Inspiring Personalities

इसलिए आज भी महत्त्वपूर्ण हैं गांधी
इसलिए आज भी महत्त्वपूर्ण हैं गांधी
15 min
उनको अब सही लगा कि गलत लगा, पर उनको जैसा भी लगा कि ये ठीक है उस पर उनको अड़ना था। और दुबला-पतला आदमी अड़ा हुआ खड़ा है, ऐसे। दुबला-पतला, वृद्ध व्यक्ति, जल्दी-जल्दी चलने वाला, उसकी ज़िद से यही नहीं कि अंग्रेज घबरा रहे हैं, हिंदुस्तानी भी घबरा रहे हैं। और यही नहीं कि विरोधी घबरा रहे हैं, कि जिन्ना और माउंटबेटन को कुछ लग रहा है और चर्चिल को कुछ लग रहा है। उनकी अपनी पार्टी के लोग भी घबरा रहे हैं कि ये कहीं फिर से न ज़िद पर बैठ जाएँ।
गाँधी: महात्मा, राष्ट्रपिता या शातिर राजनेता
गाँधी: महात्मा, राष्ट्रपिता या शातिर राजनेता
28 min
गाँधी को महात्मा, गाँधी ने स्वयं नहीं बनाया इस देश ने बनाया। लोगों को अच्छा लगता था, एकदम दो हड्डी का आदमी चला आ रहा है, एक गाँव से दूसरे गाँव भाग रहा है, उपदेश-यात्रा करे जा रहा है। दोष देना है तो देशवासियों को दो। एक यदि व्यक्ति थे जिनसे जिन्ना घबराते थे, उसका नाम था गाँधी। अंग्रेज़ों को ज़बरदस्त चोट दी थी गाँधी ने। कौन कह रहा है कि गाँधी को तुम भगवान का दर्जा दे दो, लेकिन इंसान को इंसान की तरह तो देखो। वैसा कोई आदमी आज भी खड़ा हो जाए न, अच्छा लगेगा। आसान नहीं होता गाँधी बनना।
Gandhi: An Earthly Journey, Not a Divine Destination
Gandhi: An Earthly Journey, Not a Divine Destination
7 min
Gandhi did not descend from the sky; he rose from the earth. He undertook a laborious and long journey from man to Mahatma. And he rightly said that his life is his message — what was possible for him is possible for all. When someone devotedly moves forward, challenging their past, their tendencies, and their limitations, their presence infuses a unique consciousness into the entire world.
गाँधी जयंती: किससे लड़ें, कहाँ है दुश्मन?
गाँधी जयंती: किससे लड़ें, कहाँ है दुश्मन?
36 min
गाँधी जी ने वास्तव में अंदर वाले दुश्मन से लोहा लिया था। बहुत साधारण कद-काठी के थे, कोई ऐसा ऐब नहीं जो साधारण आदमी में होता हो और उनमें ना हो, पर ये महात्मा कहलाए, गीता को माँ बोला। एक कमज़ोर मन का व्यक्ति इतना दृढ़ बन गया कि जब वह उपवास करने बैठते थे, तो भारत ही नहीं पूरी दुनिया काँप जाती थी और चर्चिल के पसीने छूट जाते थे। वह उपवास पर बैठ गए तो बैठ गए और लोगों को उनकी बात सुननी पड़ती थी। औसत स्तर से उठकर इतना मजबूत बन जाना, मेरे ख्याल से सबको उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए।
[गाँधी जयंती विशेष] मत मानों उनके आदर्शों को, लेकिन उनको एक बार ठीक से पढ़ लो
[गाँधी जयंती विशेष] मत मानों उनके आदर्शों को, लेकिन उनको एक बार ठीक से पढ़ लो
7 min

मैनचेस्टर से जाकर पूछो कि गांधी का वहां क्या नाम था और क्या छवि थी। गांधी कहते थे कि यह सब व्यापारी हैं, सभी पैसे के भूखे हैं। इन्हें भारत से जो पैसा मिल रहा है, भारत को लूट-लूट कर के लंदन मोटा रहा है। मैं भारत की लूट रुकवाऊंगा।

