दोषोऽपि विहित: श्रुत्या मृत्योर्मृत्युं स गच्छति। इह पश्यति नानात्वं मायया वन्चितो नर:।।
“‘मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है’, ऐसा कह कर श्रुति ने दोष भी बतलाया है। मनुष्य माया से ठगा जा कर ही संसार में नानात्व देखता है।” ~अपरोक्षानुभूति (श्लोक ४८)
आचार्य प्रशांत: अड़तालीसवाँ श्लोक है अपरोक्षानुभूति का। श्लोक कहता है, “मनुष्य माया से ठगा जा कर ही संसार में नानात्व देखता है।”
(प्रश्न पढ़ते हुए) “आचार्य जी, मन तो टुकड़ों में जीता है, अलग-अलग ही देखता है, तभी डरता है। ये क्या है – अलग-अलग देखना? ये क्या है – नानात्व?”
आदिशंकर का वचन है कि मनुष्य माया से ठगा जा कर ही संसार में नानात्व देखता है। मौलिक अपूर्णता है मनुष्य, और वो मौलिक अपूर्णता जीवन की स्थितियों में अलग-अलग रूप से अपने-आप को दर्शाती है। अलग-अलग लोग, अलग-अलग समय, अलग-अलग कर्मों में और विचारों में उद्यत होते हैं, लेकिन ज़रा नीचे जा कर देखिए कि मूल-रूप से प्रेरणा क्या है सबकी। मूल-रूप से प्रेरणा सबकी एक है, और वो एक प्रेरणा है कि “किसी तरह से ‘पूरा’, ‘भरपूर’ महसूस करूँ। किसी तरीके से भीतर जो तड़प है, बेचैनी है, ज़रा कम होने का, ज़रा हीन होने का भाव है, उसका शमन हो, वो मिटे।”
बात अलग-अलग तरीके से प्रकट हो रही है लेकिन बात एक ही है। ठीक वैसे जैसे एक बाज़ार में लोग अलग-अलग चीज़ों के अभिलाषी और ग्राहक होते हैं, लेकिन एक बात सबमें पक्की है कि सबको कुछ-न-कुछ चाहिए। उसी तरीके से दुनिया हमारे लिए वस्तुओं का भंडार है और हर वस्तु अपने साथ एक आश्वासन लिए हुए है – “तुम्हारा मन भर दूँगी, तुम्हारा घर भर दूँगी, तुम्हें पूरा कर दूँगी।” और एक आदमी जो आज एक चीज़ चाह रहा है बाज़ार में, वो उस एक चीज़ पर रुक नहीं जाने वाला। एक दूकान में चाहे सफलता मिले, चाहे असफलता मिले, ये पक्का है कि वो आदमी जल्दी ही दूसरी दूकान में भी नज़र आएगा। कपड़ों की दूकान में गया था वो, जैसे कपड़े चाहिए थे मिल गए, भली बात! क्या यात्रा रुक गई उसकी? नहीं, यात्रा नहीं रुक गई। अब वो जाएगा और सब्ज़ियों और फलों की दूकानों पर नज़र आएगा, या अब वो जाएगा, मिठाई की दूकान पर नज़र आएगा। और कपड़ों की दूकान पर गया था वो, और उसे असफलता मिली तो भी बात वही रही, अभी भी वो नज़र दूकान पर ही आएगा, किस दूकान पर? दूसरे कपड़े की दूकान पर नज़र आएगा।







