
Gandhi did not descend from the sky; he rose from the earth. He undertook a laborious and long journey from man to Mahatma. And he rightly said that his life is his message — what was possible for him is possible for all. When someone devotedly moves forward, challenging their past, their tendencies, and their limitations, their presence infuses a unique consciousness into the entire world.



![[गाँधी जयंती विशेष] मत मानों उनके आदर्शों को, लेकिन उनको एक बार ठीक से पढ़ लो](https://cimg.acharyaprashant.org/images/img-8e708d2d-a5df-48cf-92ec-50fbf0d40a8a/30/image.jpg)











Practices do not determine the core of spirituality; consciousness does. If someone is feeding you practices in the name of spirituality, then that fellow is either ignorant or cunning or both, which is actually the same thing.



Questioner: In The Fountainhead it is said, “I take the only desire one can really permit oneself. Freedom, Alvah, freedom. To ask nothing. To expect nothing. To depend on nothing.”





आचार्य प्रशांत: समझ में नहीं आ रहा क्या कि जब भगत सिंह कहते थे कि वो नास्तिक हैं तो वो वास्तव में परंपरागत धर्म, सड़े-गले धर्म, संस्थागत धर्म को नकार रहे थे। नहीं तो एक ऊँचे आदर्श के लिए शरीर की आहुति दे देने से बड़ा धार्मिक काम क्या होगा?



प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मेरा प्रश्न श्रीमद्भगवद्गीता से है। श्रीकृष्ण कर्मयोग की जब बात करते हैं, तो वो कहते हैं, "निधनं श्रेय:", तो उसका सजीव उदाहरण अगर मैंने कहीं पढ़ा है, या इतिहास में देखा जाए, तो शहीद-ए-आज़म भगतसिंह मुझे उसका बहुत बड़ा उदाहरण दिखते हैं।

प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी, मैं आपको 2014 से लगभग सुन रही हूँ। उस समय बहुत छोटे-छोटे ग्रुप में आप शिक्षा दिया करते थे। तो अचानक से एक दिन वीडियो पॉप-अप

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। मैंने नवम्बर वाला शिविर अटेंड किया था। वहाँ मैंने आपसे एक प्रश्न पूछा था विचारों को लेकर। और आपने दो चीज़ें बताईं थीकि एक तो ध्येय आपका सही होना चाहिए और निकटता होनी चाहिए उससे| एक आपने सूत्र भी दिया था कि ध्येय से प्रेम को




आचार्य प्रशांत: मार्क्स ने कहा था “रिलीजन इज़ द ओपियम ऑफ़ द मासेज़ ”। समझ में आ रहा है क्यों कहा था? क्यों कहा होगा? क्यों कहा होगा? ओपियम माने? नशा, गाँजा। क्यों कहा होगा?


तेरहवीं शताब्दी के जर्मनी के प्रसिद्द दार्शनिक - माइस्टर एकहार्ट द्वारा प्रार्थना से सम्बंधित उक्तियों पर आचार्य प्रशांत जी प्रकाश डालते हुए :


