प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, आपने अतीत से मुक्त होने की बात करी थी, जब मैं देखता हूँ तो लगता है कि अतीत कोई एंटिटी (इकाई) नहीं है – मतलब कि पूरा-का-पूरा ही मैं अतीत हूँ। जैसे जिद्दू कृष्णमूर्ति कहते हैं, यू आर द मेमोरी (आप आपकी याद्दाश्त हैं) समझ आती है बात, लेकिन अतीत अपनेआप आकर हावी हो जाता है।
आचार्य प्रशांत: तो फिर ये बातचीत क्यों कर रहे हो? जो भी कुछ मुझसे जानना चाहते हो वो अपने अतीत से क्यों नहीं पूछ लेते? अगर पूरे-का-पूरा सब अतीत ही है, तो इस सवाल का जवाब भी अतीत से ले लो!
प्र: नहीं, जो मैं हूँ वो अतीत है।
आचार्य: तो अभी कौन बात कर रहा है? अभी भी मैं ही बात कर रहा है न?
प्र: पर मैं दुखी है न!
आचार्य: माने अपनेआप में पूरा नहीं है, सन्तुष्ट नहीं है वो, तभी दुखी है न? तो उसको अच्छे से पता है कि कमी है, ठीक है? जब उसे पता है कि कमी है तो उस कमी वाली चीज़ को क्यों पकड़े हुए है?
अगर तुम सिर्फ़ अतीत का ही एक पिटारा होते, एक बंडल (गठरी) होते, तो अभी मुझसे बात नहीं कर पाते न? अतीत के अलावा भी तुम कुछ हो जो अभी बात कर सकता है। अतीत में कोई चेतना नहीं होती है भाई! तुम एक सचेतन इकाई हो।




