काम में आपको रोज़ाना आठ घंटे, दस घंटे बिताने हैं; वो काम अगर ऐसा नहीं है जो आपकी ज़िंदगी को सार्थकता की ओर ले जाता हो, जो आपके माध्यम से दुनिया में एक सही बदलाव लाता हो, तो वो काम आपको खा जाएगा। आप सोच रहे हो कि आप उस काम की रोटी खा रहे हो? नहीं, वो काम आपको रोटी नहीं दे रहा खाने के लिए, वो काम आपको ही धीरे-धीरे करके खा रहा है। बस वो आपको जिस तरीके से खा रहा है वो चीज़ आपको पता नहीं लगती, क्योंकि आपके शरीर पर असर नहीं दिखाई देता; वो आपके मन को खा रहा है, आपकी चेतना को।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपका अभी-अभी एक वीडियो आया है, ‘तरह-तरह के जानवर।‘ उसमें काफ़ी लोग ये सवाल पूछ रहे हैं कि आप बोलते रहते हैं कि सही नौकरी करो, सही नौकरी करो, तो ये सही नौकरी होती क्या है? हमें तो अपना पेट भी पालना होता है, आपने तो बोल दिया, ‘सही नौकरी करो।’ तो हम लोग सही नौकरी कैसे करें और कैसे ढूँढें उसको?
आचार्य प्रशांत: ज़िंदगी के बारे में जो बड़े-से-बड़े भ्रम हमें दे दिए गए हैं, हमारे दिमाग में रहते हैं, उनमें से एक ये है कि नौकरी पेट पालने के लिए होती है; और ये भ्रम भी इसलिए है क्योंकि हम समझते ही नहीं हैं कि हम कौन हैं और आदमी काम क्यों करता है।
देखिए, दुनिया में इतने जीव-जानवर होते हैं, वो सब कुछ-न-कुछ दिन भर करते ही रहते हैं न। उन सबमें आदमी अकेला है जो काम करता है, बाकी सब सिर्फ़ श्रम करते हैं। और वो जो कुछ भी कर रहे होते हैं, चाहे गधा, घोड़ा, खरगोश, जो भी हो, वो अपना पेट पालने के लिए कर रहे होते हैं। तो ये हमारे शरीर की अनिवार्यता है कि पेट पालने के लिए कुछ-न-कुछ तो करना पड़ेगा, उतना जानवर भी करते हैं, ठीक है? उतना काम जानवर भी करते हैं, कि पेट चलाना है तो इधर-उधर दौड़-भाग करेंगे, पत्ती, फल, ये सब इकट्ठा करेंगे, या फिर शिकार करेंगे।




