आचार्य प्रशांत: वह प्रजापतियों की सृष्टि करके सब पर अपना आधिपत्य रखता है। जैसे सूरज अकेले ही सबको प्रकाशित करते हैं। प्रकाश के स्रोत दो नहीं, प्रकाश के दो नहीं स्रोत हैं, एक है। वैसे ही वह प्रकाश स्वरुप है और वर्णीय है। वर्णीय माने उसी को चुनना, उसी का वरण करना, वही वर है मात्र। वही वर है मात्र। विवाह में दूल्हे को वर कहते हैं। ये बड़ी महत्वपूर्ण बात है। किसको वर लिया आपने?
ऋषि बताते-बताते थक गए। उसके अलावा किसी को वर मत लेना। उसके अलावा किसी को वर मत लेना। द्रौपदी के चीर हरण का दृश्य था। उस पर चर्चा हो रही थी महाभारत पर जब अपनी श्रृंखला चली थी एक या दो साल पहले। तो इसमें किसी ने पूछा कि आध्यात्मिक अर्थ में यहाँ क्या हो रहा है? द्रौपदी है, कौरवों की पूरी सभा है, पति हैं उसके वो भी एक नहीं पाँच, सब सामर्थ्यशाली और वो बैठे हुए हैं बेबस। फिर कृष्ण आते हैं वो ही मदद करते हैं।
मैंने कहा बात बहुत सीधी है। तुम एक नहीं पाँच वर कर लो। कोई तुम्हें बचा नहीं सकता। वरणीय मात्र कृष्ण ही हैं। तुम्हारा एक सांसारिक पति तुम्हे क्या बचायेगा, द्रौपदी के पाँच नहीं बचा पाए उसको। और पति से अर्थ यही नहीं कि वो जो देखिए, पति हसबैंड नहीं होता, पति माने स्वामी, जिस किसी को तुम अपना स्वामी मान रहे हो, जिस किसी को भी तुमने ये आस्था रख दी है कि ये मुझे बचाएगा। तो उस अर्थ में स्वामी पिता भी हो सकता है, दोस्त भी हो सकता है, पत्नी भी हो सकती है, पत्नी भी पति हो सकती है। अगर आपकी आस्था ये है की मेरी पत्नी मुझे बचाएगी वह मेरे स्वामिनी है। अगर पत्नी स्वामिनी है तो पत्नी, पति हो गयी उस अर्थ में। तो पति का सम्बन्ध किसी लिंग से मत मान लीजिएगा। जिस किसी पर भी आपने ये भरोसा टिका दिया कि ये मुझे बचा लेगा। इसके भरोसे मेरी नैया पार हो जाएगी। वही कौन हो गया? पति।
तो चीर हरण का दृश्य यही था कि द्रौपदी सही को वरना सीख। क्या इन पाँच के भरोसे बैठी हो? होंगे अर्जुन, भीम, ये, वो अभी क्या हो रहा है, क्या हो रहा है? कोई काम आ रहा है? अर्जुन, भीम काम नहीं आये तो लल्लू- चप्पू क्या काम आएँगे जो हम पकड़कर रख लेते हैं। और इनके चक्कर मे हम दूर किससे हो जाते हैं? कृष्ण से। अन्त में द्रौपदी को ज़रा सुध आयी। उसने कहा कि ये कहाँ पाँच नमूने पकड़ रखे हैं मैंने। सीधे नम्बर मिलाया असली को। तो फिर वो आये और उन्होंने कहा चलो मामला निपटाते हैं।







