खेल बहुत प्यारी चीज़ है, पर खेल और विज्ञापन दिखाकर सट्टेबाज़ी करने में अंतर है। आज आपको क्रिकेट नहीं, उसके ज़रिए विज्ञापन दिखाए जा रहे हैं। वही क्रिकेटर और सेलेब्रिटी आपको जुआ खेलने, सट्टा लगाने और पान मसाला खाने के लिए प्रेरित करते हैं। इनका अस्तित्व ही सिर्फ़ इसलिए है कि आपको विज्ञापन दिखाकर लूटते रहें। इससे बचने का एक ही समाधान है—भगवद्गीता, वेदांत और बोध ग्रंथों से जुड़ना।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। मेरा प्रश्न अभी हाल में एक मीडिया में समाचार आ रहा है उसके बारे में है। जिसमें ये बताया गया है कि कर्नाटक के एक इंजीनियर हैं जिन्होंने आईपीएल के दौरान सट्टेबाज़ी में डेढ़ करोड़ रुपये गंवाए, उन्होंने ये पैसा इसमें से बहुत सारा पैसा लोन में लिया था ऊँचे दर के ब्याज़ पर और फिर उसको वापस लेने के लिए उनको प्रताड़ित किया गया और समाज में भी बदनामी होने लगी जिसकी वजह से उनकी चौबीस वर्षीय पत्नी ने आत्महत्या कर ली। उनका एक दो साल का बेटा भी है।
इस समाचार के ऊपर मेरा प्रश्न है कि आचार्य जी जो लालच की वृत्ति है, आप भी बताते हैं कि काफी पुरानी वृत्ति है और जैसे कि अभी आईपीएल चल रहा है तो इन दो महीनों में इसको और भी ज़्यादा बढ़ावा दिया जाता है। समझ में ही नहीं आता कि खेल है या एक एंटरटेनमेंट (मनोरंजन)। और भोगवादिता को बढ़ाने का एक तमाशा बन गया है जिसमें कि हर एक ऐड (विज्ञापन) में ये बेटिंग ऐप्स के ऐड आते रहते हैं और उनको करने वाले भी वही हैं जो खिलाड़ी हैं या फिल्मों की दुनिया से आते हैं जिनके पास पहले से ही काफ़ी पैसा पड़ा हुआ है लेकिन वो और पैसे के लिए इसको और बढ़ावा दे रहे हैं।
तो मेरा प्रश्न ये है कि यह एक दुष्चक्र जैसा बन गया है जिसमें कि जिसके पास पैसा है और वो और पैसा कमाने के लिए हथकंडे अपना रहा है और आम आदमी भी इसमें फँसता ही जा रहा है चाहे वो मध्यम वर्ग हो, चाहे अमीरों की सूची में आने वाले हों, सभी को और ज़्यादा पैसा कमाना है और ज़्यादा पैसा बनाना है। इसका क्या निवारण हो सकता है?