आज भगत सिंह क्यों नहीं पैदा होते?
आज भगत सिंह क्यों नहीं पैदा होते?
39 min
एक क्रांतिकारी को उसकी वीरता के लिए जितना श्रेय मिलता है, उससे ज़्यादा श्रेय उसकी माँ को मिलना चाहिए। माँ चाहिए, जो बताए बेटे को कि तुम वो हो, जो शरीर के जाने के बाद भी नहीं मर सकता; तो मौत से घबराना कैसा? "न हन्यते हन्यमाने शरीरे।" भारत को अगर वीरों का देश बनाना है तो सर्वप्रथम हमने माँ का जो विकृत आदर्श खड़ा कर दिया है, इसको ढहाना पड़ेगा।
डर और मुक्ति || आचार्य प्रशांत, मारिया रिल्के पर (2013)
डर और मुक्ति || आचार्य प्रशांत, मारिया रिल्के पर (2013)
19 min
एक से मुक्त होओगे तो दूसरे के पास चले जाओगे। ये कोई मुक्ति नहीं है, एक से मुक्त होकर के दूसरे की ओर आकर्षित हो जाना कोई मुक्ति नहीं है। और जब भी एक से मुक्ति की बात करोगे, तो दूसरे की ओर आकर्षित होओगे ही होओगे, क्योंकि तुम्हारी मुक्ति किसी संदर्भ में है।
आइन रैंड की द फाउन्टेनहेड पर || आचार्य प्रशांत (2019)
आइन रैंड की द फाउन्टेनहेड पर || आचार्य प्रशांत (2019)
3 min

प्रश्नकर्ता: बहुत से लोग हैं जो फाउंटेनहेड पढ़कर जीवन में कोई बदलाव नहीं ला पाते हैं। और दूसरी तरफ़ बहुत ऐसे भी लोग हैं जो इस पुस्तक को पढ़ने के बाद विद्युतीकृत हो जाते हैं। आचार्य जी मैं दूसरे लोगों की श्रेणी में आने के लिए क्या कर सकता हूँ?

Why Is Gandhi Ji Being Abused by Indians?
Why Is Gandhi Ji Being Abused by Indians?
24 min
Those abusing Gandhi Ji are least interested in him—they try to achieve something, and Gandhi Ji stands in the way. If one wants to create a society that is highly illiberal and deeply fractured on communal lines, then the symbol of liberalism and communal harmony has to be abused. Gandhi Ji is not just a person but a thought. Gandhi Ji was killed once, and that didn't suffice. Now, he’s being killed in abusive ways, yet some things cannot be killed.
क्रांतिकारी भगत सिंह और आज के युवा
क्रांतिकारी भगत सिंह और आज के युवा
19 min
जिस उम्र में हम अपने-आपको दुधमुँहा बच्चा समझते हैं, उस उम्र में भगत सिंह फाँसी पर चढ़ गए थे। और यह कोई किशोरावस्था का साधारण उद्वेग नहीं था; भगत सिंह का ज्ञान गहरा था। जब कोई आम युवा जीवन की चकाचौंध और रंगीनियों के ख़्वाब देखता है, उस समय भगत सिंह अपने जीवन की निजी माँगों से बहुत आगे जा चुके थे। जवान हो, तो जीने का एक ही तरीक़ा है - किसी बहुत ऊँचे उद्देश्य को समर्पित हो जाओ। नहीं तो समस्याएँ, वासनाएँ, अतृप्तियाँ, समय की बर्बादी और फिर निराशाएँ घेरेंगी।
भगत सिंह: एक निष्काम कर्मयोगी
भगत सिंह: एक निष्काम कर्मयोगी
26 min
ये भगत सिंह हैं, जिन्होंने मुक़दमे और फाँसी की सज़ा के बाद कहा, 'मैं कोई खास नहीं हूँ; मेरे सीमित जीवन का मूल्य ही कितना है? मेरा जीवन शायद देश की उतनी सेवा न कर पाए, जितनी मेरी मृत्यु करेगी।' उनके लिए उनका ध्येय सर्वोपरि था—उच्च और महान। उन्होंने कहा, 'अगर मेरे जैसे पाँच सौ लोग भी इस ध्येय के लिए बलिदान हो जाएँ, तो क्या फ़र्क पड़ता है?' यह मात्र एक निष्काम कर्मयोगी का ही वक्तव्य हो सकता है।
A Life Like Bhagat Singh's
A Life Like Bhagat Singh's
5 min
Bhagat Singh was just twenty-three when he laid down his life, yet he remains immortal, while those who lived up to ninety years are just the dust of time. Who cares for them? That's the difference. He had no time for trivial things. Even on the eve of his hanging, he was reading the Bhagavad Gita, and that copy is still preserved. A voracious reader, well-read at a young age, he never wasted time. Does such a life not excite you?
सीखना चाहो तो बहुत सीख सकते हो
सीखना चाहो तो बहुत सीख सकते हो
4 min

