जहां काम का मतलब सिर्फ़ पैसा और कामनाएँ पूरी करना है, वहाँ बिल्कुल ज़रूरी है कि काम के घंटे सीमित रखे जाएँ। अगर मामला loveless है, तो वर्क-लाइफ बैलेंस का कॉन्सेप्ट बिल्कुल एप्लीकेबल है, और दुनिया की ज़्यादातर आबादी अपने काम से नफरत करती है। सवाल यह है कि तुम्हारा काम एक दिली चीज़ क्यों नहीं हो सकता? काम आशिकी होती है। जो आदमी दिल से जिएगा, उसके काम में भी दिल होगा। उसके एक-एक कदम में दिल दिखाई देगा।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। अभी हाल ही में भारत में एक डिबेट स्टार्ट हो गई है वर्किंग आवर्स को लेकर के। तो सबसे पहले एक साहब थे उन्होंने कहा कि भारतीयों को एक सप्ताह में कम से कम सत्तर घंटे काम करना चाहिए। फिर अभी कल ही मैं देख रहा था, ‘एक और बड़ी कंपनी है, उसके जो चेयरमैन है, उन्होंने अपनी एक इंटरनल मीटिंग में अपने एक एंप्लई को जवाब देते हुए बोला कि तुम तो सैटरडे (शनिवार) को काम करने पर प्रॉब्लम जता रहे हो। मेरा मन होता तो मैं तुमसे संडे को भी काम करवाता। और लोगों को तो नब्बे-नब्बे घंटे प्रति हफ्ता काम करना चाहिए।
और ये बात कहते हुए उन्होंने चाइना का उदाहरण दिया कि मैंने देखा कि चाइना के लोग जो है वो बहुत मेहनती होते हैं और वो मेरी एक चाइनीस प्रोफेशनल से बात हुई थी तो उसने कहा कि हम अमेरिका को पीछे छोड़ देंगे क्योंकि हम लोग तो नब्बे घंटे काम करते हैं और पचास घंटे काम करते हैं।
वो इस चीज पे बात करते-करते फिर एक थोड़ा सेक्सिस्ट रिमार्क भी ले आए थे। वो बोल रहे थे कि तुम घर पे बैठे-बैठे करते भी क्या हो? तुम कब तक अपनी बीवी का शक्ल देखोगे? कब तक बीवी तुम्हारा शक्ल देखेगी? इसलिए सीधे आके काम पर काम करो।
तो मैं आपसे समझना चाह रहा था कि ये वर्किंग आवर्स को लेकर के, मतलब हम कैसे समझें? क्या नंबर दें इसे?




