बहुत बदहाल और गई-गुज़री होती है वो ज़िंदगी जिसमें आप पैसा कमाने के लिए वो काम कर रहे होते हो जिसमें प्यार नहीं है। मैं बार-बार कहता हूँ — दो काम बिना प्यार के नहीं करने चाहिए; एक, किसी का साथ और दूसरा, नौकरी। और दुनिया के जितने लोग हैं न और खासकर भारत में, इन सबने पहली बात तो बिना प्यार के साथी चुना और दूसरे बिना बना प्यार की नौकरियाँ कर रहे हैं।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मैं शुरू से पढ़ाई में अच्छा प्रदर्शन को लेकर तत्पर रही हूँ। दसवीं में मैंने टॉप भी किया था। बैडमिंटन में मेरा राष्ट्रीय स्तर का प्रदर्शन था। मुझे मेडिकल की पढ़ाई और बैडमिंटन खेल के प्रति रुझान था। पर दोनों में से कोई भी, मैं आगे जारी नहीं कर सकी।
मुझे बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में प्रवेश मिला और मैंने यूपीएससी की तैयारी का फैसला लिया। लेकिन मुझे डर लगता था कि चयन नहीं हो पाएगा। मैं देश के शीर्ष पाँच केंद्रीय विश्वविद्यालयों में टॉप किया है और अभी मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी में क्लिनिकल साइकोलॉजी में मास्टर्स की पढ़ाई कर रही हूँ। पर मुझे लगता है कि मैंने लक्ष्य को लेकर बड़ी भूल कर दी। कृपया बताएँ कि मैं कैसे निर्णय लूँ।
आचार्य प्रशांत: देखिए, आपका जो पूरा सवाल है न वो दस जगह पर बिखरा हुआ है, वो दसवीं से लेकर अभी तक यहाँ बिखरा, यहाँ बिखरा, यहाँ बिखरा। बात बहुत सीधी है, किसी भी लक्ष्य के लिए मेहनत तो तब होती है न जब अपना और उस लक्ष्य का रिश्ता पता हो। दसवीं के नंबरों पर मत जाइएगा, वो बहुत आसानी से आ जाते हैं। दसवीं के नंबर किसी भी तरीके से जीवन में स्पष्टता का द्योतक नहीं होते हैं। बहुत लोगों के दशवी में एकदम बिना कुछ करे ऐसे ही नंबर आ जाते हैं। बहुत एकदम साधारण किस्म के, बल्कि मेरे जैसे मूर्ख के भी आ गए थे तो वह उसमें कुछ नहीं है।