आचार्य प्रशांत: खास बात समझो तो उनमें क्या है? देखो, किसी की सीधे-सीधे निन्दा कर देना बहुत आसान होता है। और किसी को देवता बनाकर के उसकी पूजा करने लगना, ये भी आसान ही होता है। पर इंसान को इंसान की तरह देखना और उसका सही मूल्यांकन करना वो ज़रूरी

Maslow’s Hierarchy of Needs Is Flawed
Maslow’s Hierarchy of Needs Is Flawed
6 min
The way Maslow constructed his pyramid is good, but not very exact. The ladder goes like “Food, security, self-esteem, and only then self-actualization.” No, that is not how it actually is. Self-actualization is not the top of the pyramid; it is the foundation of everything that you do; it is the foundation of your activity even when you are fulfilling your lower needs. Whatever you do, your entire universe, all your deeds, thoughts, purposes, motivations—all arises for the sake of actualization.
Why Aren't You Free?
Why Aren't You Free?
15 min
If freedom is important to you, you will secure it, you will get it. Do you love being free? Are you really a free bird? No, you had accepted slavery long back. And then you complain, and then you put up miserable faces, that won’t do. These faces are masks. The one who wants it, gets it.
Ancient Spiritual Practices Relevant Today?
Ancient Spiritual Practices Relevant Today?
16 min
Practices do not determine the core of spirituality; consciousness does. If someone is feeding you practices in the name of spirituality, then that fellow is either ignorant or cunning or both, which is actually the same thing.
चंद्रशेखर आज़ाद
चंद्रशेखर आज़ाद
5 min

🔥 "मेरा नाम 'आज़ाद' है, बाप का नाम 'स्वाधीनता' है और मेरा घर है 'जेल'” 🔥

भगत सिंह ने जब अपना घर छोड़ा, तो चिट्ठी के अंत में लिखा, "मेरी शादी की चिंता मत करना, मेरी दुल्हन आज़ादी है"।

एक ओर, जहाँ दुनिया को ये मुद्दा बड़ा गंभीर

War is what is normal || On Albert Camus (2017)
War is what is normal || On Albert Camus (2017)
4 min

“There’s always been war, But people quickly get accustomed to peace. So they think it’s normal. No, war is what’s normal.”

~ Albert Camus

Questioner: Acharya Ji, which ‘war’ is Albert Camus referring to?

Acharya Prashant: The questioner has asked that Albert Camus has said that ‘war’ is what is

Why is freedom from desire so very extolled? || On Vivekchudamani (2020)
Why is freedom from desire so very extolled? || On Vivekchudamani (2020)
3 min

Questioner: In The Fountainhead it is said, “I take the only desire one can really permit oneself. Freedom, Alvah, freedom. To ask nothing. To expect nothing. To depend on nothing.”

In the above lines, Ayn Rand has said that freedom is to not expect and depend on the desired outcome.

Bhagat Singh || Neem Candies
Bhagat Singh || Neem Candies
1 min

When his mother asked him, “Why don’t you get married?” Bhagat Singh replied, “I am already married, and her name is Freedom.”

