जिस उम्र में हम अपने-आपको दुधमुँहा बच्चा समझते हैं, उस उम्र में भगत सिंह फाँसी पर चढ़ गए थे। और यह कोई किशोरावस्था का साधारण उद्वेग नहीं था; भगत सिंह का ज्ञान गहरा था। जब कोई आम युवा जीवन की चकाचौंध और रंगीनियों के ख़्वाब देखता है, उस समय भगत सिंह अपने जीवन की निजी माँगों से बहुत आगे जा चुके थे। जवान हो, तो जीने का एक ही तरीक़ा है - किसी बहुत ऊँचे उद्देश्य को समर्पित हो जाओ। नहीं तो समस्याएँ, वासनाएँ, अतृप्तियाँ, समय की बर्बादी और फिर निराशाएँ घेरेंगी।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कल तेईस मार्च भारत में शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है। भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, इनको फाँसी इस दिन मिली थी। तब भगत सिंह मात्र तेईस वर्ष के थे। तो युवाओं को इनसे क्या प्रेरणा लेनी चाहिए अपने जीवन में? आप कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: अब यहाँ जितने लोग बैठे हैं, उसमें से कम-से-कम आधे तो हैं हीं युवा-वर्ग से। तो ये जो प्रश्नों का, सवालों का, समस्याओं का गठ्ठर मेरे सामने आया है, इसमें से भी आधी या आधी से ज़्यादा समस्याएँ युवाओं की ही हैं। और युवा माने क्या? बीस से पैंतीस, या बहुत विस्तृत करके बोलोगे तो पंद्रह से चालीस। आदमी की कुल उम्र का एक बहुत छोटा-सा अंश—तीसरा हिस्सा, चौथा हिस्सा, पाँचवा हिस्सा। तो युवावस्था में समय बिताते हो अपनी कुल उम्र का एक चौथाई या उससे भी कम, लेकिन समस्याएँ आ रही हैं आधी। देख रहे हो, हो क्या रहा है?
जो समय जीवन का शक्तिकाल, स्वर्णकाल होना चाहिए था, उसी समय में सबसे ज़्यादा समस्याओं से घिरे हुए हो, बतौर एक युवा। क्यों घिरे हुए हो? कारण सीधा है। जहाँ जितनी ज़्यादा संभावना है, वहाँ उतना ही अधिक ख़तरा भी होगा ही होगा। आकाश की संभावना कभी पाताल के ख़तरे के बिना नहीं आती। शक्ति मिली है, यौवन मिला है, समय मिला है, तो उसी के साथ-साथ ये अभिशाप भी मिला है कि अगर सही तरीक़े से नहीं बिताओगे उस समय को तो बहुत दुख पाओगे, बहुत मार खाओगे, बहुत ज़्यादा समस्याओं से ग्रस्त रहोगे।




