं न”? ऐसा कभी हुआ? और ये ज़रूर पूछेंगे, “जो नमकीन भेजी थी वो ख़त्म हो गई क्या, और भिजवा दूँ?” चरो नमकीन! खेत उगाओ नमकीन का! इसीलिए पैदा हुए हो? शंकर जैसों को अपने साथ रखा होता तो आज ये प्रश्न पूछने की नौबत नहीं आती। और ये बड़े-से-बड़े खेद की बात है कि हमारे जो निकटतम रिश्ते होते हैं, हमने उनको ही अपना सबसे बड़ा बंधन और दुश्मन बना लिया है।

अभी स्थिति ये है कि जो तुम्हारे जितना क़रीब है, जब तुम मुक्ति की ओर चलोगे तो उतना ज़्यादा शोर मचाएगा। बोलो, हाँ या ना? मेरे पास यहाँ आ कर के बैठने में तुम्हें कौन बाधा बनता है, पड़ोसी या स्वजन? बोलो!

प्र: स्वजन।

आचार्य: तो ये देख लो कैसों को तुमने स्वजन कर लिया! अब ये सब-के-सब क्यों खिलाफ़ रहते हैं सत्य के और सत्संग के? ये सब-के-सब क्यों नहीं चाहते कि तुम यहाँ आओ? समझो बात को – क्योंकि ये डरे हुए हैं! इन्हें लगातार ये लग रहा है कि तुम इनसे कहीं छूट तो नहीं जाओगे! यही इनका तर्क है न? “मेरा बच्चा मुझसे छिन जाएगा! मेरी पत्नी, मेरा पति मुझसे छिन जाएगा!” जो चीज़ छिन सकती है, उसी को तो कहते हैं मृत्युधर्मा। छिनने का ही तो इन्हें खौफ़ है। जब ये जानते हैं कि तुम इनसे छिन सकते हो, तो फिर ये लगातार तुम्हें यही याद दिलाते हैं न कि तुम छीने जा सकते हो। अगर मैं छीन सकता हूँ तुम्हें इनसे, तो इन्हें ये भी अच्छे से पता है कि एक दिन मौत भी छीन ले जाएगी। तो फिर ये लगातार तुम्हें याद भी किसकी दिलाएँगे? मौत की।

“कुछ खाया? कोल्डक्रीम लगा लेना! कंघी ठीक से किया करो!”

तुम कुछ नहीं हो! सिर्फ़ इसलिए कि शास्त्र तुम्हें बता गए हैं कि “तुम ब्रह्म हो”, तुम ब्रह्म हो नहीं गए! तुम वही हो जो तुम अपने-आप को मानते हो, सब-कुछ तुम्हारी अभिमानना पर है। और तुम अपने-आप को ब्रह्म तो बिलकुल भी नहीं मानते। जो मानता होता अपने-आप को ब्रह्म, वो फिर शिकायत करे, कि “माल खोटा निकला! हमने अपने-आप को ब्रह्म माना, लेकिन उसके बाद भी कर्मफल का चक्कर नहीं छूटता, काम-क्रोध नहीं छूटते”, तो उसकी अर्ज़ी की ज़रा सुनवाई होती, कि “ये तो ब्रह्म में खोट निकल गई! लड़के ने ब्रह्म को पूरी तरह आज़माया, माल का उपयोग इंस्ट्रक्शन-मैन्युअल के अनुसार किया, लेकिन उसके बाद भी माल से अपेक्षित परिणाम नहीं निकले! ये तो अपने-आप को लगातार ब्रह्म मानता है, उसके बाद भी लेकिन खौफ़ में जीता है।” तो चलो, तुम्हारी याचिका को थोड़ी कीमत भी मिलती।

पर यहाँ तो तुमने माल को आज़माया ही नहीं, तुमने कब कहा कि “मैं हूँ ब्रह्म”? अब मैं ये नहीं कह रहा कि कब जिए ब्रह्म की तरह; जीना तो बहुत दूर की बात है, तुमने तो कभी कहा भी नहीं कि तुम ब्रह्म हो। अब तुम्हारी ये जो फ़रियाद है, ये बिलकुल ऐसी है, कि गाड़ी खड़ी हुई है, तुम उसमें कभी चढ़े ही नहीं, और शिकायत तुम्हारी ये है कि तुम बम्बई तो पहुँचे नहीं, दिल्ली में ही खड़े रह गए, और कह रहे हो, “ये गाड़ी व्यर्थ है, इसने हमें पहुँचाया नहीं।” मैं तुमसे पूछ रहा हूँ, “तुम उस पर चढ़े कब कि तुम्हें पहुँचा दे?” हाँ, ब्रह्म का ही दूसरा नाम है निर्भयता; जो ब्रह्मरूढ़ होगा, जो ब्रह्मलीन होगा, वो निर्भय हो जाएगा। पर तुम हो क्या ब्रह्मलीन? तुम हो आत्मस्थ? तुम होते तो फिर ऐसा सवाल आता? अपने जीवन को देखो ग़ौर से, और जो कुछ भी तुममें भूत-भाव, देह-भाव, समय-भाव भरता हो, उसको दिए जाने वाले मूल्य को घटाओ। जितना ज़्यादा तुम उसको मूल्य दोगे, जितना ज़्यादा तुम उसके अभिमानी बनोगे, उससे एका रखोगे, तादात्म्य रखोगे, जो नष्ट ही हो जाने वाला है, उतना ज़्यादा तुम भय में जियोगे, ये बात तो बहुत सीधी है न! हाँ? बोलो!

