ये भगत सिंह हैं, जिन्होंने मुक़दमे और फाँसी की सज़ा के बाद कहा, 'मैं कोई खास नहीं हूँ; मेरे सीमित जीवन का मूल्य ही कितना है? मेरा जीवन शायद देश की उतनी सेवा न कर पाए, जितनी मेरी मृत्यु करेगी।' उनके लिए उनका ध्येय सर्वोपरि था—उच्च और महान। उन्होंने कहा, 'अगर मेरे जैसे पाँच सौ लोग भी इस ध्येय के लिए बलिदान हो जाएँ, तो क्या फ़र्क पड़ता है?' यह मात्र एक निष्काम कर्मयोगी का ही वक्तव्य हो सकता है।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा सवाल भगत सिंह से सम्बन्धित है। कल मैं वीर भगत सिंह के जीवन पर आधारित पिक्चर देख रहा था। तो जब उनको देखा तो एक घृणा आई ख़ुद के प्रति कि वो भी पच्चीस साल के थे और मैं भी अभी पच्चीस साल का हूँ।
आचार्य प्रशांत: घृणा बढ़ जाएगी, वो पच्चीस के नहीं थे। (मुस्कुराते हुए) अगर मूवी में उनका देखा है जब वो अपने सब काम कर रहे थे, तो वो बीस इक्कीस का देखा होगा।
प्रश्नकर्ता: जब अन्तिम समय था उनका।
आचार्य प्रशांत: अन्तिम समय था तो बाईस-तेईस के थे।
प्रश्नकर्ता: तो सर, उनके जीवन को देखकर एक प्रेरणा मिलती है और आन्तरिक बल भी मिला। और लगा कि मौत हो तो ऐसी हो। मैं भी कुछ ऐसा ही सार्थक जीवन में लाना चाहता था। लेकिन कहीं-न-कहीं मन ये भी दुविधा में रहता है कि लोगों के लिए युद्ध करूँगा, कुछ करूँगा तो मुझे कोई याद रखेगा क्या। आपका जीवन देखता हूँ तो भारत में आप पुनः वेदान्त की स्थापना कर रहे हैं। मेरे लिए आप आधुनिक शंकराचार्य हैं, तो आपसे ही जुड़ गया। ये काम सही समझकर ये काम करने लग गया। लेकिन फिर भी ये डर है या सवाल है कि इसमें मैं सिर्फ़ एक सिपाही तो नहीं, सिर्फ़ एक प्यादा तो नहीं। तो ख़ुद के अस्तित्व को लेकर हमेशा एक डर बना रहता है कि मेरा क्या।




