आचार्य प्रशांत: देखो तुम्हारे भीतर जो कुछ भी है वो रहेगा क्योंकि वह प्राकृतिक है। व्यक्ति ही प्राकृतिक है। तो प्रश्न यह नहीं होना चाहिए अध्यात्म में कि तुम्हारे पास जो कुछ है उसको मिटा कैसे दें? और हमारे पास क्या होता है? जन्म से ही हमारी वृत्तियां होती हैं। काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ, भय इत्यादि यही सब होता है। तो यह प्रश्न नहीं होना चाहिए इसको मिटा कैसे दें?
प्रश्न यह होना चाहिए कि इसको हम किसी उदात्य लक्ष्य को समर्पित कैसे कर दें? यह प्रश्न होना चाहिए। देवताओं में और दैत्यों में यही अंतर है ना। शक्ति देवताओं के पास भी है, दैत्यों के पास भी है। गुण देवताओं के पास भी है, दैत्यों के पास भी है। पर दैत्य उन गुणों को समर्पित करने को तैयार नहीं है। किनको समर्पित? सत्य को ऊंचाई को।
तो इसलिए तुम पाओगे कि श्री दुर्गा सप्तशती में भी और तमाम अन्य पौराणिक कथाओं में भी क्रोध का भरपूर स्थान है और क्रोध दोनों तरह का। अभी कथा आगे बढ़ेगी तो तुम देखोगे कि देवी भी क्रोध से भरी हुई हैं उनकी आंखें अंगारे जैसी लाल है और दानव भी क्रोध में भरे हुए हैं। महिषासुर भैंसे का रूप लेकर के फंकार रहा है। अपने खुरों के आघात से धरती कपाई दे रहा है। एकदम वो भी क्रोध उन्मत्त है। क्रोध क्रोध में अंतर है।
एक क्रोध वह है जो तुम करते हो सत्य की रक्षा के लिए। और एक क्रोध है जो तुम करते हो सत्य पर आघात के लिए। अध्याय आरंभ होता है और आरंभ में ही शिव और विष्णु दोनों कुपित है, तो क्रोध अच्छा है या बुरा? यह प्रश्न ही बहुत काम का नहीं है क्योंकि क्रोध तो रहेगा। प्रश्न यह है कि तुम्हारा क्रोध किसको समर्पित है? यह प्रश्न व्यवहारिक है, विचारणीय है। तुम्हारा क्रोध किसके लिए है? ममत्व तुम में रहेगा। प्रश्न यह है कि तुम्हारा ममत्व किसके लिए है? राग द्वेष भी रहेंगे, भय भी रहेगा, लोभ भी रहेगा। किसका लोभ कर रहे हो? मुक्ति का लोभ कर रहे हो या बंधनों का? और मुक्ति का तरीका ही यही है। तुम्हारे पास जो कुछ भी है उसको बांध दो मुक्ति से। क्योंकि और कोई विकल्प है कहां तुम्हारे पास? तुम तो जो हो वो हो ही। तुम अपना शरीर परिवर्तित नहीं कर सकते।
तो अपनी वृत्तियों की हत्या नहीं करनी है। उनको सत्य का अनुगामी बना देना है। तुम जो भी कुछ कर सकते हो उसी दृष्टि से करो। चिड़िया उड़कर जा सकती है तो उड़कर जाए। उसे अपने पंख नहीं काट देने हैं। उसे अपने पंखों का प्रयोग करना है सत्य की दिशा के लिए। कछुआ धीरे-धीरे चल के रेंग के जाएगा। वो धीरे-धीरे जाए। विकल्प क्या है उसके? के पास उड़ नहीं सकता, दौड़ नहीं सकता तो क्या करेगा? वो धीरे-धीरे जाएगा। बस दिशा ठीक होनी चाहिए। तो एक ही दिशा में जाओ जो दिशा है तुम्हारी। समझ में आ रही है बात?
शेर के पास ताकत है। तो अपनी शक्ति का उपयोग करते हुए जाए कि रास्ते में जो भी कोई जीव मुझे रोकेगा मैं उसको मिटा दूंगा मेरे पास शक्ति है। देवी का जो सिंह है दूसरे चरित्र में वो लगातार कुपित है। बार-बार उसका वर्णन ही ऐसे आता है कि वह अपना सर हिला रहा है अपनी गर्दन के बाल हिला रहा है। और दैत्यों के चिथड़े करता जा रहा है, धज्जियां उड़ाता जा रहा है। हमारे भीतर भी सिंह जैसा ही पशु है। हमें उसका कोप चाहिए। पर हमें उसका कोप वैसे ही चाहिए जैसे देवी के सिंह का था। देवी के अभियान में सम्मिलित हीन होने हेतु कुपित है वह। वो कह रहा है देवी जो लड़ाई लड़ रही है वह मैं देवी के साथ लडूंगा। और देवी जिस पर रुष्ट है मैं भी उसी पर कुपित हूं। तो कोप है हम में, सब में होता है। उस कोप को मारने की जरूरत नहीं है। उस कोप को सही दिशा देने की जरूरत है। समझ में आ रही है बात?
कोप की दिशा यह नहीं होनी चाहिए कि तुम्हारे अहंकार की रक्षा करें। 99% क्रोध जो हम करते हैं वह व्यर्थ है। वह नहीं किया जाना चाहिए। क्यों? क्योंकि हमें क्रोध उठता ही तब है जब हमारे रेत के पुतले में कोई टूटफूट होती है तो हमें बड़ी तकलीफ होती है और एकदम हम क्रोधित हो जाते हैं। है ना? 99% क्रोध हमारा व्यर्थ है। शायद 99.99% क्रोध हमारा व्यर्थ है। तो इस अर्थ में यह कहा जा सकता है कि क्रोध मत करो। कौन सा क्रोध मत करो जो तुम्हारे अहंकार की रक्षा के लिए उठता है वह क्रोध मत करो। क्रोध करना निश्चित रूप से बुरा है। क्यों? क्योंकि अधिकांशत हमारा क्रोध एक व्यर्थ प्रयोजन के लिए होता है। पर एक दूसरा क्रोध भी हो सकता है। और उसका हमको धर्म ग्रंथों में बार-बार दर्शन होता है। समझ में आ रही है बात?