दो आदमी जा रहे हैं, दोनों को बाज़ार पहुँचना है, और आज जैसी ही गर्मी है, अप्रैल का महीना। एक आदमी के हाथ में लोहा है, उसे लोहा बाज़ार तक पहुँचाना है; लोहे की एक छड़ ली है मान लो, उसे वो छड़ बाज़ार तक पहुँचानी है। और दूसरे के हाथ में बर्फ़ है, और बर्फ़ उसे बाज़ार तक पहुँचानी है, अप्रैल का महीना है, दोपहर का समय। दोनों में से कौन होगा जो खौफ़ज़दा नज़र आएगा? हाँ? जिसके हाथ में? और काहे का डर होगा उसको? काहे का डर होगा? पिघल न जाए! ऐसे ही जी रहे हो तुम भी। ज़िंदगी प्रति-पल पिघल रही है, और जो चीज़ पिघल रही है, उसी को नाम तुमने दे रखा है 'ज़िंदगी'। ये तो बर्फ़ है, जिसको ले कर के तुम खौफ़ज़दा हो। और कोई आ कर के तुम्हें पट्टी पढ़ा दे कि हाथों में तुमने अपने प्राण पकड़ रखे हैं; हाथों में क्या हैं? प्राण। और यात्रा बहुत दूर की है, क्षितिज तक पहुँचना है, और तुम कह रहे हो, “हैं! हैं! इसको ले कर वहाँ तक पहुँचना है?” तो अब बताओ यात्रा कैसी होगी तुम्हारी? गिरते, पड़ते, बचाते, और साथ-ही-साथ ये जानते हुए कि अंत असफलता में ही होना है। कोई भी समझदार आदमी ये बेवकूफ़ी करेगा नहीं, पर हर समझदार आदमी ये बेवकूफ़ी करता है, पूछो, “क्यों?” क्योंकि हाथ में बर्फ़ ले कर के तुम अकेले नहीं दौड़ रहे। तुम्हारे चारों ओर एक विराट भीड़ है, जो सब यही कर रहे हैं, क्या? हाथ में बर्फ़ ले कर जा रहे हैं क्षितिज की यात्रा करने, कि “वहाँ तक पहुँचाना है इसको।”और उन्होंने बड़े रंग सीख लिए हैं, उन्होंने दुःख को छुपाना सीख लिया है, उन्होंने यात्रा को वैध घोषित करना सीख लिया है। और जो लोग इस अंधी भीड़ से ज़रा हटना चाहें, उन्होंने उनका दमन करना, शोषण करना, और अपमान करना सीख लिया है। भीड़ बढ़ती ही जा रही है, तुम भी उसी में लगे हुए हो। ये मूर्खता कर रहे हो तो इसका फल तो मिलेगा न! फिर क्यों प्रश्न करते हो, “मेरी क्या ज़िम्मेदारी? मुझे क्यों फल मिल रहा है?” तुम्हें नहीं मिलेगा तो किसको मिलेगा?

अकर्ता ही अभोक्ता होता है। अकर्ता वो हुआ जिसने कहा कि “दोष यदि हैं भी तो मुझमें होंगे। मैंने उसके हाथ में अपनी कमान सौंप दी जो निर्दोष है। अब मैं चिंता क्यों करूँ?” दावत में तुमने शराब पी ली, रात के बारह बज रहे हैं। घर आने के लिए गाड़ी तैयार खड़ी है, गाड़ी में ड्राइवर बैठा है; तुम्हें चिंता करनी है, ‘तुम्हें’ करनी है? दोष है भी अभी तो किसमें है? दोष किसमें है? तुममें है। नशा किसने किया? तुमने किया। लेकिन तुमने कमान किसको सौंप दी? जो निर्दोष है, जो होशमंद है। तुम अकर्ता हो गए, तुमने कर्ता अब उसको होने दिया जो कर्ता होने के लायक है; करतार कर्ता हुआ, अब तुम बेहोश होओगे चाहे जो होओगे, क्या फ़र्क पड़ता है!

यही समर्पण है – “हम हैं बहुत ही ऊँचे दर्जे के बुद्धू! और ये साबित हो चुका है कि हम क्या हैं? ऊँचे दर्जे के बुद्धू हैं। लेकिन अब हमने अपनी कमान सौंप दी है; और जिसको सौंप दी है, उसको हमने दुर्घटना करते देखा नहीं। जिसको सौंप दी है, उस पर बहुत भरोसा है!” अब तुम पिछली सीट पर आराम से सो सकते हो। अब तुम्हें फल की चिंता नहीं करनी है। अब तुम भविष्य से, चिंता से, आशंका से आज़ाद हुए। अब तुमने अपनी सारी ज़िम्मेदारी उसको दे दी जो ज़िम्मेदारियाँ उठा सकता है। तुम्हें तो ज़िम्मेदारियों का पता ही नहीं था। जीवन के किन रास्तों से गुज़रना है, इसका पता नशेड़ी को होता है क्या? वो तो कहता है कि “एक स्थान से दूसरे स्थान तक सबसे छोटा जो मार्ग होता है वो वायुमार्ग होता है, तो आज हम अपनी गाड़ी वायुमार्ग से ले कर जाएँगे!” तुम किसी दिन किसी हाइवे पर खड़े हो जाओ रात में, पाँच-सात तुम्हें ज़रूर मिलेंगे, वो वायुमार्ग से ही जा रहे होते हैं। उनकी गाड़ी रुकती नहीं है फिर, वो लैंड करती है, क्योंकि उन्होंने ही कहा है कि “हम वायुमार्ग पर जा रहे हैं” तो किसी पुल-वुल से फिर नीचे जा कर के वो लैंड करती है, हवाई जहाज की तरह।