उनको अब सही लगा कि गलत लगा, पर उनको जैसा भी लगा कि ये ठीक है उस पर उनको अड़ना था। और दुबला-पतला आदमी अड़ा हुआ खड़ा है, ऐसे। दुबला-पतला, वृद्ध व्यक्ति, जल्दी-जल्दी चलने वाला, उसकी ज़िद से यही नहीं कि अंग्रेज घबरा रहे हैं, हिंदुस्तानी भी घबरा रहे हैं। और यही नहीं कि विरोधी घबरा रहे हैं, कि जिन्ना और माउंटबेटन को कुछ लग रहा है और चर्चिल को कुछ लग रहा है। उनकी अपनी पार्टी के लोग भी घबरा रहे हैं कि ये कहीं फिर से न ज़िद पर बैठ जाएँ।
गाँधी को महात्मा, गाँधी ने स्वयं नहीं बनाया इस देश ने बनाया। लोगों को अच्छा लगता था, एकदम दो हड्डी का आदमी चला आ रहा है, एक गाँव से दूसरे गाँव भाग रहा है, उपदेश-यात्रा करे जा रहा है। दोष देना है तो देशवासियों को दो। एक यदि व्यक्ति थे जिनसे जिन्ना घबराते थे, उसका नाम था गाँधी। अंग्रेज़ों को ज़बरदस्त चोट दी थी गाँधी ने। कौन कह रहा है कि गाँधी को तुम भगवान का दर्जा दे दो, लेकिन इंसान को इंसान की तरह तो देखो। वैसा कोई आदमी आज भी खड़ा हो जाए न, अच्छा लगेगा। आसान नहीं होता गाँधी बनना।
गाँधी जी ने वास्तव में अंदर वाले दुश्मन से लोहा लिया था। बहुत साधारण कद-काठी के थे, कोई ऐसा ऐब नहीं जो साधारण आदमी में होता हो और उनमें ना हो, पर ये महात्मा कहलाए, गीता को माँ बोला। एक कमज़ोर मन का व्यक्ति इतना दृढ़ बन गया कि जब वह उपवास करने बैठते थे, तो भारत ही नहीं पूरी दुनिया काँप जाती थी और चर्चिल के पसीने छूट जाते थे। वह उपवास पर बैठ गए तो बैठ गए और लोगों को उनकी बात सुननी पड़ती थी। औसत स्तर से उठकर इतना मजबूत बन जाना, मेरे ख्याल से सबको उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए।
मैनचेस्टर से जाकर पूछो कि गांधी का वहां क्या नाम था और क्या छवि थी। गांधी कहते थे कि यह सब व्यापारी हैं, सभी पैसे के भूखे हैं। इन्हें भारत से जो पैसा मिल रहा है, भारत को लूट-लूट कर के लंदन मोटा रहा है। मैं भारत की लूट रुकवाऊंगा।…
एक क्रांतिकारी को उसकी वीरता के लिए जितना श्रेय मिलता है, उससे ज़्यादा श्रेय उसकी माँ को मिलना चाहिए। माँ चाहिए, जो बताए बेटे को कि तुम वो हो, जो शरीर के जाने के बाद भी नहीं मर सकता; तो मौत से घबराना कैसा? "न हन्यते हन्यमाने शरीरे।" भारत को अगर वीरों का देश बनाना है तो सर्वप्रथम हमने माँ का जो विकृत आदर्श खड़ा कर दिया है, इसको ढहाना पड़ेगा।
एक से मुक्त होओगे तो दूसरे के पास चले जाओगे। ये कोई मुक्ति नहीं है, एक से मुक्त होकर के दूसरे की ओर आकर्षित हो जाना कोई मुक्ति नहीं है। और जब भी एक से मुक्ति की बात करोगे, तो दूसरे की ओर आकर्षित होओगे ही होओगे, क्योंकि तुम्हारी मुक्ति किसी संदर्भ में है।
प्रश्नकर्ता: बहुत से लोग हैं जो फाउंटेनहेड पढ़कर जीवन में कोई बदलाव नहीं ला पाते हैं। और दूसरी तरफ़ बहुत ऐसे भी लोग हैं जो इस पुस्तक को पढ़ने के बाद विद्युतीकृत हो जाते हैं। आचार्य जी मैं दूसरे लोगों की श्रेणी में आने के लिए क्या कर सकता हूँ?…
Those abusing Gandhi Ji are least interested in him—they try to achieve something, and Gandhi Ji stands in the way. If one wants to create a society that is highly illiberal and deeply fractured on communal lines, then the symbol of liberalism and communal harmony has to be abused. Gandhi Ji is not just a person but a thought. Gandhi Ji was killed once, and that didn't suffice. Now, he’s being killed in abusive ways, yet some things cannot be killed.
जिस उम्र में हम अपने-आपको दुधमुँहा बच्चा समझते हैं, उस उम्र में भगत सिंह फाँसी पर चढ़ गए थे। और यह कोई किशोरावस्था का साधारण उद्वेग नहीं था; भगत सिंह का ज्ञान गहरा था। जब कोई आम युवा जीवन की चकाचौंध और रंगीनियों के ख़्वाब देखता है, उस समय भगत सिंह अपने जीवन की निजी माँगों से बहुत आगे जा चुके थे। जवान हो, तो जीने का एक ही तरीक़ा है - किसी बहुत ऊँचे उद्देश्य को समर्पित हो जाओ। नहीं तो समस्याएँ, वासनाएँ, अतृप्तियाँ, समय की बर्बादी और फिर निराशाएँ घेरेंगी।
ये भगत सिंह हैं, जिन्होंने मुक़दमे और फाँसी की सज़ा के बाद कहा, 'मैं कोई खास नहीं हूँ; मेरे सीमित जीवन का मूल्य ही कितना है? मेरा जीवन शायद देश की उतनी सेवा न कर पाए, जितनी मेरी मृत्यु करेगी।' उनके लिए उनका ध्येय सर्वोपरि था—उच्च और महान। उन्होंने कहा, 'अगर मेरे जैसे पाँच सौ लोग भी इस ध्येय के लिए बलिदान हो जाएँ, तो क्या फ़र्क पड़ता है?' यह मात्र एक निष्काम कर्मयोगी का ही वक्तव्य हो सकता है।
Bhagat Singh was just twenty-three when he laid down his life, yet he remains immortal, while those who lived up to ninety years are just the dust of time. Who cares for them? That's the difference. He had no time for trivial things. Even on the eve of his hanging, he was reading the Bhagavad Gita, and that copy is still preserved. A voracious reader, well-read at a young age, he never wasted time. Does such a life not excite you?