Now, it behooves a Bhagat Singh to not get married to a woman because he has committed himself to freedom, but to every Tom, Dick and Harry it

The act of real rebellion || Acharya Prashant, on Albert Camus (2017)
The act of real rebellion || Acharya Prashant, on Albert Camus (2017)
1 min
तनाव आलस को आमन्त्रण है || आचार्य प्रशांत (2017)
तनाव आलस को आमन्त्रण है || आचार्य प्रशांत (2017)
37 min

प्रश्नकर्ता: न आलस है, न उठा हुआ है, न सोया हुआ, कुछ ऐसा मतलब एक कंफ्यूजन (संशय) है कि क्या ये, ये क्या है? नींद भी है उसमें हल्की सी, जागृति भी है, अब जागृति का तो पता नहीं लेकिन कुछ है, विचार भी नहीं है लेकिन कुछ है। लेकिन

जब लगे कि नाइंसाफ़ी हुई है आपके साथ || आचार्य प्रशांत (2023)
जब लगे कि नाइंसाफ़ी हुई है आपके साथ || आचार्य प्रशांत (2023)
46 min

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मेरा पहला प्रश्न ये है, हमनें चोट के बारे में बात कही, तो मैं अपने अनुभव में जो देखती हूँ मुझे ऐसा लगता है कि जब भी मुझे चोट लगती है उसके साथ एक और भाव जो साथ में ही उठता है वो होता है कि

अगर आज होते भगत सिंह || आचार्य प्रशांत (2020)
अगर आज होते भगत सिंह || आचार्य प्रशांत (2020)
11 min

आचार्य प्रशांत: समझ में नहीं आ रहा क्या कि जब भगत सिंह कहते थे कि वो नास्तिक हैं तो वो वास्तव में परंपरागत धर्म, सड़े-गले धर्म, संस्थागत धर्म को नकार रहे थे। नहीं तो एक ऊँचे आदर्श के लिए शरीर की आहुति दे देने से बड़ा धार्मिक काम क्या होगा?

भारत का सबसे बड़ा दुश्मन कौन? || आचार्य प्रशांत, बातचीत (2020)
भारत का सबसे बड़ा दुश्मन कौन? || आचार्य प्रशांत, बातचीत (2020)
15 min

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी कल हमने एक वीडियो पब्लिश किया था भगत सिंह के ऊपर, कल जन्मदिन भी था उनका, तो थोड़ा फिर मैंने रिसर्च( शोध) किया इंटरनेट पर उनके बारे में; फिर आपने एक आर्टिकल (लेख) भी फॉरवर्ड किया थाl तो कल मेरे को पहली बार पता लगा कि

बस खाली बैठे हो? || आचार्य प्रशांत के नीम लड्डू
बस खाली बैठे हो? || आचार्य प्रशांत के नीम लड्डू
4 min

आचार्य प्रशांत: मुझे बिलकुल नहीं समझ आता कि छब्बीस, अट्ठाईस, तीस साल का कोई जवान लड़का या लड़की घर पर बैठकर कैसे खा सकता है, मेरे लिए ये एक भयानक बात है। मैं तो भगत सिंह को जानता हूँ, मैं राजगुरु को जानता हूँ, जो बाईस की उम्र में ही

ताकत चाहिए, आज़ादी चाहिए? || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश में (2021)
ताकत चाहिए, आज़ादी चाहिए? || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश में (2021)
10 min

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मेरा प्रश्न श्रीमद्भगवद्गीता से है। श्रीकृष्ण कर्मयोग की जब बात करते हैं, तो वो कहते हैं, "निधनं श्रेय:", तो उसका सजीव उदाहरण अगर मैंने कहीं पढ़ा है, या इतिहास में देखा जाए, तो शहीद-ए-आज़म भगतसिंह मुझे उसका बहुत बड़ा उदाहरण दिखते हैं।

तो आज के युवा

रिश्ते और भावनाएँ || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)
रिश्ते और भावनाएँ || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)
25 min

प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी, मैं आपको 2014 से लगभग सुन रही हूँ। उस समय बहुत छोटे-छोटे ग्रुप में आप शिक्षा दिया करते थे। तो अचानक से एक दिन वीडियो पॉप-अप हुआ — एंड आई वॉज लिसनिंग (और मैं सुन रही थी) स्वामी सर्व प्रियानंद हावर्ड स्कूल ऑफ डिविनिटी, वहाँ

