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आत्मा - निर्गुण होते हुए भी गुणवान || तत्वबोध पर (2019)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। गुरु शंकराचार्य जी ने आत्मा को इस तरह परिभाषित किया है – "स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर से जो पृथक है, जो तीनों अवस्थाओं का साक्षी है तथा जो सच्चिदानंदस्वरूप है, वह आत्मा है”, और वहीं यह भी कहा है कि "स्थूल शरीर अभिमानी आत्मा को विश्व कहा जाता है, सूक्ष्म शरीर अभिमानी आत्मा को तैजस तथा कारण शरीर अभिमानी आत्मा को प्राज्ञ कहा जाता है।"

आचार्य जी, मेरी जिज्ञासा यह है कि जब आत्मा तीनों प्रकार के शरीर से अलग है तो वह उनके साथ अभिमान कैसे जोड़ लेती है? विश्व, तैजस तथा प्राज्ञ शब्दों से क्या अर्थ है, कृपया स्पष्ट करें।

आचार्य प्रशांत: आत्मा हर उपाधि का खंडन करती है। आत्मा इतनी स्वच्छंद, इतनी अनिर्वचनीय, इतनी अकल्पनीय है कि तुम उसके बारे में कुछ भी नहीं कह सकते। तुम उसके बारे में जो कुछ भी कहोगे, वह कभी-न-कभी उलटा पड़ जाएगा। वह किसी एक गुण से आबद्ध होती ही नहीं, उसके साथ तुम कोई एक उपाधि, विशेषण जोड़ सकते ही नहीं।

तो आत्मा की इस अनिर्वचनीयता का एक परिणाम यह भी है कि तुम यह भी नहीं कह सकते कि आत्मा मुक्त है, क्योंकि अगर तुमने आत्मा के लिए यह भी कह दिया कि आत्मा सदैव मुक्त है, तो यह आत्मा के लिए बंधन हो गया। आत्मा कहती है, "जी, यह तुमने बड़ी बंदिश लगा दी हम पर कि हमें सदा मुक्त ही रहना है। हम बादशाहों के बादशाह हैं, हम इतने बड़े बादशाह हैं कि हम कभी-कभी विरासत त्याग भी सकते हैं, हमारी मर्ज़ी। और हम इतने ज़्यादा मुक्त हैं कि कभी-कभी हम स्वेच्छा से बंधन भी चुन सकते हैं।"

यह आत्मा की अजीब कलाकारी है कि वह कुछ ना होते हुए भी बहुत कुछ हो जाती है और जो हो जाती है, उसका विपरीत भी हो जाती है। अगर आत्मा इतनी ही मुक्त होती कि मुक्त रहना उसके लिए एक बाध्यता हो जाती, तो फिर वह मुक्त कहाँ है? अगर आप कम्पल्सरिली फ़्री (अनिवार्यतः मुक्त) हो तो फ़्री (मुक्त) कहाँ हो? तो यह आत्मा की परम मुक्ति का सबूत है कि वह बंधन भी चुन लेती है। “मेरी मर्ज़ी!”

अहम् और क्या है? आत्मा का चुनाव, आत्मा का खिलवाड़। आत्मा अपने ही साथ खेल रही है आँख-मिचौली। ख़ुद ही अपनी आँखें बंद कर ली हैं और ख़ुद ही से टकरा-टकराकर ठोकरें खा रही है, ख़ुद ही दुःख भोग रही है अपनी ही तलाश में और फिर ख़ुद ही गुरु बनकर आ जाएगी अपना ही दुःख दूर करने। ऐसी परम स्वाधीनता है उसकी।

यह बात हमारी समझ में ही नहीं आएगी, क्योंकि हम तो गुणों पर, ढर्रों पर, क़ायदों पर चलने के क़ायल हैं। इसको हम कह देते हैं, “यह बड़ा गुणवान है”, इसको हम कह देते हैं कि “यह बड़ा बेईमान है।” आत्मा ऐसी है जो निर्गुण होते हुए भी कभी गुणवान है और कभी बेईमान है। है निर्गुण, पर हर तरह के गुण दिखा देती है।

अब तुम परेशान हो कि जब निर्गुण है, तो उसे गुण दिखाने की ज़रूरत क्या है? अरे! ज़रूरत पर तुम चलते हो, ज़रूरत पर चलना छोटे लोगों का काम है। तो दुनिया भर के हम सब छोटे लोग ज़रूरतों पर चलते हैं, आत्मा क्रीड़ा करती है। आत्मा खिलाड़ी है, आत्मा नर्तकी है। किसके ऊपर नाचती है? अपने ऊपर। किसको दिखा-दिखाकर नाचती है? ख़ुद को ही।

अब बताओ, यह अद्वैत है या द्वैत है?