आचार्य प्रशांत: खास बात समझो तो उनमें क्या है? देखो, किसी की सीधे-सीधे निन्दा कर देना बहुत आसान होता है। और किसी को देवता बनाकर के उसकी पूजा करने लगना, ये भी आसान ही होता है। पर इंसान को इंसान की तरह देखना और उसका सही मूल्यांकन करना वो ज़रूरी…
The way Maslow constructed his pyramid is good, but not very exact. The ladder goes like “Food, security, self-esteem, and only then self-actualization.” No, that is not how it actually is. Self-actualization is not the top of the pyramid; it is the foundation of everything that you do; it is the foundation of your activity even when you are fulfilling your lower needs. Whatever you do, your entire universe, all your deeds, thoughts, purposes, motivations—all arises for the sake of actualization.
If freedom is important to you, you will secure it, you will get it. Do you love being free? Are you really a free bird? No, you had accepted slavery long back. And then you complain, and then you put up miserable faces, that won’t do. These faces are masks. The one who wants it, gets it.
भगत सिंह ने जब अपना घर छोड़ा, तो चिट्ठी के अंत में लिखा, "मेरी शादी की चिंता मत करना, मेरी दुल्हन आज़ादी है"।
एक ओर, जहाँ दुनिया को ये मुद्दा बड़ा गंभीर…
“There’s always been war, But people quickly get accustomed to peace. So they think it’s normal. No, war is what’s normal.”
~ Albert Camus
Questioner: Acharya Ji, which ‘war’ is Albert Camus referring to?
Acharya Prashant: The questioner has asked that Albert Camus has said that ‘war’ is what is…
In the above lines, Ayn Rand has said that freedom is to not expect and depend on the desired outcome.…
When his mother asked him, “Why don’t you get married?” Bhagat Singh replied, “I am already married, and her name is Freedom.”
Now, it behooves a Bhagat Singh to not get married to a woman because he has committed himself to freedom, but to every Tom, Dick and Harry it…
प्रश्नकर्ता: न आलस है, न उठा हुआ है, न सोया हुआ, कुछ ऐसा मतलब एक कंफ्यूजन (संशय) है कि क्या ये, ये क्या है? नींद भी है उसमें हल्की सी, जागृति भी है, अब जागृति का तो पता नहीं लेकिन कुछ है, विचार भी नहीं है लेकिन कुछ है। लेकिन…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मेरा पहला प्रश्न ये है, हमनें चोट के बारे में बात कही, तो मैं अपने अनुभव में जो देखती हूँ मुझे ऐसा लगता है कि जब भी मुझे चोट लगती है उसके साथ एक और भाव जो साथ में ही उठता है वो होता है कि…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी कल हमने एक वीडियो पब्लिश किया था भगत सिंह के ऊपर, कल जन्मदिन भी था उनका, तो थोड़ा फिर मैंने रिसर्च( शोध) किया इंटरनेट पर उनके बारे में; फिर आपने एक आर्टिकल (लेख) भी फॉरवर्ड किया थाl तो कल मेरे को पहली बार पता लगा कि…
आचार्य प्रशांत: मुझे बिलकुल नहीं समझ आता कि छब्बीस, अट्ठाईस, तीस साल का कोई जवान लड़का या लड़की घर पर बैठकर कैसे खा सकता है, मेरे लिए ये एक भयानक बात है। मैं तो भगत सिंह को जानता हूँ, मैं राजगुरु को जानता हूँ, जो बाईस की उम्र में ही…
तो आज के युवा…
पिछले वर्ष ईरान में 22 वर्षीया 'माशा अमीनी' की ईरानी पुलिस द्वारा हत्या हुई। पूरी दुनिया ने विरोध जताया। माशा ओमिनी का जुर्म क्या था? उसने हिजाब वैसे नहीं पहना था जैसा ईरानी सरकार का आदेश था।
इस बर्बर हत्या के बाद ईरान की सड़कों पर हज़ारों महिलाओं की…
Man’s basic vice, the source of all his evils, is the act of unfocusing his mind, the suspension of his consciousness, which is not blindness, but the refusal to see, not ignorance, but the refusal to know. Irrationality is the rejection of man’s means of survival and, therefore, a commitment…
भगत सिंह कहते थे "बहरे कानों तक अपनी आवाज़ पहुँचाने के लिए अक्सर धमाकों की ज़रूरत पड़ती है।"
लेकिन उनको कहाँ पता था कि लोगों की स्मृति इतनी कमज़ोर है कि उनके जाने के बाद वे सिर्फ़ उनका 'धमाका' ही याद रखेंगे। और उनको भूल जाएँगे, उनके…
प्रश्नकर्ता: सर, मास फिनोमेना नहीं।
प्र२: सर, लगता है कि जानते नहीं हैं।
आचार्य:…
The most powerful prayer, one well nigh omnipotent, and the worthiest work of all is the outcome of a quiet mind. The quieter it is the more…
"मुझे आश्चर्य होता है ये देखकर कि कैसे भगवान ने चार करोड़ बंगालियों को बनाते हुए, एक आदमी को भी जन्म दिया।"
जिस 'आदमी' की बात यहाँ गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर कर रहे हैं, उनके लिए एक बार गांधी जी ने कहा था,
"विद्यासागर की उपाधि उन्हें उनके ज्ञान के लिए…
प्रश्न: आपने कहा कि आज के जितने भी लिबरल चिंतक इत्यादि हैं, वे कोई भी पराभौतिक हस्ती को पूर्णतया नकार देते हैं, और कहते हैं - "जो भी है वह यहीं आँखों के सामने है।" भगत सिंह ने भी कहा, "दुनिया में ईश्वर नाम की कोई चीज़ नहीं है," पेरियार…