ब्रह्म की तरह जियो या ब्रह्म के हो कर जियो; और विकल्प क्या है तुम्हारे पास? ब्रह्म की तरह हो जाने का मतलब है ब्रह्म में प्रवेश कर गए। ब्रह्म के हो जाने का मतलब है कि जो ब्रह्मस्वरूप दिखे, उसके पाँव पकड़ लिए। इनके अलावा तो कोई विकल्प होता नहीं! ये कर लिया तुमने तो उसके बाद कोई ज़िम्मेदारी नहीं; अभी तो ज़िम्मेदारी-ही-ज़िम्मेदारी है।

(प्रश्न पढ़ते हुए) आगे लिख रहे हैं कि “अगर हम किसी तरीके से ब्रह्म को हर जगह देख सकें, तो सब समस्याएँ हल हो जाएँगी।”

अच्छा ठीक है, तुम्हारी ही बात पर चलते हैं। हर जगह ब्रह्म दिख रहा है, और तुमने देखना शुरू कर दिया हर जगह ब्रह्म को ही; अब बीवी से कौन बचाएगा तुमको? वो कहेगी, “मुझे कब देखोगे?” मान लो हर जगह ब्रह्म दिखता भी हो, तो उसे देखने की नीयत है तुम्हारी? अब ब्रह्म-ही-ब्रह्म देख रहे हो तो पैसा कब देखोगे? छोला-भटूरा कब देखोगे? बीवी को कब देखोगे? बच्चे का कच्छा कब साफ़ करोगे? गाड़ी की सर्विसिंग कब कराओगे? तुम्हें तो अब सिर्फ़ ब्रह्म दिख रहा है! ब्रह्म ने तो बुद्धू बना दिया तुमको, तुम्हारे सारे काम-धंधे छूट गए। इसीलिए ब्रह्म नहीं दिखता तुमको, क्योंकि ब्रह्म जिसको दिखने लग जाता है, उसके लिए फिर बाकी चीज़ें व्यर्थ हो जाती हैं। तुम्हारे लिए अभी बाकी चीज़ें बहुत कीमती हैं, तो ब्रह्म कैसे दिखे? दिखने को तो वो तैयार बैठा है, उसकी ओर से कोई मनाही नहीं है, पर तुम्हारे साथ बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा अगर तुम्हें हर जगह ब्रह्म-ही-ब्रह्म दिखने लग गया। सोचो! तुम इंटरनेट पर गए, वहाँ अब तुम कुछ रसीला माल देखना चाहते हो, और दिख क्या गया? हाँ? ब्रह्म। लैपटॉप ही तोड़ दोगे। कहोगे, “क्या देखना था, यहाँ क्या दिख रहा है!” गए अपने दुश्मन को, कि “आज इसका सर फोड़ दूँगा!” और दुश्मन में क्या दिख गया? ब्रह्म। तुम ब्रह्म का सर फोड़ोगे? वैसे फोड़ भी सकते हो, कौन जाने!

दृश्य क्या दृष्टा से भिन्न होता है? किन्हीं भी दो लोगों को एक-सा संसार नहीं दिखता। किन्हीं भी दो लोगों को एक ही दृश्य कभी नहीं दिखता। दृश्य निर्भर करता है दृष्टा पर। जो ब्रह्म हो गया, उसके लिए सर्वत्र ब्रह्म है; और जो भ्रम पाले हुए है, वो जिधर देखेगा, भ्रम-ही-भ्रम दिखाई देंगे। तुम जो हो, वही तो तुम्हें दिखेगा! पर तुमने ये तो कहीं लिखा ही नहीं, कि “मैं काश अपनी बाकी सारी पहचानें और धंधे छोड़ कर ब्रह्म हो सकता!” ये तुमने नहीं लिखा; तुमने लिखा, “अगर हम किसी तरह ब्रह्म को हर जगह देख सकें, तो सब समस्याएँ हल हो जाएँगी।” ज़रूर! ये ऐसी-सी ही बात है कि मक्खी कहे कि “काश मुझे हर जगह गुरुओं का तेजस्वी चेहरा दिख सके! जिस घर में घुसूँ, वहाँ गुरु-ही-गुरु हों।” मक्खी को गुरु दिखेगा या गुड़ दिखेगा? यहाँ तो गुरुदेव भी गुड़ खा रहे होंगे तो मक्खी को गुरुदेव नहीं दिखने वाले, क्या दिखने वाला है? गुड़। तुम ये लिख ही नहीं रहे कि “मुझे अपना मक्खीपना छोड़ना है“, तुम कह रहे हो, “हम तो जो हैं वो तो हम रहे आएँ, बस पहले गुड़ दिखता था, अब गुरु दिखे।” ये ज़रूर तुम कोई पार्ट-टाइम धंधे की बात कर रहे हो। तुम कह रहे हो, “थोड़ी देर के लिए ऐसे हो जाएँ कि गुरु दिखे”, पर अपना तुम मक्खित्व बचा कर तो रखना ही चाहते हो; भीतर जो मक्षिका-स्वभाव बैठा है, उसको तो बचाए ही रखना चाहते हो। उद्देश्य क्या है? “कुछ देर तक गुरु को देख लेंगे, बाकी मक्खियों में शेखी बघारने के काम आएगा, ‘आज गुरु देख कर आए।’ और घण्टे-भर बाद हम भी गुड़ के अनुसंधान में निकल पड़ेंगे।”