कुछ पक्का नहीं, क्योंकि दो तो हैं ही – एक द्रष्टा, एक दृश्य, पर यह भी बात पक्की है कि जो दृष्टा है, वही दृश्य है। तो अब बोलो, दो बोलोगे कि एक बोलोगे? लो, फँसे!

इस चर्चा से इस तरह की बातों को विराम मिल जाना चाहिए कि "परमात्मा जब इतना दयावान, न्यायवान, कृपावान है तो दुनिया में इतना दुःख क्यों है, मृत्यु क्यों है, अन्याय और अत्याचार क्यों है?"

परमात्मा ना दयावान है, ना करुणावान है, ना हैवान है, ना भगवान है; परमात्मा तो निर्गुण है। चूँकि वह निर्गुण है, इसीलिए सारे गुणों का अधिकार उसमें निहित है। सारे गुणों से खेलने की लीला उसमें निहित है। सद्गुण, अपगुण, तुम्हें चाहे जो नाम देना हो गुणों को, तुम्हारी मर्ज़ी। दोष बोल दो, दुर्गुण बोल दो, वह सब कुछ हो जाता है। वह ना होता, तो दोष-दुर्गुण, वृत्ति-विचार भी कहाँ से होते?

प्र२: आचार्य जी, मैं यह जानना चाह रहा था कि जैसा हमारा माहौल होता है, वैसे ही विचार हमें आते हैं, तो क्या हमें जैसे विचार चाहिए, हमें वैसे ही माहौल में रहना होगा?

आचार्य: तुम्हें क्या पता कैसे विचार ठीक हैं? बड़े होशियार हो! तुम्हें पहले ही पता है कि तुम्हें कैसे विचार धारण करने हैं? तुम हो कौन? कैसे विचार रखने हैं?

प्र२: जिनको हम अच्छा समझते हैं।

आचार्य: हम माने?

प्र२: मैं।

आचार्य: तुम तो बदलते रहते हो लगातार। तुम कौन हो? तुम तो अच्छा उसी चीज़ को समझोगे जो तुम्हें समझा दी गयी है।

अध्यात्म में माहौल की बात बाद में की जाती है, 'मैं' की बात पहले की जाती है। शराबी को तो यही लगेगा न कि उसके लिए सर्वाधिक उपयुक्त माहौल है मयखाने का। तुम्हारे पास पहले ही बहुत सारे विचार हैं, वो क्या हैं? किसको आ रहे हैं? कहाँ से उठते हैं? यह जानने की फ़िक्र करो। नए-नए, ताज़ा-ताज़ा और नए विचारों को ओढ़ने की कोशिश छोड़ो। पुराने जिन विचारों से मन भरा हुआ है, तुम और विचार लाओगे भी तो वो उन्हीं पुराने विचारों का ही अग्रेषण भर होंगे।

तुम्हारे मन में अगर यही विचार भरा हुआ है कि दुनिया ने तुम्हारे साथ बहुत बुरा किया है, तो आगे भी तुम कौन-सा विचार पोषित करोगे मन में? “दुनिया का बुरा करूँगा। बंदूक कहाँ मिलती है? किसको ठोकना-बजाना है?” और इनको तुम कहोगे, “ये मेरे नए विचार हैं।” ये नए हैं? ये नए नहीं है न? ये पुराने ही विचारों की शृंखला भर हैं। तो नए की बात छोड़ो, इतना कुछ पुराना है तुम्हारे पास, उस पर ग़ौर कर लो पहले।

अभी जो अपने-आपको मानते हो, वह कहाँ से सीखा? अभी जो इतनी मान्यताएँ हैं, अभी जो दिमाग में इतना कुछ घूमता रहता है, वह कहाँ से आया है? क्यों तुमने उसे बुला करके उसकी ख़ातिरदारी कर डाली है? कौन हो तुम, और यह सब करके तुम्हें लाभ क्या हो रहा है? झटपट आगे को मत भाग जाया करो। ग़लत राह चलने वाले को शोभा नहीं देता कि वह आगे-ही-आगे को भागता रहे। एक तो रास्ता ग़लत और ऊपर से ज़िद यह कि बहुत तेज़ चलना है। गड़बड़ है न?