उनके लिए, जिन्हें ऊँची ज़िन्दगी चाहिए || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश (2022)
उनके लिए, जिन्हें ऊँची ज़िन्दगी चाहिए || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश (2022)
14 min

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। मैंने नवम्बर वाला शिविर अटेंड किया था। वहाँ मैंने आपसे एक प्रश्न पूछा था विचारों को लेकर। और आपने दो चीज़ें बताईं थीकि एक तो ध्येय आपका सही होना चाहिए और निकटता होनी चाहिए उससे| एक आपने सूत्र भी दिया था कि ध्येय से प्रेम को

नरगिस मोहम्मदी - जीवन वृतांत
नरगिस मोहम्मदी - जीवन वृतांत
3 min

पिछले वर्ष ईरान में 22 वर्षीया 'माशा अमीनी' की ईरानी पुलिस द्वारा हत्या हुई। पूरी दुनिया ने विरोध जताया। माशा ओमिनी का जुर्म क्या था? उसने हिजाब वैसे नहीं पहना था जैसा ईरानी सरकार का आदेश था।

इस बर्बर हत्या के बाद ईरान की सड़कों पर हज़ारों महिलाओं की

आचार्य प्रशांत, आइन रैंड पर (2013)
आचार्य प्रशांत, आइन रैंड पर (2013)
5 min

Man’s basic vice, the source of all his evils, is the act of unfocusing his mind, the suspension of his consciousness, which is not blindness, but the refusal to see, not ignorance, but the refusal to know. Irrationality is the rejection of man’s means of survival and, therefore, a commitment

भगत सिंह - जीवन वृतांत
भगत सिंह - जीवन वृतांत
3 min

भगत सिंह कहते थे "बहरे कानों तक अपनी आवाज़ पहुँचाने के लिए अक्सर धमाकों की ज़रूरत पड़ती है।"

लेकिन उनको कहाँ पता था कि लोगों की स्मृति इतनी कमज़ोर है कि उनके जाने के बाद वे सिर्फ़ उनका 'धमाका' ही याद रखेंगे। और उनको भूल जाएँगे, उनके

धर्म को नशा क्यों कहा गया है? || आचार्य प्रशांत (2015)
धर्म को नशा क्यों कहा गया है? || आचार्य प्रशांत (2015)
3 min

आचार्य प्रशांत: मार्क्स ने कहा था “रिलीजन इज़ द ओपियम ऑफ़ द मासेज़ ”। समझ में आ रहा है क्यों कहा था? क्यों कहा होगा? क्यों कहा होगा? ओपियम माने? नशा, गाँजा। क्यों कहा होगा?

प्रश्नकर्ता: सर, मास फिनोमेना नहीं।

प्र२: सर, लगता है कि जानते नहीं हैं।

आचार्य:

धर्म नशा कैसे? || आचार्य प्रशांत, कार्ल मार्क्स पर (2013)
धर्म नशा कैसे? || आचार्य प्रशांत, कार्ल मार्क्स पर (2013)
1 min

प्रसंग:

धर्म का सही अर्थ क्या है? धर्म क्या है? क्या होश में जीना ही एक मात्र धर्म है? धर्म की प्रासंगिकता क्या है? इंसान को धर्म की आवश्यकता क्यों है? आज के मानव के लिए सच्चे अर्थों में धार्मिक होने के क्या मायने हैं? धर्म को कैसे समझें? कार्ल

सबसे शक्तिशाली प्रार्थना कैसी? || आचार्य प्रशांत, माइस्टर एकहार्ट पर (2013)
सबसे शक्तिशाली प्रार्थना कैसी? || आचार्य प्रशांत, माइस्टर एकहार्ट पर (2013)
1 min

तेरहवीं शताब्दी के जर्मनी के प्रसिद्द दार्शनिक - माइस्टर एकहार्ट द्वारा प्रार्थना से सम्बंधित उक्तियों पर आचार्य प्रशांत जी प्रकाश डालते हुए :