ये सब जो तुम चाह रहे हो, ये क्या वास्तव में तुम्हें चाहिए भी है? लिख-भर रहे हो, “अगर हम काश किसी तरह सर्वत्र ब्रह्म देख सकें!” जो सामने है, बताओ दिखता है? तुम्हें तो वही दिखेगा जो तुम्हें देखना है। तुम्हारे सामने भी गुरु बैठा हो, तो तुम आँखें बंद कर के सपने ले लोगे उसके जो तुम्हें चाहिए, पर तुम कभी-भी ख़ुद को बदलने की, ख़ुद का परिष्कार करने की, अपनी खोल उतारने की बात नहीं करोगे। तुम कहोगे, “शास्त्रों में वो जो ऊँचे-से-ऊँचा वर्णित है, मुझे मिल जाए, और मैं वैसे-का-वैसा ही रहूँ जैसा मैं हूँ। जैसे घर में मैं कभी टी.वी. ले कर जाता हूँ, और कहता हूँ – आओ! आओ सब लोग! मैं क्या ले कर आया? टी.वी. * । जैसे घर में मैं कभी गाड़ी ले कर जाता हूँ, और फिर कहता हूँ – आओ! आओ! घर वालों! मोहल्ले वालों! मैं क्या ले कर आया? गाड़ी। अब आओ, पूरा परिवार गाड़ी में बैठेंगे! अब आओ, सब जने मिल कर के * टी.वी. देखेंगे! पड़ोसी भी आएँ, आधे घण्टे के लिए। आधे घण्टे में वो बिलकुल आश्वस्त हो जाएँगे कि टी.वी. असली है, मैं अमीर हूँ।” आधे घण्टे बाद उनको पानी पिला कर भगाएँगे, कि “हो गया, तुम्हारा इतना ही काम था इसमें!”

गाड़ी भी जब पहले आती है तो घर में जो वृद्ध, बुज़ुर्ग माँ-बाप होते हैं, उनसे कहा जाता है, “पहले तुम बैठ जाओ!” उनको बैठाया जाता है ताकि गाड़ी मंदिर तक जा सके; उनकी इतनी उपयोगिता है। “पहला चक्कर तुम्हारा लगवाएँगे, बैठो! तुम्हारा भरोसा ही नहीं, कहीं पहला चक्कर पूरा हो तब तक तुम ही ना रहो! तो तुम पहले बैठ लो, पाँच-सौ मीटर दूर जो मंदिर है, वहाँ तक गाड़ी ले जाएँ, वहाँ पर तुम टीका लगा लो, फिर वापस आओ, उतरो! अब हो गया, जाओ, अपने बिस्तर पर पड़ो! अब देवीजी और श्रीदेवीजी बैठेंगी, अब हम निकलेंगे पहाड़ों की यात्रा पर।” तो टी.वी. आता है, गाड़ी आती है, उनके उपयोग हमें पता ही हैं; गहने घर आते हैं। ऐसे ही मंशा ये है कि एक दिन घर आएँगे और बोलेंगे, “हम क्या ले आए? ब्रह्म। आज मैं घर पर ब्रह्म ले कर के आया हूँ। टी.वी. भी लाएगा, आर.ओ. भी लाएगा, कम्प्यूटर भी लाएगा, गाड़ी भी लाएगा, गहना भी लाएगा, और फिर ब्रह्म भी लाएगा तेरा फैजल! सब-कुछ घर ले कर आएगा।” यही तुम्हारी मंशा है – “अगर हम किसी तरह ब्रह्म को हर जगह देख सकें!” बेशक़! तुम चाहते हो कि हम जैसे हैं, जैसे जी रहे हैं, वैसे ही जिएँ, और ब्रह्म दिखना शुरू हो जाए; और बहुत हैं जो तुम्हें दिखा भी देते हैं, “आओ दिखाएँ ब्रह्म।” उन्हें कुछ नहीं करना, तुम्हें थोड़ा धतूरा चटाना है, और सर्वत्र ब्रह्म-ही-ब्रह्म की सत्ता फिर होती है; एकदम दिख जाता है, झटके में। इतनी बड़ी-बड़ी दूकानें ऐसे ही चल रही हैं, कुछ नहीं करना है, ब्रह्म दिखाते हैं वो। “लस्सी पियोगी? लो!” तुरंत उसके बाद ब्रह्म दिखेगा।

फिर कह रहा हूँ – तुम्हें जो दिखता है, वो तुमसे पृथक नहीं। तुम तुम रहते हुए तुम्हारे अलावा क्या देखोगे? बोलो! मक्खी और गुड़ अलग-अलग होते हैं? दुनिया से तुम शक्कर मिटा दो, मक्खी बचेगी? बोलो! बस बात ख़त्म! तो मक्खी और शक्कर अलग-अलग नहीं हैं। और मक्खी मक्खी है तो उसे बाहर क्या दिखाई देगा? गुड़-ही-गुड़ दिखाई देगा, और गुड़ नहीं दिखा तो घबराएगी। मक्खी-गुड़ अलग-अलग होते तो तुम दुनिया से सारा गुड़ मिटा देते, सारी शक्कर मिटा देते, मक्खी को फिर भी बचना चाहिए था। पर तुम ये कर के देख लो, मक्खी बचेगी नहीं। वास्तव में किसी जीव को, प्रजाति को मारने की ये बड़ी सीधी विधि होती है – उसका भोजन मिटा दो, प्रजाति अपने-आप मिट जाएगी। तुम्हें शेर का शिकार करना है, शेर को मारने की ज़रूरत ही नहीं; किसी वन से सारे हिरण और छोटे जीव, सब हटा दो, शेर अपने-आप मर जाएगा।

(प्रश्न पढ़ते हुए) फिर कहा है, “शरीर और ब्रह्माण्ड एक ही ऊर्जा से बने हैं, तो फिर हम इस शरीर में वो परम ऊर्जा कैसे महसूस करें?”