प्र३: आचार्य जी, आपने कहा कि कल्पना जो है, वह सब न्यूनतम है, उसके बाद तथ्य है और सत्य है। लेकिन जब कल्पना का अभाव हो जाता है और तथ्य को जब हम जान लेते हैं, तो जीवन बड़ा रूखा-सूखा हो जाता है। तो कैसे हम अपने जीवन को तथ्य के साथ रह करके आनंदमय बना पाएँ?

आचार्य: यह तो क़ुर्बानी देनी पड़ेगी न। सत्य रसस्वरूप है। उपनिषदों ने आपको कहा – “रसो वै सः।” तो सत्य के साथ तो ना रुखाई है, ना सुखाई है, वहाँ तो रस बरसाई है।

चूँकि हमारे पास सत्य नहीं होता, तो हम रस का एक झूठा, सस्ता विकल्प ढूँढते हैं, क्या? कल्पना। आपको मिठाई मिली ही हो तो आप मिठाई का तसव्वुर क्यों करेंगे? जो चीज़ नहीं मिली होती, उसी की तो कल्पना पकाते हो, और कल्पना ही अगर मीठी लगने लग गयी, तो मिठाई तो मिल चुकी! तो कल्पना की मिठास की क़ुर्बानी तो देनी ही पड़ेगी न?

तथ्य क्या है? तथ्य यह कड़वी-सी हक़ीक़त है कि मिठाई भी नहीं है और जो हमारे लक्षण हैं, उनमें मिठाई पाने का हमारा कोई इरादा भी नहीं दिखता। तो बिलकुल ठीक कहा आपने कि बात ज़रा अखरेगी, चुभेगी, पर जो इस चुभन से गुज़र जाएगा, उसे रस प्राप्त भी हो सकता है, नहीं तो कल्पनाएँ हैं, मुंगेरी लाल के हसीन सपने!

प्र४: आचार्य जी, जैसे जो वृत्तियाँ होती हैं या जो इमोशंस (संवेग) आते हैं, फ़ीलिंग्स (भावनाएँ) आती हैं, तो उनको सिर्फ़ देखना चाहिए, ना तो उसमें शामिल होइए, ना कुछ और। तो जैसे लगता है कि यह सब जो शरीर के तल पर हो रहा है, यह न्यायस्वरूप है। जैसे कंडीशनिंग है, सामने एक परिस्थिति आयी है उसी अनुसार कंडीशनिंग ने अपना काम किया है और फ़ीलिंग आयी है। और वही परिस्थिति बदल जाएगी, प्रोग्रामिंग वही है, उसका परिणाम भी बदल जाएगा।

तो अगर हम देखें कि इसमें अगर हम बदलाव भी करना चाहें, जैसे इन्फ़ीरिओरिटी (हीनभावना) से सुपीरिओरिटी (श्रेष्ठता) की ओर जाना चाहें तो यह तो सब कंडीशनिंग का ही, प्रोग्रामिंग का ही हिस्सा है। इसको विशेष क्यों मानना है? सिर्फ़ देख लेना है बस, और गंभीरता से ना लें इसको। यह जो शरीर में फ़ीलिंग हो रही है, वह प्रोग्रामिंग का ही खेल है, तो यह सब जानना है बस।

आचार्य: यह थोड़ा-सा कठिन रास्ता है। रास्ता ठीक बोल रहे हैं आप, थोड़ा-सा कठिन है। कठिन इसलिए है क्योंकि मन कुछ-न-कुछ ढूँढ़ेगा गंभीर होने के लिए। आप अगर कह देंगे कि, "मुझे किसी भी विषय में गंभीर नहीं रहना, मेरे लिए कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है", तो यह बात थोड़ी अव्यावहारिक हो जाती है। ग़लत नहीं है यह बात, सिर्फ़ थोड़ी अव्यावहारिक है कि आप मन से कह रहे हैं, “कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है।” मन कहेगा, “यह क्या बात हुई? तो फिर हम ज़िंदा ही क्यों हैं?”

ज़्यादा व्यावहारिक विधि यह है कि कुछ ऐसा ढूँढ़ लीजिए जो वास्तव में महत्वपूर्ण हो, कुछ ऐसा ढूँढ़ लीजिए जो तमाम तरह की उलझनों से आपको ज़रा निजात दिलाता हो। उसके साथ महत्व जोड़ दीजिए, तो फिर ये छोटे-मोटे, इधर-उधर के खेल-तमाशे होते हैं, मन उनको महत्व देगा ही नहीं।

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