जिसने शोषण करा है न, वो लोक धर्म है बेटा। वो सनातन धर्म नहीं है, सनातन धर्म नहीं है। सनातन धर्म में केंद्रीय स्थान श्रुति का है, श्रुति की बहुत केंद्रीय बात ये है कि ये जो तुम अपने आप को देह माने बैठे हो न, तुम देह नहीं हो, “नाहम् देहास्मि।” और अगर आप देह नहीं हो, तो जाति कहाँ से आ गई? श्रुति जाति को किसी हालत में नहीं मानती है। यहाँ तक कि आप जिसको वर्ण व्यवस्था कहते हो, उसका भी स्थान नहीं है। क्योंकि जब आप देह हो ही नहीं, तो वर्ण किसका? जो पूरा वर्णाश्रम धर्म है उसको श्रुति मानती ही नहीं है।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। आचार्य जी मैं झारखंड के एक छोटे से गाँव से हूँ और आपको मैं एक साल से सुन रहा हूँ। आचार्य जी मैं जिस क्षेत्र से हूँ उस क्षेत्र में दलित निवासी हैं और मूलत: सांथाल (एक जनजाति) हैं। और मैं अक्सर ये पाया हूँ कि जो हम दलित हैं वो अशिक्षित और शोषित हैं। और इसका कारण जानने के लिए मैंने कुछ लोगों से बात किया और चर्चाएँ भी की, तो उन्होंने मुझे बताया कि हिंदू धर्म दलितों का सदियों से शोषण करता आया है, और इसको प्रूव करने के लिए उन्होंने मनुस्मृति का संदर्भ दिया।
आचार्य जी, आपका मैंने कहीं वीडियो देखा और स्वामी विवेकानंद को भी पढ़ा है, तो मैंने पाया है कि आप दोनों ही मनुस्मृति का खंडन करते हैं। लेकिन आचार्य जी आपका एक वीडियो आया था जिसमें आप मनुस्मृति का एक श्लोक “धर्मो रक्षति रक्षित:” पर चर्चा कर रहे थे। इस दोनों का मुझे लग रहा कि विरोधाभास हो रहा है। इस पर आपका मार्गदर्शन चाहिए।
आचार्य प्रशांत: देखिए, सबसे पहले तो ये बात कि हिंदू धर्म दलितों का शोषण करता है। हाँ, आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं जो लोकधर्म हमारा रहा है, जैसा वो प्रैक्टिस हुआ है, जैसा वो व्यवहार में आया है, आचरण में आया है; निसन्देह उसमें शोषण हुआ है, और ये बात हर ईमानदार आदमी को सीधे-सीधे माननी होगी, अनएंबिगुअसली (स्पष्ट रूप से), बिना उसमें कुछ इफ एंड बट