थोड़ी जो ऊर्जा बढ़ जाती है तो थर्मामीटर ले कर दौड़ते हो! और ब्रह्माण्ड की परम ऊर्जा तुम्हारे शरीर में आ गई तो क्या करोगे, अंटार्कटिका में जा कर लोटोगे? वहाँ की भी सारी बर्फ़ पिघल जाएगी, ब्रह्माण्ड की ऊर्जा तुम्हारे शरीर में आ गई तो! क्यों ऐसे सवाल पूछ रहे हो? हमारी तो ऊर्जा विक्षिप्त ऊर्जा है, जितनी है उतनी ही नहीं सँभाली जा रही, अभी और माँग रहे हो! और ऊर्जा नहीं माँगते, सद्बुद्धि माँगते हैं।

तुम्हारा बच्चा है छोटा, और वो कहता है, “मुझे मोपेड दिला दो!” उसे दिला देते हो क्या? तुम्हारा दस साल का बच्चा है, वो मोपेड माँग रहा है, शायद चला भी ले! पर फिर भी दिला देते हो क्या उसको? और मोपेड है आठ हॉर्सपावर की; कितने हॉर्सपावर की? आठ हॉर्सपावर की। अब वही बच्चा मुझे सवाल लिख कर भेज रहा है, “मुझे सोलह-सौ हॉर्सपावर की सुपर-बाइक चाहिए।” कितने हॉर्सपावर की? सोलह-सौ हॉर्सपावर की सुपर-बाइक चाहिए। मैं उसको दूँ? बोलो तो दे दूँ! वो अभी इस काबिल नहीं कि आठ हॉर्सपावर की मोपेड चला सके, और माँग उसकी क्या है? ब्रह्माण्ड की अनंत ऊर्जा! “सोलह-सौ हॉर्सपावर मुझे दे दो!” और दे दिया तो करेगा क्या? क्या करेगा?

प्र: *एक्सिडेंट*।

आचार्य: तुम पहले लूना चलाना तो सीख लो! तुम क्या माँग रहे हो? वो तुम्हें मिल गया तो क्या करोगे? अपना ही सर्वनाश करोगे!

सद्बुद्धि माँगो; ऊर्जा और नहीं माँगते। ऊर्जा पावर है, ताक़त है, शक्ति है, और शक्ति अहंकार को बढ़ावा देती है, इसीलिए तो माँग रहे हो! और तुम तो शक्ति भी नहीं माँग रहे, तुम ब्रह्म की शक्ति माँग रहे हो, अब्सॉल्यूट पावर माँग रहे हो। अँग्रेज़ी में चलता है – “पावर करप्ट्स!” (शक्ति भ्रष्ट कर देती है) “एन्ड अब्सॉल्यूट पावर करप्ट्स अब्सॉल्यूटली!” (और परम शक्ति पूर्ण रूप से भ्रष्ट कर देती है) और तुम बिलकुल वही माँग रहे हो यहाँ पर – ब्रह्माण्ड की ऊर्जा, अब्सॉल्यूट ताक़त! वो क्या करेगी तुम्हारा? अब्सॉल्यूट करप्शन ! अब्सॉल्यूट शक्ति सिर्फ़ शिव को शोभा देती है, वो शिव हैं इसीलिए शक्ति को सँभाल सकते हैं। शक्ति तुम्हारे ऊपर जब उतर आती है तो कहते हैं कि “देखो, इस पर माता उतर आयी है!” और देखा है वो, जिन आदमी-औरतों पर माता उतरती है उनकी क्या हालत रहती है? क्या हालत रहती है? अब ऐसे मासूम ना बनो, ऐसी जगहों पर आना-जाना सबका है।

प्र: पागलों जैसी।

आचार्य: हाँ! पागलों जैसे लगते हैं, झूम रहे हैं, सँभाल पा रहे हैं अपने-आप को? कोई सर फोड़ रहा है अपना, कोई नंगा हो गया है, कोई गाली बक रहा है! तुमसे कहा जाए कि “फलानी को माता आयी है”, तुरंत तुम्हारे मन में उत्साह उठेगा कि “जाएँ और मिल आएँ”? या भागोगी दूर-दूर, कि “ये पगलाई है, अभी इसको दूर रखो”? हमारी ऊर्जा बौराई हुई है, और वो बौराई ही रहेगी। जैसा कहा मैंने, ऊर्जा को सुनियोजित, सुव्यवस्थित, प्रवाहमान, लयमान रखने का काम मात्र शिव कर सकते हैं। जिसके ह्रदय में शिव हैं, उसकी शक्ति नाचेगी। नृत्य समझते हो? नृत्य में क्या होता है? गति में एक लय होती है, गति में एक अपूर्व व्यवस्था होती है, उसको तुम कहते हो 'नृत्य'। और जिसके ह्रदय में शिव नहीं हैं, उसकी शक्ति बौराएगी, वो पगलाएगा; वो हाथ इधर मार रहा है, सर उधर फोड़ रहा है, दस दिशाओं में एक-साथ भागने की कोशिश कर रहा है! वो ऐसा हो जाएगा।

तुम्हें पहले क्या माँगना चाहिए, शक्ति कि शिव?