The most powerful prayer, one well nigh omnipotent, and the worthiest work of all is the outcome of a quiet mind. The quieter it is the more

श्री ईश्वरचन्द्र विद्यासागर - जीवन वृतांत
श्री ईश्वरचन्द्र विद्यासागर - जीवन वृतांत
4 min

"मुझे आश्चर्य होता है ये देखकर कि कैसे भगवान ने चार करोड़ बंगालियों को बनाते हुए, एक आदमी को भी जन्म दिया।"

जिस 'आदमी' की बात यहाँ गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर कर रहे हैं, उनके लिए एक बार गांधी जी ने कहा था,

"विद्यासागर की उपाधि उन्हें उनके ज्ञान के लिए

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प्रश्न: आपने कहा कि आज के जितने भी लिबरल चिंतक इत्यादि हैं, वे कोई भी पराभौतिक हस्ती को पूर्णतया नकार देते हैं, और कहते हैं - "जो भी है वह यहीं आँखों के सामने है।" भगत सिंह ने भी कहा, "दुनिया में ईश्वर नाम की कोई चीज़ नहीं है," पेरियार

वासना निर्बल और निराधार क्यों? || आचार्य प्रशांत, रवीन्द्रनाथ टैगोर पर (2018)
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तुम मुझे रोज़मर्रा की निर्बल और निराधार वासना से बचते रहने की शक्ति देते रहो।

~ गीतांजलि

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, रवीन्द्रनाथ टैगोर, वासना को निर्बल और निराधार क्यों कह रहे हैं?

आचार्य प्रशांत: वासना को रवीन्द्रनाथ निर्बल इसीलिए कह रहे हैं, क्योंकि वासना में बल होता तो वासना उसको पा

