ताकत चाहिए, आज़ादी चाहिए? || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश में (2021)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मेरा प्रश्न श्रीमद्भगवद्गीता से है। श्रीकृष्ण कर्मयोग की जब बात करते हैं, तो वो कहते हैं, "निधनं श्रेय:", तो उसका सजीव उदाहरण अगर मैंने कहीं पढ़ा है, या इतिहास में देखा जाए, तो शहीद-ए-आज़म भगतसिंह मुझे उसका बहुत बड़ा उदाहरण दिखते हैं।
तो आज के युवा में, जो बल उनके (भगत सिंह) समय में था, कि वो अपने धर्म के प्रति — यानी उस समय का जो एक ही उद्देश्य था उनका, वो था देश की आज़ादी — तो आज के युवा को ऐसा कौनसा धर्म हमें चुनना चाहिए या ऐसा कौनसा काम हो, जिससे वो बल हमें भी मिले? यही मेरा प्रश्न है।
आचार्य प्रशांत: देखो, आज़ादी की ललक हममें होती-ही-होती है, कोई ऐसा नहीं है जिसे आज़ादी नहीं चाहिए, यहाँ तक कि पशु-पक्षियों को भी आज़ादी चाहिए। बछड़े को बाँध दो खूँटे से, देखा है क्या करता है? गला छिल जाता है, और वो कोशिश कर रहा है छूटने की। आज़ादी आपको भी उतनी ही शिद्दत से चाहिए जितनी भगतसिंह को चाहिए थी, बस अन्तर ये है कि वो बाईस-तेईस की उम्र में ही अच्छे से जान गये थे कि ग़ुलाम हैं।
अन्तर आपमें और भगतसिंह में ये नहीं है कि उन्हें आज़ादी चाहिए थी और आपको नहीं। मैं कह रहा हूँ: आज़ादी दोनों को चाहिए, आज़ादी हर जीव को चाहिए। अन्तर यहाँ पर है कि उन्हें पता था कि वो ग़ुलाम हैं, आप मानते हो कि आप आज़ाद पहले से हो, उन्हें स्पष्ट दिख रहा था कि वो ग़ुलाम हैं, आपको दिखता ही नहीं कि आप ग़ुलाम हो — अन्तर यहाँ पर है। आपको दिख भर जाए कि आप कितने ग़ुलाम हो, आप भी जान दे दोगे। आप भी कहोगे, ‘फन्दे को चूम लूँगा, हँसते-हँसते लटक जाऊँगा, कोई दिक्क़त नहीं। आज़ादी की राह पर मौत मिल रही है, श्रेयस्कर है, जिस्म छोटी चीज़ है।‘
हम जानते कहाँ हैं कि हम ग़ुलाम हैं! हम पर कोई जैसे जादू कर गया है, हम पर वशीकरण मन्त्र चल गया किसी का जैसे। हम इतनी अपनी लुटी-पिटी, गयी-गुज़री हालत को भी कह देते हैं, 'ठीक है, साधारण है, यही तो सामान्य होता है, सभी तो ऐसे होते हैं।' हम अपनी शक्लें नहीं देखते, अपनी आँखें नहीं देखते। बिलकुल स्पष्ट चिन्ह,