तुम मुझे रोज़मर्रा की निर्बल और निराधार वासना से बचते रहने की शक्ति देते रहो।
~ गीतांजलि
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, रवीन्द्रनाथ टैगोर, वासना को निर्बल और निराधार क्यों कह रहे हैं?
आचार्य प्रशांत: वासना को रवीन्द्रनाथ निर्बल इसीलिए कह रहे हैं, क्योंकि वासना में बल होता तो वासना उसको पा…

Many of us promise our parents high marks, and when the result falls short, the guilt can feel heavier than the exam itself. But no one controls results; they depend on far too many things outside us. What is in our hands is our intent, our effort and our honesty with what we study. The Bhagavad Gita says the same: our right is to action alone, never to its fruit. What if the only promise we made was to study honestly and with love?

कोई खिलाड़ी देश के लिए मेडल जीतकर लौटती है, और बधाई के साथ ही सवाल आता है कि खुशखबरी कब दोगी। उम्र का पैमाना और परिवार की अपेक्षा मिलकर उसकी पूरी मेहनत को एक देह की भूमिका तक सीमित कर देते हैं। पर सफलता केवल वह नहीं जिसे दूसरे गिन सकें। जब हम स्वयं को देह भर मान लेते हैं, तो हमारे विचार, लहजा और अपनी छवि तक उसी में बँध जाते हैं। इंसान बनकर जीना और किसी के हाथों न बिकना अपने आप में बड़ी और बिरली सफलता है। हमारे लिए असली खुशखबरी क्या है?

We often defend a bad choice by pointing to a worse one: stay dishonest or starve, keep the wrong grip or stop playing. But the real trouble is not the option we picked. It is the option we never let ourselves see. Action does not need greed or attachment to find its energy. The third way begins by rejecting both false choices, without knowing what comes next. Which of our everyday choices are really false dilemmas?

