हीन भावना बहुत तगड़ी ज़िद होती है, जो आपका ही चुनाव होता है। हीनता नहीं होती है, स्वार्थ होते हैं। जो भी चीज़ आपको सता रही है, उसमें आपकी सहमति शामिल है। देखिए, आपका स्वार्थ कहाँ है? ज़रूर कोई फ़ायदा है हीन बने रहने में, इसलिए तुम हीन बने हुए हो। आपकी हर बेबसी, हर कमज़ोरी में आपका लालच मौजूद है। तुम अनंत हो, और जो अनंत है, वो किसी से छोटा हो सकता है क्या?
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मैं पश्चिम बंगाल से हूँ। मैं खुद को कमज़ोर, हीन सोचती हूँ ज़्यादातर समय। बहुत दिनों से हीन भावना से ग्रस्त हूँ। दूसरों से तुलना करने की वज़ह से ऐसा हो रहा है कि क्या हो रहा है मुझे कुछ समझ में नहीं आता। डिप्रेशन भी होता है, ईमानदारी की कमी भी दिखाई देती है। ‘मैं नहीं कर पाऊँगी’ ऐसा बोलकर के कामों से अपने आप को बचाना भी चाहती हूँ। मेरा मूल प्रश्न ये है — हीन भावना वास्तव में क्या है? और कैसे इससे बाहर आ सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: जिद्द, तगड़ी जिद्द, बहुत तगड़ी जिद्द। और कुछ नहीं है हीन भावना, बहुत-बहुत तगड़ी जिद्द। समझ रहे हो बात को? चलो, दिखाएँ क्या है हीन भावना।
(श्रोतागण हँसते हैं)
आ जाओ बेटा, आ जाओ, आओ, इधर आओ बगल में (संस्था के सदस्य को बुलाते हैं)। मोटे तौर पर कद दोनों का लगभग एक ही बराबर है, उन्नीस-बीस कुछ होगा। अब इनकी परंपरा है, श्रेष्ठ मानव वो होता है जो चौपाया होता है। चौपाया हो जाओ, बेटा! ऐसे (चौपाये होने का इशारा करते हुए) हाथ पर जान, घुटने नीचे रखकर ऐसे हो जाओ, हाँ। (नीचे दोनों हाथ और घुटने टेककर बैठाते हुए) ठीक है?