बंगाल चुनाव: मार्क्सवाद क्यों टिक नहीं पाया?
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बंगाल चुनाव सिर्फ़ सत्ता का संघर्ष नहीं, एक विचारधारा की थकान का भी संकेत हैं। मार्क्सवाद ने मनुष्य को वर्गों में बाँटकर यह मान लिया कि उसकी चेतना जन्म और परिस्थितियों से तय होती है। लेकिन इतिहास बार-बार दिखाता है कि इंसान कठपुतली नहीं है। अगर चेतना सिर्फ़ वर्ग से तय होती, तो स्वयं मार्क्स, विवेकानंद, कबीर या राजा राममोहन राय जैसे लोग अपने ही वर्ग के विरुद्ध खड़े कैसे होते?
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TCS जैसे मामलों पर पूरा देश कुछ दिनों तक हैरान होता है, लेकिन क्या सच में ये घटनाएँ नई हैं! कार्यस्थलों पर शोषण, करियर के नाम पर चुप्पी, धर्म को पहचान और सत्ता का हथियार बना देना, और भीतर से डरा हुआ इंसान... ये सब उसी समाज से निकलता है जिसे हमने सामान्य मान लिया है। सवाल सिर्फ़ कानून या सिस्टम का नहीं, इंसान की चेतना और परवरिश का है।
Modern Women, Ancient Conditioning
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14 min
Todays educated and financially independent woman says, “I am free,” yet still feels deeply confined within. Why? Because external freedom alone does not dissolve inner conditioning. The old idea of “womanness” still sits at the center of identity. Real liberation begins when one stops seeing oneself merely as a gendered body and starts living as human consciousness first.
आस्था ज़बरदस्ती जगाओगे क्या?
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आप आस्था खोज रहे हैं, पर क्या आस्था कभी ज़बरदस्ती पैदा होती है? आस्था फूल है, जो सही बीज, सही मिट्टी और सही संगति मिलने पर अपने आप खिलती है। शुरुआत श्रद्धा से नहीं, जिज्ञासा से होती है। सम्मान से नहीं, संदेह से होती है। परखिए, पूछिए, प्रयोग करिए। जहाँ वास्तविक लाभ होगा, वहाँ आस्था अपने आप जन्म लेगी, बनावटी नहीं।
क्या अध्यात्म सिर्फ पढ़े-लिखों के लिए है?
क्या अध्यात्म सिर्फ पढ़े-लिखों के लिए है?
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आप ‘अद्वैत’ को कोई सिद्धांत समझते हैं? जब तक ‘मैं’ है, तब तक दुनिया और दूसरा भी है, यही द्वैत है। अद्वैत तब होता है जब ‘मैं’ ही अपने मिथ्यात्व को देख ले। तब न कहने वाला बचता है, न कहने को कुछ। अद्वैत कोई विचार नहीं, अस्तित्व का अनुभव है। यह अहंकार के समाप्त होने का नाम है, जहाँ सिर्फ़ बोध शेष रह जाता है।
The Evil of Caste System
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11 min
Do you still feel the need to know someone’s caste? That urge itself is the problem. Caste exists neither in the body nor in consciousness; it is a construct of the mind. Society keeps it alive because the ego thrives on division. Until you see a person simply as a person, caste will persist. The real solution lies in understanding and dropping inner ignorance.
विचारों से मुक्ति कैसे मिले?
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9 min
क्या आपके विचार भी आपको सच जैसे लगते हैं? यही भ्रम है। विचार कभी सत्य नहीं होते, वे सिर्फ़ मन की गतिविधि हैं। जब तक “मैं हूँ” का भाव है, तब तक वस्तु, व्यक्ति और विचार रहेंगे ही। उनसे भागना नहीं, उन पर विवेक लगाना है। जो अहंकार को पोषित करे उसे छोड़ो, जो उससे टकराए वही सही दिशा है। यही चुनाव जीवन को बंधन या मुक्ति की ओर ले जाता है।
आरक्षण से नहीं आएगा असली बदलाव
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आप सोचते हैं कि संसद में 33% महिलाएँ आ जाएँगी तो सशक्तिकरण हो जाएगा, लेकिन जब ज़मीन पर ही लड़कियों को स्वतंत्र होने नहीं दिया जाता, तो संसद तक पहुँचेंगी कौन? वही महिलाएँ जो पहले से सत्ता के सहारे हैं। असली बदलाव आरक्षण से नहीं, घर और समाज में महिला की स्वतंत्रता, शिक्षा और आत्मनिर्भरता से आएगा। वरना यह सिर्फ़ एक सजावटी परिवर्तन रह जाएगा।
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21 min
You look at Iran, at revolutions, and ask: can systems really bring freedom? Revolutions keep replacing one system with another, yet the chaos remains. The real question is rarely asked: what within us creates these systems? Real freedom is not political or social; it is inward. Without inner change, every revolution only rotates power, never resolves suffering.
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आस्था और ज़िम्मेदारी अलग नहीं हैं; सच्ची आस्था खुद ज़िम्मेदारी बन जाती है। धर्म के नाम पर प्रकृति का नुकसान और अंधविश्वास, धर्म नहीं बल्कि अज्ञान है। वास्तविक धर्म समझ और सत्य पर आधारित है, न कि परंपराओं की अंधी नकल पर। अंधविश्वास पर प्रश्न उठाना धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि उसे बचाने का काम है।
अहंकार: हर विनाश की जड़
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युद्ध, मुनाफाखोरी और हिंसा का मूल कारण अहंकार है, जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों ही नहीं, स्वयं को भी नष्ट कर सकता है। समाज अपनी बुराई को स्वीकार नहीं करता और खुद को अच्छा मानकर धोखे में जीता है। इसी अज्ञान से शोषण, युद्ध और अन्याय चलते रहते हैं। समाधान केवल आत्म-अवलोकन और भीतर की सच्चाई को ईमानदारी से देखने में है।
मजबूरी नहीं, सौदा है यह
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14 min
मजबूरी एक झूठ है जिसे अहंकार स्वार्थ छुपाने के लिए गढ़ता है। जो दबता है वो किसी सौदे में दब रहा है। माँ-बाप की धमकी, समाज का दबाव - ये सब तभी काम करते हैं जब भीतर डर हो और डर तभी होता है जब कोई चीज़ पानी हो। आज़ादी के लिए आखिरी कीमत भी चुकाने की तैयारी ही असली जीवन है।
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