प्र: शिव।

आचार्य: और तुमने शिव का यहाँ कहीं नाम लिखा नहीं, इस प्रश्न से शिव अनुपस्थित हैं। माँग क्या रहे हैं?

प्र: शक्ति।

आचार्य: और शक्ति क्या करती है? अहंकार बढ़ाती है। शिव माँग ही नहीं रहे। शक्ति क्या हैं? वो शक्ति शिव की प्रेयसी हैं, शिव की छाया हैं, शिव का साकार रूप हैं।

क्या माँगना चाहिए? शिव। कबीर इसी को कह गए हैं –

“प्रभुता को सब कोई भजे, प्रभु को भजे न कोय। जो कोई प्रभु को भजे, प्रभुता चेरी होय।।”

प्रभुता माने? शक्ति। अब प्रभुता सबको चाहिए; प्रभु से जो चीज़ें मिलती हैं वो सबको चाहिए, प्रभु बेचारे किसी को नहीं चाहिए!

भई, प्रभु के साथ रहते हो तो बहुत-कुछ मिलता है न! मालिक के साथ नौकर भी चलता है तो नौकर को भी सलाम मिलता है। मिलता है कि नहीं मिलता है? दूल्हे के साथ पूरी बारात आ जाती है, उसमें सब एक-से-एक नमूने भरे हैं – भूत, प्रेत, पिशाच! पर उनके ऊपर भी फिर इत्र छिड़का जाता है। काहे को? वो दूल्हे के साथ आए हैं! ये प्रभुता है। प्रभु कौन है? दूल्हा प्रभु है, बाराती प्रभुता हैं। दूल्हे का जितना सत्कार नहीं होता, उतना बारातियों का होता है। दूल्हे को कभी रूठते देखा है, कि “दूल्हे राजा रूठ गए हैं”? दूल्हे की औक़ात कि रूठ जाए! उसे अभी आगे झेलना है, अभी रूठेगा तो आगे भरेगा, पर बारातियों को रूठते तुमने खूब देखा होगा। और बाराती की कोई हैसियत नहीं, लेकिन उसका मान देखो, उसका अहंकार देखो। तो “प्रभुता को सब कोई भजे”, बारातियों का सत्कार चलता है फिर, “प्रभु को भजे न कोय।” लेकिन आगे भी कबीर समझाते हैं, “जो कबीर प्रभु को भजे, प्रभुता चेरी होय।” चेरी माने दासी। ये भूल मत कर देना! शिव को माँगना, पीछे-पीछे शक्ति अपने-आप मिल जाएगी। शक्ति के प्रार्थी मत हो जाना! जब भी किसी से कुछ मिलता हो, तो एक सवाल ईमानदारी से ज़रूर पूछा करो – “मैं इस व्यक्ति से क्यों जुड़ा हुआ हूँ? इस व्यक्ति की खातिर, या मुझे इस व्यक्ति से जो मिलता है उसकी खातिर?”

“प्रभु से क्यों जुड़ा हूँ? प्रभु की खातिर, या प्रभुता की खातिर?” – ये सवाल बहुत-बहुत ज़रूरी है।

प्रभु से तुम्हारा जब भी प्रेम होगा, वो निस्वार्थ होगा। प्रभुता से तुम्हारा जब भी प्रेम होगा, उसमें स्वार्थ है, उसमें हड़पने की, नोचने की दुर्गंध है। इसीलिए तो चूक हो जाती है न! भगवान को भी हम जब स्थापित करते हैं, तो उनको अति वैभवशाली, विभुता, बलशाली बना कर स्थापित करते हैं। काहे को? ताकि हमें उससे वो सब मिले भी तो! अब भगवान को बना दिया है दस हाथों वाला, वो दस हाथ उसके तो काम आएँगे नहीं; वो तो उसी में उलझ जाएगा, “दस हाथ!” वो दस हाथ तुमने इसलिए बनाए हैं कि वो दस हाथ से तुमको दे। तुमने दस हाथ भगवान के इसलिए थोड़े ही बनाए हैं कि भगवान उनसे दस जगह खुजली करे अपनी! तुम चाहते हो वो दसों हाथों से तुम पर लुटाए। फिर इसीलिए जब भगवान तुम्हारे सामने भिखारी बन कर आते हैं या साधारण बन कर आते हैं तो तुम्हें पहचान में ही नहीं आते, और चूक जाते हो। क्योंकि तुम्हें प्रभु से तो मतलब था ही नहीं, मतलब था प्रभुता से, और बिना प्रभुता के जब प्रभु तुम्हारे सामने आ गए, तो तुमने कहा, “ये प्रभु है ही नहीं!” इसीलिए फिर तुमको बेवकूफ़ बनाना भी आसान है। कोई भी बस प्रभुता का प्रदर्शन कर दे तुम्हारे सामने, तो वो तुम्हारे लिए प्रभु हो जाता है, क्योंकि तुम्हें मतलब ही?

प्र: प्रभुता से है।

आचार्य: तुम पहचान ही किसकी करते हो? प्रभुता की। तो कोई भी तुम्हारे सामने आ कर ज़रा शक्ति दिखा जाता है, वो तुम्हारे लिए क्या हो जाता है? “भगवान! भगवान!”