35 की उम्र आते ही खिलाड़ी महिला से कहा जाने लगता है कि अब खेल छोड़ो, बच्चों को मौका दो। हम मान लेते हैं कि यह उम्र और शरीर की मजबूरी है। पर ध्यान से देखें तो शरीर का तर्क टिकता ही नहीं। असल दबाव उस सिखाई गई मान्यता का है जो महिला को उसके शरीर और उससे जुड़ी भूमिकाओं से ही तौलती है, और जिसे हम अपनी ही सोच मान बैठे हैं। जो आवाज़ें हमें बताती हैं कि हमारी ज़िंदगी का क्या करना है, क्या हम ईमानदारी से देख पाएँगे कि वे आवाज़ें किसकी हैं?

Many of us look for role models of our own gender and hope to succeed as a man or as a woman, yet no one great was ever great as a gender. The moment we tie our aims to being a woman or a man, we tie them to the body, and much of our attention goes into how we look and how we are seen. So much around us keeps reminding a woman of her body, from songs to the fear of a street at night. But the body has never achieved anything by itself. What might we attempt if gender stopped mattering?

एक महिला खिलाड़ी वर्ल्ड चैंपियनशिप में मेडल जीतती है, लेकिन उसे ऑनलाइन हैरसमेंट, फ़ेक अकाउंट्स और आपत्तिजनक तस्वीरों का सामना करना पड़ता है। सदियों की वर्जनाओं ने हमें स्त्री को सिर्फ़ देह के तल पर देखने का आदी बना दिया है, उसकी काबिलियत या गहराई से कोई सरोकार नहीं रहता। यही पैटर्न गाड़ी, नौकरी और शादी जैसे रोज़मर्रा के फैसलों में भी दिखता है। यह कोई विकृति नहीं, बल्कि इन्हीं वर्जनाओं की स्वाभाविक परिणति है।

Sisyphus pushes a rock up a hill forever, knowing it will always roll back down. A regular workman does the same thing inside a job: he keeps pushing too, except he hopes it will eventually pay off, a promotion, a house, a better life. This hope is often just a comfortable lie. Sisyphus, who expects nothing and still keeps going, is actually more honest than we are. The real question is not whether the effort is worth it, but whether we can stop lying to ourselves about it.

अहं अगनि हिरदै जरै, गुरू सों चाहै मान। तिनका जम न्यौता दिया, हो हमरे मिहमान॥
~ कबीर साहब
वक्ता :गुरु और शिष्य की कहानी है। उनके संबंधों के विषय में है। अहं की आग सीने में धकधक जल रही है। अहं कहता है, “मुझे मान्यता मिले, स्वीकृति मिले, प्रशंसा मिले”।…

A modern woman calls herself liberated, yet lives anxious — anxious about age, desirability, marriage, motherhood. Acharya Prashant exposes this anxiety as proof that feminism never touched the real wound: centuries of conditioning that reduced women to bodies for pleasure and reproduction. External equality isn't enough. True freedom demands she reject the entire inheritance of tradition and simply become human — not woman, not wife, not mother by decree, but free.

प्रेम की गहराई हमेशा प्रेमी की अपनी चेतना जितनी होती है — जो जैसा है, उसका प्रेम भी वैसा ही होगा, चाहे उसे कितना भी पावन या अनोखा क्यों न मान लिया जाए। जिस चेतना ने खुद को कभी गहराई से नहीं जाना, वह प्रेम में भी सतह से आगे नहीं जा सकती। जो कोई अपने प्रेम को गहराई से परखने से बचता है, वह असल में खुद को परखने से बच रहा होता है — और यही बचाव, प्रेम के नाम पर पाला गया एक और भ्रम है।

पीरियड्स से महिलाएं कमजोर नहीं होतीं, फिर भी यह मान्यता सदियों से चली आ रही है। आचार्य प्रशांत बताते हैं कि हर ऐसी मान्यता के पीछे किसी का डर या स्वार्थ छुपा होता है। सिर्फ तर्क या जानकारी से बदलाव नहीं आता, जब तक हम खुद अपने भीतर के इस डर या स्वार्थ को पहचानकर उससे मुक्त होने का चुनाव न करें। असली आज़ादी वहीं से शुरू होती है जहां हम मूर्खता की बातों को पीछे छोड़ना सीखते हैं और सोच-समझकर संगति का चुनाव करते हैं।

Struggling to choose between a secure job and the path you actually feel drawn to? This isn't really a question about careers. It's about why other people's opinions have so much power over you in the first place. Real clarity doesn't come from finding the 'right' choice. It comes from honestly looking at your own fear, again and again, until it stops running the decision for you.