तुम्हारा क्रोध किसके लिए है? ममत्व तुम में रहेगा। प्रश्न यह है कि तुम्हारा ममत्व किसके लिए है? राग द्वेष भी रहेंगे, भय भी रहेगा, लोभ भी रहेगा। किसका लोभ कर रहे हो? मुक्ति का लोभ कर रहे हो या बंधनों का? और मुक्ति का तरीका ही यही है। तुम्हारे पास जो कुछ भी है उसको बांध दो मुक्ति से। क्योंकि और कोई विकल्प है कहां तुम्हारे पास? तुम तो जो हो वो हो ही। तुम अपना शरीर परिवर्तित नहीं कर सकते। तो अपनी वृत्तियों की हत्या नहीं करनी है। उनको सत्य का अनुगामी बना देना है।
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आचार्य प्रशांत: देखो तुम्हारे भीतर जो कुछ भी है वो रहेगा क्योंकि वह प्राकृतिक है। व्यक्ति ही प्राकृतिक है। तो प्रश्न यह नहीं होना चाहिए अध्यात्म में कि तुम्हारे पास जो कुछ है उसको मिटा कैसे दें? और हमारे पास क्या होता है? जन्म से ही हमारी वृत्तियां होती हैं। काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ, भय इत्यादि यही सब होता है। तो यह प्रश्न नहीं होना चाहिए इसको मिटा कैसे दें?
प्रश्न यह होना चाहिए कि इसको हम किसी उदात्य लक्ष्य को समर्पित कैसे कर दें? यह प्रश्न होना चाहिए। देवताओं में और दैत्यों में यही अंतर है ना। शक्ति देवताओं के पास भी है, दैत्यों के पास भी है। गुण देवताओं के पास भी है, दैत्यों के पास भी है। पर दैत्य उन गुणों को समर्पित करने को तैयार नहीं है। किनको समर्पित? सत्य को ऊंचाई को।
तो इसलिए तुम पाओगे कि श्री दुर्गा सप्तशती में भी और तमाम अन्य पौराणिक कथाओं में भी क्रोध का भरपूर स्थान है और क्रोध दोनों तरह का। अभी कथा आगे बढ़ेगी तो तुम देखोगे कि देवी भी क्रोध से भरी हुई हैं उनकी आंखें अंगारे जैसी लाल है और दानव भी क्रोध में भरे हुए हैं। महिषासुर भैंसे का रूप लेकर के फंकार रहा है। अपने खुरों के आघात से धरती कपाई दे रहा है। एकदम वो भी क्रोध उन्मत्त है। क्रोध क्रोध में अंतर है।