प्रभु से मतलब रखो, शिव से मतलब रखो, शक्ति पीछे-पीछे चली आएँगी। पर जब तुम शिव से मतलब रख रहे हो, तो चुपके-चुपके कनखियों से देखते मत रहना, कि “शक्ति आ रही हैं कि नहीं आ रही हैं! और ना आ रही हों तो धीरे-से याद दिलाएँ प्रभु को – प्रभु! आप आ रहे हैं, बड़ा सौभाग्य है! वो शायद शक्ति जी, हें हें हें, वो छूट गईं, ज़रा उनको भी...” ये सब नहीं चलेगा। नहीं, तुम्हारा ऐसा ही है!

अब नयी-नयी शादी हुई किसी की, सोमनाथ ने फ़ोन किया, दोस्त ने फ़ोन उठाया। उससे पूछ रहा, “भाभी घर पर हैं?” उधर से बोला, “हाँ!” तो बोलता है, “आ रहा हूँ!” अब ये तुम किसके लिए जा रहे हो, भाई के लिए कि भाभी के लिए? और जब तुम्हारी शादी होती है तो भूले-बिसरे, पुराने, अड़ंगे-पड़ंगे दोस्त-यार भी चले आते हैं। तुम्हें लग रहा है तुमसे मिलने आ रहे हैं? ये सब किसके दीवाने हैं? तो देखा नहीं है क्या? वो एक आएगा, बोलेगा, “मैंने तेरे साथ नर्सरी क्लास पढ़ी थी! भाभी कहाँ हैं?” ऐसा तो हमारा हाल है!

शक्ति माँग रहे हैं तो क्या बोलूँ! मेरे लिए ये (शिव की प्रतिमा की ओर इशारा करते हुए), इनका तुम नाम नहीं लोगे, तो मैं तो गरियाऊँगा! ये हों, तो शक्ति तो मिल ही जाती हैं। जो शक्ति माँगेगा, उसने शिव तो माँगे ही नहीं, और शक्ति भी नहीं मिलेंगी, क्योंकि शक्ति वफ़ादार हैं शिव की। दोनों तरफ़ से मारा गया! जो शक्ति माँग रहा है, उसने शिव तो माँगे ही नहीं, और शक्ति मिलीं नहीं। इसलिए अब तुम समझो कि दुनिया में सब ताक़त, ओहदा, शक्ति, बल माँगते रहते हैं और रह निर्बल जाते हैं; क्यों? क्योंकि उन्होंने शक्ति माँगी, शिव नहीं माँगे; बल माँगा, जो बलातीत है उसको नहीं माँगा। और दूसरी तरफ़ वो होते हैं जो शिव को ही माँग लेते हैं, कहते हैं, “तुम आ जाओ बाबा! हमारे लिए तुम ही काफ़ी हो। तुमसे कुछ नहीं चाहिए, तुम ही चाहिए!”

हमारे रिश्तों में ये बड़ी भूल रहती है न! हमें कभी-भी ‘तुम’ नहीं चाहिए, हमें हमेशा ‘तुमसे’ कुछ चाहिए। और जिसे तुमसे जो कुछ चाहिए, वो तुम देना बंद कर दो तो रिश्ता टूट जाता है। कभी ऐसा रिश्ता बनाना जिसमें कोई माँग ना हो, कोई शर्त ना हो। ऐसा रिश्ता बनाने के लिए बड़ी शक्ति चाहिए, वो मिल जाएगी। पहले ध्येय में तो शिवत्व हो, फिर बाज़ुओं में शक्ति अपने-आप मिल जाती है।

समझ रहे हो?

प्र१: आचार्य जी, जिन आँखों ने पूरी ज़िंदगी बस शक्ति ही देखी है, प्रभुता ही देखी है, तो उनमें ये बदलाव कि वो प्रभु देख सकें, वो सिर्फ़ प्रभु ही देंगे। उनसे बस, प्रभु से प्रार्थना ही कर सकते हैं।

आचार्य: प्रभु से प्रार्थना करो और अपने प्रति ज़रा सच्चे रहो!

जीवन-भर अगर शक्ति ही देखी है, और वो शक्ति जो शिव-विहीन है, तो पछताए भी बहुत होगे! क्योंकि तुमने बड़ी नपुंसक शक्ति देखी होगी फिर! बड़ी अधूरी शक्ति देखी होगी फिर! बड़ी लाचार और लचर शक्ति देखी होगी फिर! असली शक्ति देखनी किनको नसीब होती है? जिनकी आँखों के पीछे?

प्र: शिव हों।

आचार्य: और वो असली वाली तो तुमने देखी नहीं है शक्ति। तो जो शक्ति तुमने देखी है, वो तो तुम्हें और अशक्त कर गई होगी न, पछताए बहुत होगे! तो अच्छा ही है, अनुभवों से सबक ले लो!

प्र२: आचार्य जी, आपने कहा था कि मक्खी को हटाना है तो गुड़ हटा दो। हमारा अहंकार किस चीज़ को भोजन बनाता है?

आचार्य: अहंकार को जिस चीज़ को भोजन बनाना है, अहंकार उसको प्रक्षेपित कर देता है। अहंकार इस मामले में सेल्फ-सफिशियंट (आत्म-निर्भर) है, उसको जो चाहिए वो उसकी रचना कर देता है।

तुम पलते हो क्रोध पर और द्वेष पर; तुम रचना कर डालोगे एक कहानी की, तुम कहोगे, “ये जो सामने बैठे हैं, ये मेरे दुश्मन हैं! ये जो यहाँ बैठे हैं, ये मेरे दुश्मन हैं! इनके इरादे ख़तरनाक हैं!” तुमने रचना कर डाली। और जैसे ही तुमने ये रचना करी, तुम्हें अब क्या उठेगा?

