आचार्य प्रशांत: मार्क्स ने कहा था “रिलीजन इज़ द ओपियम ऑफ़ द मासेज़ ”। समझ में आ रहा है क्यों कहा था? क्यों कहा होगा? क्यों कहा होगा? ओपियम माने? नशा, गाँजा। क्यों कहा होगा?
प्रश्नकर्ता: सर, मास फिनोमेना नहीं।
प्र२: सर, लगता है कि जानते नहीं हैं।
आचार्य: नशे का क्या अर्थ होता है?
प्र१: तुम झुक सकते हो इसके पीछे।
प्र२: सर, समझ नहीं आया।
प्र३: अपनी असल ज़िंदगी को भूल जाते हैं इसमें।
आचार्य: अपनी ज़िंदगी को भुलाने के लिए धर्म का सहारा लेते हैं हम। कि ज़िंदगी सड़ी-गली है तो आकर चलो सत्संग कर लेते हैं। जैसे दिन भर कोई परेशान रहे और शाम को जाकर के अड्डे पर बैठ जाए।