प्र: गुस्सा।

आचार्य: गुस्सा उठेगा।

अहंकार को जो चाहिए, वो उसे तथ्यों में नहीं ढूँढना पड़ता, वो उसकी कल्पना कर डालता है। तो अहंकार इस मामले में बड़ा आत्मनिर्भर है, बिलकुल! तुम उससे उसका भोजन छीन ही नहीं सकते, वो अपना भोजन ख़ुद बनाता है।

प्र३: आचार्य जी, पिछले कुछ सेशंस में, इसी अपरोक्षानुभूति में ये डिस्कस हुआ था कि मनुष्य की जो सामाजिक स्थिति होती है, उसके अनुरूप ही उसको इसमें आगे बढ़ना चाहिए। तो अब आज हमने इतनी बातें करी ब्रह्म की, सच्चाई की, शिव की – अब क्या होता है कि हम अध्यात्म की दिशा में थोड़ा आगे आ गए हैं और आगे बढ़ना भी चाहते हैं, पर हमारे जो प्रियजन हैं, जिनसे हम जुड़े हुए हैं उन्हें इसका कुछ नहीं पता। तो जब तक यह अंतर है, इस अंतर के साथ आगे बढ़ना बड़ा मुश्किल-सा लगता है। वो जब तक वैसे रहेंगे, हम एक बार में वो नहीं हो सकते जो होना चाहते हैं। इस स्थिति में क्या करें?

आचार्य: तो दे तो दिया उत्तर, एक बार में कौन कह रहा है कि हो जाओ? लगे रहो धीरे-धीरे!

प्र३: तो वो ठीक है?

आचार्य: होगा ही ऐसे, ठीक या ग़लत का सवाल नहीं है, वो होना ही ऐसे है। आज अकेले आए हो, कल सबको ले कर आओ न! बरसों का कूड़ा है, कुछ तो समय लगेगा साफ़ होने में न! तो धीरे-धीरे ही होगा।

देखो, बहुत बड़ी ताक़त है एक, जो नहीं चाहती है कि इस कूड़े की सफ़ाई हो, तो किसी ग़लतफ़हमी में मत रहना कि यूँ ही हो जाएगा। जान तो लगती है, दर्द भी होता है, जान चली भी जाती है! तो काम असम्भव तो नहीं है, पर दुष्कर ज़रूर है। तुम्हें इसमें बहुत निष्ठा चाहिए, और बहुत सारा आशीर्वाद चाहिए; और उसके बाद भी वो सब पूरा पड़ेगा, कोई गारंटी नहीं। इसीलिए तो निष्ठा चाहिए न, कि “पता नहीं है कि ध्येय मिलेगा या नहीं, पर मुझे करने दो” यही तो बात है निष्ठा की! “पता नहीं मंज़िल मिलेगी या नहीं, पर मुझे चलने दो!” – इसी का नाम निष्ठा है।

मंज़िल का भरोसा ही हो, और चले जा रहे हो, तो फिर किसी श्रद्धा की ज़रूरत कहाँ? उस चलने में मन रम जाना चाहिए। “तुम मिलो-न-मिलो, तुम्हारी तरफ़ यात्रा कर रहे हैं यही बहुत है। तुमसे प्यार इतना है कि तुम मिले या नहीं मिले, अब बहुत फ़र्क नहीं पड़ता! तुम्हारी ओर चल पड़े, हमें इतने से ही चैन है।” ये बहुत बड़ी शर्त होती है, कि “तुम्हारी ओर तभी चलेंगे जब तुम भरोसा दो कि तुम मिलोगे!” ये शर्त तो बड़े व्यापारी मन की हो गई। भक्त का मन ये नहीं कहता कि “हम तभी भक्ति करेंगे जब पहले उधर से एक लिखित भरोसा आए कि मिलेंगे ज़रूर! आठ वर्ष बाद, इतने श्रम के बाद, इस जगह पर मुलाक़ात हो जाएगी।” फिर तुम कहोगे, “ठीक है, क्लाइंट की ओर से एडवांस आ गया। चलो रे! काम करना शुरू करो।” यहाँ तो ये है कि काम करे जाओ, काम करे जाओ; भुगतान आएगा, नहीं (आएगा), कुछ पता नहीं। और आएगा भी तो कब आएगा, कैसे आएगा और कितना आएगा, कुछ पता नहीं। ऐसी होती है प्रभु की भक्ति। तुम्हें करने से प्रेम होना चाहिए। करने-मात्र से प्रेम रखो, तो ही कर जाओगे, नहीं तो फिर तो ख़त्म हो जाओगे। अग्रिम भुगतान छोड़ दो; यहाँ कोई भी भुगतान पक्का नहीं।

(एक श्रोता को इंगित करते हुए) देखो, ये ठिठक गया बिलकुल! “ये धोखेबाज़ी का धंधा है, भक्ति। हम प्रभु में इतना निवेश करेंगे, और वो भरोसा भी नहीं दिला सकते कि हम मिलेंगे!” वो ऐसे ही हैं, तानाशाह। वो कहता है, “तुम करे जाओ, तुम करे जाओ, हमारी तबीयत बनेगी तो हम आ जाएँगे, नहीं बनी तो कुछ नहीं!”

पर जिन्होंने जाना है, उन्होंने उसकी कीमत इतनी जानी है कि वो कहते हैं कि “तू नहीं तो तेरी राह ही सही, हम इसी में गुज़र कर लेंगे। तेरे मिलने का कोई भरोसा नहीं, हम फिर भी सफ़र कर लेंगे” शायरी हो गई छोटी-मोटी।

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